ALI ZUHRI

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    तुम जो दीवानों को आवारा बता देते हो
    तुम तो मेआ'र मोहब्बत का गिरा देते हो

    तुम को आता है नए लोगों में घुलना मिलना
    बा'द हिजरत के नया शहर बसा देते हो
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    ये गहरा राज़ है इस का बदन को खा ही जाती है
    मोहब्बत पाक होकर भी हवस तक आ ही जाती है
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    नबी की दी हुई थी जो रिसालत भूल बैठे हो
    नबी के चाहने वालों शुजा'अत भूल बैठे हो

    मोहम्मद से मोहब्बत का तो दावा ख़ूब करते हो
    मगर सिद्दीक़ अक़बर की सदाक़त भूल बैठे हो

    तुम्हें उस्मान होना था उमर फ़ारूक़ होना था
    सियासत करने वालों तुम ख़िलाफ़त भूल बैठे हो

    किसी तपते हुए सहरा में थे प्यासे बहत्तर वो
    अली ज़हरा के बच्चो की शहादत भूल बैठे हो

    अरब वालो तुम्हें दी थी निगेहबानी जो का'बे की
    नबी के ख़ुत्बे की तुम ही वसिय्यत भूल बैठे हो

    सजा के सर पे तुम टोपी बने हो दीन के रहबर
    मगर तुम दीन की अपने शरीअत भूल बैठे हो

    बदर के तीन सौ तेरह का लश्कर याद है तुम को
    या अब जंग-ए-जदल की तुम हज़ाक़त भूल बैठे हो

    बटे हो तुम जो फ़िरक़ो में ज़रा क़ुरआन को थामो
    रिवायत मानने वालों हक़ीक़त भूल बैठे हो
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    एक काफ़िर से मोहब्बत जो की मैं ने
    मुफ़्ती-ए-दीं ने मुझे दीं से निकाला
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    तुम लड़की हो या फिर जादूगरनी
    क्यूँँ मेरे दिल पे हुक्म चलाती हो
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    लब हैं जैसे गुल सुमबुल रंग-ए-याक़ूती
    ख़ुद को मैख़ाना तितली का बना रखा है
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    जल्वा-ए-नूर है ये दोनो आँखें उस की
    उस को जलता सा शो'ला जो बना रखा है
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    आँखें ग़ज़ाल हिरनी हैं ज़ुल्फ़ घटा सावन
    पर्वत पे रक़्साँ कोई बादल लगती हो
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    गुज़ार देते हैं रातें पहलू में उस के
    जुगनू को भी दर का फ़क़ीर बना रखा है
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    "इश्क़"
    तुम कहो मैं ना सुनूँ
    तुम लिखो मैं ना पढूँ
    ये तोहीन-ए-इबादत है
    इश्क़ को कज़ा क्यूँँ करूँँ
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