divya 'sabaa'

Top 10 of divya 'sabaa'

    उदासी के घने साए मिटाकर ही वो मानेंगे
    जो तन्हा अपने कमरे में ठहाकों को लगाते हैं
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    आँखें तरस रही हैं जज़्बे पिघल रहे हैं
    अनफ़ास को हमारे लम्हे निगल रहे हैं

    जज़्बात के शजर पर बरसात है ग़मों की
    एहसास के सफ़र में हम रुख़ बदल रहे हैं
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    हयात-ओ-मौत में कुछ फ़ासिला यक़ीनी है
    मगर चलें तो सफ़र ख़त्म और शुमार न हो
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    आशिक़ों का यही अफ़साना है और कुछ भी नहीं
    कुछ न कर पाएँ तो वो आह-ओ-फ़ुग़ाँ तक पहुँचे
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    चंद मख़्सूस दरख़्तों से मुहब्बत का जुनून
    कुछ परिंदों को कहीं का नहीं रहने देता
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    हम ने ग़ज़ल में उस के सिवा सब सेे बात की
    अब इस को आप कुछ भी कहें इस्तिलाह में
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    नक़्श-ए-जाँ हो गई तहरीर शिकस्त-ए-उल्फ़त
    किस तरह वो मिरे माथे की शिकन को भूले
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    कोई राजा हो इक दिन राजधानी छूट जाती है
    सिकन्दर आते जाते हैं कहानी छूट जाती है
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    फिर वही होगी मुहब्बत और वही तर्ज़-ए-ख़ुलूस
    अपने ज़ेहनों से तसव्वुर को जुदा तो कीजिए
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    सुकून जिस में मुयस्सर नहीं है इक पल भी
    हयात है मगर उस को हयात क्या लिखना
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