ज़ख़्म के आलम पे ही पर्दा रखा है
आँच पर पलता हुआ सपना रखा है
उठ चली है अजनबी हर्फ़-ए-तमन्ना
ज़ेहन और दिल उस ने ही महका रखा है
दूर देखा था जिसे नज़दीक है वो
शहर ने गाँवों को यूँँ अपना रखा है
वो अजल की शाम मौला नाम तेरे
ये अजल के नाम वो चेहरा रखा है
तुम भी अन्वेषी हो उन ज़ुल्फ़ों के क़ैदी
जिन अजब तस्वीरों से रिश्ता रखा है
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