जितना जीवन तुम जीते हो
    हम ने उतने ही काटे हैं

    तेज़ तपिश से तुम डरते हो
    अंगारों से यहाँ नाते हैं
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    Kumar Prem Pinaki
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    जिस दुनिया को हम जीते हैं
    कोई क्या ऐसे जीता है

    गर जीता है तो सोचो फिर
    मसअला कितना संजीदा है
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    Kumar Prem Pinaki
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    जीवन में इतनी बाधाएँ
    हर बाधाएँ हम ढोए हैं

    दिन का जगना तो लाज़िम है
    रातों के सपने खोए हैं
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    Kumar Prem Pinaki
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    यादें ही देखो पूरी हैं
    रूहों के जलने के लिए

    धोखे यहाँ ज़रूरी हैं
    यारों सॅंभलने के लिए
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    Kumar Prem Pinaki
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    टूटे हुए को ही यहाँ
    जुड़ने की चाहत होती है

    सागर को मिलने में ही कब
    दरिया की आदत होती है
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    Kumar Prem Pinaki
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    पत्थर से मजबूत इरादे
    टूटेंगे तो मिट्टी होंगे

    ख़ुद की शर्तों पे मरते हैं
    सोचो कितने ज़िद्दी होंगे
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    Kumar Prem Pinaki
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    मेरी अपनी कहानी है
    मेरे अपने क़िस्से हैं

    दर्द नहीं इक जैसा है
    उस के भी कई हिस्से हैं
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    Kumar Prem Pinaki
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    दरिया इतना जो पानी ले कर बहता है
    भीतर कोई कहानी ले कर बहता है
    Kumar Prem Pinaki
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    मन में पहले सौ युद्ध हुए
    जीते उन सेे तब बुद्ध हुए
    Kumar Prem Pinaki
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    संघर्ष बिना जो जीता है
    वो जीता कोई ख़ास नहीं

    दुनिया में कोई राम नहीं
    जिस का अपना वनवास नहीं
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    Kumar Prem Pinaki
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