Hrishita Singh

Top 10 of Hrishita Singh

    अपनी ज़िद में हारे हैं तुम ने
    अपने सब सेे ज़्यादा प्यारे लोग
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    आधी नींद के मारे लोग
    कैसे हैं ये बेचारे लोग
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    यूँँ तो रहते हैं ख़ुद से बे-ख़बर भी
    है अपने पास पर ज़ौक़-ए-नज़र भी
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    इन सजावटों की कोई आरज़ू नइँ
    जुगनुओं से कहना बत्तियाँ बुझा दें
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    रिंदों को मयख़ाने से घर ले जाने वाले
    फिर तेरा भी उन मयख़ानों से क्या रिश्ता है

    मयख़ाने के रस्ते में जो भी उन को  दिखता
    इन दुनिया वालों को वो ग़ाफ़िल ही लगता है
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    कभी तो ज़िंदगी में हादसों का नाम रहा
    कभी तो ज़िंदगी ही हादसों के नाम हुई
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    तुम फ़साने इतने बनाते ही रहते
    ये मुहब्बत है जाँ सियासत नहीं है
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    दिल लगा ले अब और वो भी किसी से
    अब लगाने की मुझ को हिम्मत नहीं है
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    ये अब रौशनी आँखों में चुभती है
    अँधेरा ही बस अपना सा लगता है
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    वो तो किसी को भी अपना ख़ास नहीं रखता
    प्यारा भी हो कोई तो वो पास नहीं रखता
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