ALI ZUHRI

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@Writerali

ALI ZUHRI shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in ALI ZUHRI's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm
नज़र घुमा के कभी देख ले घड़ी की तरफ़
बहुत समय से कोई तेरे इंतिज़ार में है
ALI ZUHRI
आप के तोड़े हुए फूल या छोड़े हुए लोग
एक ही क़िस्म की बर्बादी यहाँ पाएँगे

पहले पहले तो लुभाएँगे तुम्हें ख़ुशबू से
धीरे धीरे वो किताबों में बिखर जाएँगे
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ALI ZUHRI
जो मेरे नाम से मंसूब कर के तोड़े थे
वो फूल अब भी रखे हैं तेरी किताब में क्या

मुझे यूँँ वहशतों की मौत मारने वाले
बचा हुआ है मेरा अक्स तेरे ख़्वाब में क्या
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ALI ZUHRI
देख कर हुस्न तिरा चाँद बहक जाता है
लड़खड़ाता हुआ अंबर से ढलक जाता है
ALI ZUHRI
बा'द तेरे तो क्या करेंगे हम
हिज्र का हक़ अदा करेंगे हम

फूल बन जाएँगे महकने को
तितलियों से वफा करेंगे हम
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ALI ZUHRI
उसे बनाया गया था बहुत हसीन जमील
मैं उस सेे इश्क़ न करता तो और क्या करता
ALI ZUHRI
कुछ इस तरह तेरी यादों में डूबता है दिल
वो जैसे शाम को मग़रिब में डूबता है शम्स
ALI ZUHRI
तुम एक शख़्स पे जीवन बिताते हो हद है
किसी के प्यार में ख़ुद को भुलाते हो हद है

तुम्हारी राह से कंकर चुने थे मैंनें दोस्त
मुझे ही राह का पत्थर बताते हो हद है
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ALI ZUHRI
रेत ही रेत मिली इश्क़ सफ़र में मुझ को
ज़िंदगी ख़ाक हुई और मिला कुछ भी नहीं

रात भर होता है तारी किसी वहशत का गुमाँ
रात ख़्वाबों की सियाहत के सिवा कुछ भी नहीं
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ALI ZUHRI
तुम जो दीवानों को आवारा बता देते हो
तुम तो मेआ'र मोहब्बत का गिरा देते हो

तुम को आता है नए लोगों में घुलना मिलना
बा'द हिजरत के नया शहर बसा देते हो
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ALI ZUHRI
बाग़ों से पीले फूलों की रंगत चुराएगी
फिर अपने सुर्ख़ होंटों पे तितली बिठाएगी

ग़ुस्से में देख कर उसे महसूस ये हुआ
हिंदा के जैसे मेरा कलेजा चबाएगी
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ALI ZUHRI
इस लिए फोन का नंबर नहीं बदला मैं ने
तुम मुझे कॉल करोगी कि ज़रूरत है अली

एक ही जुमला तो सुनना था मुझे तुम सेे मगर
ये भी तुम ने न कहा तुम सेे मोहब्बत है अली
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ALI ZUHRI
तुम्हारी मौत का दुख होता तो सहन होता
तुम्हारे हिज्र का दुख कैसे सह सकूँगा मैं
ALI ZUHRI
दो पल की दिल-लगी रही दो पल रहा सफ़र
अब हिस्से रह गया है तेरा हिज्र उम्र भर

मैं चाहता था चलना तेरे साथ बा-क़दम
पर खा गया ज़माने की रुस्वाइयों का डर
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ALI ZUHRI
मेरी तमाम ज़िंदगी बर्बाद कर के अब
मसरूफ़ होगी ईद कि तय्यारियों में वो
ALI ZUHRI
आदमिय्यत के तक़ाज़ात निभा सकता हूँ
तेरी कश्ती को मैं साहिल से लगा सकता हूँ

मैं ने समझा है तुझे अपना वजूद-ए-सानी
कैसे मेआ'र तेरा दिल से गिरा सकता हूँ
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ALI ZUHRI
ये भी मुमक़िन है कि मिल जाएँ कहीं दोनों हम
पर ज़रूरी तो नहीं मिलना ज़रूरी हो हमें

जिस मुलाक़ात का वा'दा था बिछड़ने के वक़्त
वो मुलाक़ात हमेशा ही अधूरी हो हमें
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ALI ZUHRI
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तो अब तुम ही कहो जानाँ
मोहब्बत छोड़ दूँ कैसे

जो मेरे ग़म की साथी है
वो सिगरेट तोड़ दूँ कैसे
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ALI ZUHRI
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कोई सोचे मोहब्बत को तो क्या सोचे
किसी वीराने में जलता दिया सोचे
ALI ZUHRI
मोहब्बत आबगीनों में हसीनों नाज़नीनों में
बड़ी वहशत सी होती है दिलों के इन मकीनों में
ALI ZUHRI

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