DILBAR

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    मिज़ाज-ए-इश्क़ कुछ बदला तुम्हारा है
    किया जो तुम ने अब मुझ सेे किनारा है

    मुझे ये लगता है दिलबर कि उस को अब
    इलावा मेरे हर इक शख़्स प्यारा है
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    मेरा वो लम्हा ख़ुश्बूदार हो जाए
    नबी का जब मुझे दीदार हो जाए
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    तिरा मुझ पे यूँँ कुछ उपकार हो जाए
    तू चाहे जैसा वो किरदार हो जाए
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    मुताबिक तेरे जब किरदार हो जाए
    सुखी ये मेरा तब संसार हो जाए
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    सब को मिरे बारे में बता रही है
    याद उसे मेरी अब सता रही है
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    ख़ुदा का राज़ वही जाने जिस को ख़ुद बताए ये
    बंदों के भेस में आ के ख़ुद से पर्दा उठाए ये

    इन चमकी आँखों से हरगिज़ देखा नहीं जाता
    दिखा उसी को है दिलबर जिसे ख़ुद दिखलाए ये
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    शाबाश दुनिया जीत के तुम आए हो
    सब को हरा के विश्व कप तुम लाए हो

    जो ख़्वाब भारतवासियों ने देखा था
    उस ख़्वाब को जी कर के तुम दिखलाए हो
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    जिस की ख़ातिर हम न रातों में सोए हैं
    आज वो ही लोग जी भर के रोए हैं

    देश की इस धरती में दिलबर देखो तुम
    बीज जीतों के जवानों ने बोए हैं
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    तुम को सोचो तो फिर तुम ही हो जाता हूँ
    सारे का सारा फिर गुम ही हो जाता हूँ
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    हुआ कितना आसान अब हर सफ़र है
    पड़ी जब से मुर्शद की मुझ पर नज़र है

    मिला है उसे हर सुकूॅं इस जहाँ में
    रज़ा में रहा इन की जो भी बशर है

    है जिस पर हुई इन की रहमत की बर्षा
    ज़माने से उस को न फिर कोई डर है

    समय रहते जो पा ले जीवन का मतलब
    न उन का रहा ये अधर में सफ़र है

    यहाँ पर पड़े इन के कोमल चरण हैं
    बना फिर वो तीरथ ही सारा नगर है

    है अरमाॅं दिलों के सुनो मेरे दिलबर
    कि हर बात मानूॅं तेरी हर पहर है
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