Faiz Ahmad

Faiz Ahmad

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'Ahmad' amrohvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in 'Ahmad' amrohvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm
तुम जो आती हो जब भी पास मिरे
क्यूँँ उतर जाते हैं लिबास मिरे
Faiz Ahmad
फिर कूचा-ए-माज़ी को क़दम बढ़ने लगे हैं
दरकार-ए-दिल-ए-ज़ार है अब क्या ही कहा जाए
Faiz Ahmad
हराम कह के मज़े को ख़राब करते हैं
ये पारसा मिरा पीना अज़ाब करते हैं

तुझे ख़बर नहीं ख़लवत में तुझ को सोच के हम
कि रोज़ क्या अमल-ए-ना-सवाब करते हैं
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Faiz Ahmad
रुख़-ए-निगाह-ए-आतिशा से कलाम कर के आ रहे हैं
हम उन निगाहों को सर-ए-रह सलाम कर के आ रहे हैं
Faiz Ahmad
किसी के रंज से उस को निकाल कर पहले
उसी के रंज में अब ख़ुद ही फस गया हूँ मैं

बड़ा कमीन हूँ दलदल में पैर ख़ुद रख कर
ये कह रहा हूँ कि धोखे से धस गया हूँ मैं
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Faiz Ahmad
उस के पैग़ाम ने उम्मीद को भी तोड़ दिया
उस का कहना है मुझे पाने की कोशिश न करे
Faiz Ahmad
तिरे जाने का मिरा गैज़ कम नहीं हो रहा
कि गुनाह कर के भी कोई ग़म नहीं हो रहा
Faiz Ahmad
तुझे मुझ सेे पहले कोई कहीं ले न जा चुरा के
इसी एक डर के मारे मिरे बाल झड़ रहे हैं
Faiz Ahmad
जमा हुई बचपने की सब रक़म खा गया
मिरी जवानी को बस तुम्हारा ग़म खा गया
Faiz Ahmad
अपनी मसरूफियत पे लानत है
अब तो नंबर भी उस का याद नहीं
Faiz Ahmad
किसी भी हाल में तुझ को नहीं भुलाऊँगा
मैं पासवर्ड तेरे नाम का बनाऊँगा
Faiz Ahmad
मैं ही कमबख़्त हूँ ज़िंदा हूँ बिछड़ के, वरना
मैं ने देखा है हर इक चीज़ को तन्हा कर के
Faiz Ahmad
कीं कोशिशें हज़ार उसे भूल जाऊँ मैं
वो भी मय-ए-कुहन है उतरती नहीं मगर

एक उम्र काट दी उसी के इंतिज़ार में
कमबख़्त शाम-ए-हिज्र गुज़रती नहीं मगर
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Faiz Ahmad
मिरी मोहब्बत को अपने कमरे में बिस्तरों पे सजाने वाले
ये बद-दुआ है कि तुझ को उस के बदन में लज़्जत नहीं मिलेगी
Faiz Ahmad
ये मेरा वहम है तू याद करती होगी मुझे
ये मेरा दावा है ये वहम भी ग़लत है मिरा
Faiz Ahmad
उसी के दम से है मुस्तमिर निज़ाम-ए-गर्दिश-ए-आसमाँ
क़रार-ओ-रंगत-ओ-रौनक-ए-जहान-ए-फानी है राबिया
Faiz Ahmad
इक और हादसा दिल-ए-अहमद को चाहिए
इक वक़्त हो गया है हमें कुछ कहे हुए
Faiz Ahmad
दिल-ए-मरहूम में अब जान नहीं आएगी
ज़िंदगी हो के पशेमान नहीं आएगी

देख कर जिस को मोहब्बत का तुम्हें धोका हुआ
अब कभी लब पे वो मुस्कान नहीं आएगी
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Faiz Ahmad
मैं जिस का होने की गरज़ से मर गया
वो मरने से भी पर मिरा नहीं हुआ
Faiz Ahmad
तुरफ़ा-ओ-चेहरा-ए-तरब थी तुम
जीने का इक फ़क़त सबब थी तुम

था मुलाज़िम ख़ुदा का इस ख़ातिर
दिल-ए-मज़दूर की कसब थी तुम
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Faiz Ahmad

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