Faiz Ahmad

Top 10 of Faiz Ahmad

    रात हो, चाँद हो, बारिश भी हो और तुम भी हो
    ऐसा मुमकिन ही नहीं है कि कभी हो मिरे साथ
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    आप की आँखों की जो कर ले ज़ियारत इक बार
    उस का दिल फिर तो कहीं और न माथा टेके
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    रोज़ मेरे घर की जिम्मेदारियाँ मुझ को आ कर
    भूल जाने का तुझे अब मशवरा दे रही हैं
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    कितना भी दर्द पिला दे ख़ुदा पी सकता हूँ
    ज़िन्दगी हिज्र से भर दे मिरी जी सकता हूँ

    हर दफ़ा दिल पे ही खा के हुई है आदत ये
    बंद आँखों से भी हर ज़ख़्म को सी सकता हूँ
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    जमातो में नमाजो़ में कभी नहीं मिलेगा
    मिलेगा फ़ैज़ मय-कदे में गर कहीं मिलेगा

    तू ढूंँढ़ना अगर जो चाहे तो तलाश करले
    मगर मुझ ऐसा बादाकश कहीं नहीं मिलेगा

    फरिश्तों ने भी मेरी क़ब्र को कुछ ऐसे ढूंँढा
    इधर अज़ाब सख़्त है सो वो यहीं मिलेगा

    लिपट रहे हैं साक़ी से ये जानते हुए भी
    कि तेरा कुर्ब सा सुकूंँ इधर नहीं मिलेगा

    मैं मांँगने लगा तुझे जो फूट के दुआ में
    कहा ख़ुदा ने ख़ूब रो ले पर नहीं मिलेगा
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    देख कर हर कोई बेकार समझ ले मुझ को
    अपनी उल्फ़त में गिरफ़्तार समझ ले मुझ को

    बिना उस के तिरी जन्नत मुझे मंज़ूर नहीं
    तू मिरी मान गुनहगार समझ ले मुझ को
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    अब आ भी जाओ के सुकूंँ मिले मुझे
    अगर जो जाना था तो क्यूँँंँ मिले मुझे

    ज़माना हो न हो रकी़ब बीच में
    तू अब कभी मिले तो यूँंँ मिले मुझे
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    जो ये कहता था मोहब्बत के बिना कुछ भी नहीं
    उस की नज़रों में मोहब्बत सा दिखा कुछ भी नहीं

    जिस की ख़ातिर मैं ख़ुशी से हुआ इतना बर्बाद
    वो समझता है के मुझ से तो नफा़ कुछ भी नहीं

    ले गई मुझ से चुरा के मुझे वो साथ अपने
    उस की यादों के सिवा मुझ
    में रहा कुछ भी नहीं

    दिल से चीख़ूँ के ज़बाँ से भला क्या फ़ायदा हो
    उस के नज़दीक मोहब्बत की सदा कुछ भी नहीं

    उस के आने से ही उठती थी बहारों में महेक
    बिना उस के तो मिरी बाद-ए-सबा कुछ भी नहीं

    जिस के होने से मुयस्सर था मुझे सारा जहाँँ
    वो गई क्या के मिरे पास बचा कुछ भी नहीं

    एक पल के लिए वो रुक भी अगर जाए तो
    ज़िन्दगी फिर मिरी इक पल के सिवा कुछ भी नहीं

    जो करे है तो तड़पता फिरे है हिज्र में बस
    सच कहें 'फ़ैज़' मोहब्बत में रखा कुछ भी नहीं
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    कहूँ तुझे लिखूँ तुझे पढ़ूँ तुझे
    इक अक्स बनके सामने सुनूँ तुझे

    रहेगी तू हमेशा दिल के पास ही
    मैं चाहे कितना भी ग़लत लिखूँ तुझे

    तू पूछे जब कि तुझ सेे क्या है राब्ता
    तो मैं, तू प्यार है मिरा कहूँ तुझे

    ख़ुदा की मुझ पे नेमतों को गर गिनूँ
    तो सब सेे आला दर्जे पे गिनूँ तुझे

    मैं आया वैसे तो हूँ दिल को बेचने
    मगर ये दिल की शर्त है बिकूँ तुझे

    मिरे दरूँ तू घुल मिले कुछ इस तरह
    हर इक मैं अपनी साँस में ज्यूँँ तुझे

    मैं बन सकूँ तिरी निगाहों की तलब
    जहाँ भी देखे हर तरफ़ दिखूँ तुझे
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    ज़रा शराब लाके दे दो मेरे ख़ून के लिए
    कि आग चाहिए मुझे मिरे जुनून के लिए

    है हाल अब वो मुफ़लिसी का मेरे घर के आज ओ कल
    मैं ख़ून कर रहा हूँ ख़ुद का ख़ुद के ख़ून के लिए

    मिलेगा वो ही जो लिखा है मांगो य ना मांगो तुम
    दुआ तो है तुम्हारे दिल के बस सुकून के लिए

    जहान की सभी ख़ुशियों को इख्ट्टा कर के फिर
    के क़ैद कर लिया है मैं ने माह-ए-जून के लिए

    ऐ हाक़िम-ए-शहर हैरान मत हो ये बता मुझे
    दवा है तेरे पास मुझ जिसे ज़ुबून के लिए

    नहीं है वो किसी भी मुक़ाबिल-ए-मकाम को
    जुनून-ए-इश्क जिस को कम रहा जुनून के लिए

    तिरा वो जोड़ा तेरे होने का भरम दिलाता है
    वो जो मैं लाया था तिरे मिरे शुगून के लिए

    गुजरती है यूँँ रोज़ ज़िन्दगी बेचैनियों में कि
    सुकून से मैं सोचूंगा कभी सुकून के लिए

    तुम उस के हाल-ए-दिल पे ग़ौर ठीक से दिया करो
    के फ़ैज़ दर्द को बड़ाता है सुकून के लिए
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    Faiz Ahmad
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