Ammar Iqbal

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    मुझ को इस लफ़्ज़ का मतलब नहीं मालूम मगर
    आप की हम्म ने मुझे सोच में डाला हुआ है
    Ammar Iqbal
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    बात मैं सरसरी नहीं करता
    और वज़ाहत कभी नहीं करता

    एक ही बात मुझ
    में अच्छी है
    और मैं बस वही नहीं करता

    मुझ को कैसे मिले भला फ़ुर्सत
    मैं कोई काम ही नहीं करता

    आप ही लोग मार देते हैं
    कोई भी ख़ुद-कुशी नहीं करता

    एक जुगनू है तेरी यादों का
    जो कभी रौशनी नहीं करता
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    Ammar Iqbal
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    "मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं"
    मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं
    मेरे पेच खुल चुके हैं मेरे ख़म बिगड़ रहे हैं
    कहीं चुपके चुपके चुपके मेरी बात चल रही है
    कहीं कुछ अज़ीज़ मेरे, मेरे पावँ पड़ रहे हैं
    मेरा काम कर चुका है, मेरा ख़्वाब मर चुका है
    मेरी ख़ुश्क ख़ुश्क आँखों में सराब गड़ रहे हैं
    मेरी पसलियाँ चटक कर मेरे मुँह को आ गई हैं
    ग़म-ए-तिश्नगी के मारे मेरे दाँत झड़ रहे हैं
    मेरी आस्तीं फटी है मुझे चोट लग रही है
    मेरी धज्जियाँ उड़ी हैं, मेरे तार उधड़ रहे हैं
    मेरे ख़ून की सफ़ेदी तुम्हें क्या बता रही है
    ये मुझे जता रही है, मेरे ज़ख़्म सड़ रहे हैें
    मेरे सर पे चढ़ के अब तक वही ख़ौफ़ नाचता है
    कि तू कब का जा चुका है कि तू कब का जा चुका है
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    Ammar Iqbal
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    अक्स कितने उतर गए मुझ में
    फिर न जाने किधर गए मुझ में

    मैं ने चाहा था ज़ख़्म भर जाएँ
    ज़ख़्म ही ज़ख़्म भर गए मुझ में

    मैं वो पल था जो खा गया सदियाँ
    सब ज़माने गुज़र गए मुझ में

    ये जो मैं हूँ ज़रा सा बाक़ी हूँ
    वो जो तुम थे वो मर गए मुझ में

    मेरे अंदर थी ऐसी तारीकी
    आ के आसेब डर गए मुझ में

    पहले उतरा मैं दिल के दरिया में
    फिर समुंदर उतर गए मुझ में

    कैसा मुझ को बना दिया 'अम्मार'
    कौन सा रंग भर गए मुझ में
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    Ammar Iqbal
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    रंग-ओ-रस की हवस और बस
    मसअला दस्तरस और बस

    यूँँ बुनी हैं रगें जिस्म की
    एक नस टस से मस और बस
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    Ammar Iqbal
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    इसी फ़कीर की गफ़लत से आगही ली है
    मेरे चराग़ से सूरज ने रौशनी ली है

    गली-गली में भटकता है शोर करता हुआ
    हमारे इश्क़ ने सस्ती शराब पी ली है
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    Ammar Iqbal
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    आखिरश पाक हो गया क़िस्सा
    ख़ाक था ख़ाक हो गया क़िस्सा

    खा रहा है जने हुए अपने
    कितना सफ़्फ़ाक हो गया क़िस्सा

    अब बचा हूँ मैं आख़िरी किरदार
    अब खतरनाक हो गया क़िस्सा
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    Ammar Iqbal
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    वहशत के कारखाने से ताज़ा ग़ज़ल निकाल
    ऐ सब्र के दरख़्त मेरा मीठा फल निकाल
    Ammar Iqbal
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    एक दरवेश को तिरी ख़ातिर
    सारी बस्ती से इश्क़ हो गया है
    Ammar Iqbal
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    मैं ने चाहा था ज़ख़्म भर जाएँ
    ज़ख़्म ही ज़ख़्म भर गए मुझ में
    Ammar Iqbal
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