Anubhav Gurjar

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    नहीं पाई तुम्हारे हाथ वो ख़ैरात क्या होगी
    मिले जो बाप-दादास न वो शहमात क्या होगी

    मिटा कर कुल-घराने को बड़े तुम बन गए इक दिन
    जो पीछे घर नहीं होगा तो फिर औक़ात क्या होगी
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    तुम्हारे दर पे आया हूँ तुम्हें अपना बनाने को
    ख़ुदा तुम को बना बैठा गया जब मैं भुलाने को

    उजाला माँगने आया दुआ जब रौशनी की तो
    मैं अपना घर जला बैठा अँधेरा ये बुझाने को
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    कोई चंदा उतर आए मिरी सुनसान राहों में
    मैं पूरी रात सो जाऊँ तुम्हें ले कर के बाहों में

    अगर चर्चे किसी की बेवफ़ाई के कभी होंगे
    कोई भी नाम दूजा है हो पहली तुम निगाहों में
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    हुस्न के दम पे हो चाहे पर बड़ी बेबाक हो तुम
    मैं बड़े अफ़सोस में हूँ साथ में ही ख़ाक हो तुम

    यूँँ अज़िय्यत में मुझे तुम छोड़ कर जा तो रही हो
    जिस्म के भूखों को जानो इतनी भी चालाक हो तुम
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    मिरी सूनी सी रातों में तुम्हारा ही सहारा है
    निभाए थे कभी जो उन ही वादों का पिटारा है

    तिरे जैसा कोई क्या होगा जो मिल जाए तो लाना
    बची है रात ग़म की बस अभी दिन ही गुज़ारा है
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    मुझे हर दम ये लगता है कि तन्हाई अकेली है
    जहाँ बिन डर के बैठेगी वही मेरी हवेली है

    तुम्हारी क्या ख़बर मुझ को न मेरी है ख़बर तुम को
    सुलझ जाए किसी से भी तो क्या ही ये पहेली है
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    किसी की वो नज़र पहली भुलाने में ज़माने हैं
    तुम्हारी दी हुई दौलत से ही पैसे कमाने हैं

    तुम्हारी याद अब हम को नहीं आती गुलाबों से
    इसे साबित करूँँ ऐसे हज़ारों ही बहाने हैं
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    सुनो तुम साथ में चल दो हमारी इस कहानी के
    तुम्हें क़िस्से सुनाऊँगा बुढ़ापे में जवानी के

    हमारी गाँव पंचायत तुम्हारी हो तो जाएगी
    मगर दिन-रात काटोगी यहाँ पर धूल पानी के
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    कभी पीछे रही तुम दिल दुखाने से
    मुझे तुम जान आई हो फ़लाने से

    तभी तुम ने अदब से बात क्या कर ली
    तो ख़ुद को ही जुदा जाना ज़माने से

    तुम्हारी याद में दिन रात रोया हूँ
    भुलाया अब इसे झट इक बहाने से

    मिरे रुख़्सार पे सुर्ख़ी लगी ऐसी
    कि रख के होंठ भूली हो हटाने से

    उसे मैं हाल दिल का अब बताता ही
    कि तब तक वो हुई पीछे निभाने से

    मुझे फिर से दुबारा याद आया है
    बहुत दुख हैं मता-ए-जाँ बनाने से
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    वो हम में से ही थे कोई जिन्होंने दिल दुखाया है
    अभी कुछ दिन ही पहले निर्भया को भी रुलाया है

    अगर वो आज ख़ुद ये देख लेते शे'र क्या कहते
    कि अब ग़ालिब के कलकत्ते में तुम ने ख़ूॅं बहाएा है

    तुम्हारे घर में माँ-बीवी बहन-बेटी नहीं होती
    ये कर के नाम तुम ने सारे मर्दों का डुबाया है

    तुम्हें ख़ुद शर्म आनी चाहिए ममता ये कहने में
    कि औरत हो के तुम ने फिर उसी का हक़ मिटाया है

    सुनो ऐ लड़कियो चीखें हज़ारों साल इस जैसी
    तुम्हें हक़ माँगना ऐसी ही चीखों ने सिखाया है
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