Irfan Siddiqi

Top 10 of Irfan Siddiqi

    शम्अ-ए-तन्हा की तरह सुब्ह के तारे जैसे
    शहर में एक ही दो होंगे हमारे जैसे

    छू गया था कभी इस जिस्म को इक शोला-ए-दर्द
    आज तक ख़ाक से उड़ते हैं शरारे जैसे

    हौसले देता है ये अब्र-ए-गुरेज़ाँ क्या क्या
    ज़िंदा हूँ दश्त में हम उस के सहारे जैसे

    सख़्त-जाँ हम सा कोई तुम ने न देखा होगा
    हम ने क़ातिल कई देखे हैं तुम्हारे जैसे

    दीदनी है मुझे सीने से लगाना उस का
    अपने शानों से कोई बोझ उतारे जैसे

    अब जो चमका है ये ख़ंजर तो ख़याल आता है
    तुझ को देखा हो कभी नहर किनारे जैसे

    उस की आँखें हैं कि इक डूबने वाला इंसाँ
    दूसरे डूबने वाले को पुकारे जैसे
    Read Full
    Irfan Siddiqi
    0 Likes
    होशियारी दिल-ए-नादान बहुत करता है
    रंज कम सहता है ए'लान बहुत करता है

    रात को जीत तो पाता नहीं लेकिन ये चराग़
    कम से कम रात का नुक़सान बहुत करता है

    आज कल अपना सफ़र तय नहीं करता कोई
    हाँ सफ़र का सर-ओ-सामान बहुत करता है
    Read Full
    Irfan Siddiqi
    1 Like
    उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए
    कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए
    Irfan Siddiqi
    15 Likes
    सरहदें अच्छी कि सरहद पे न रुकना अच्छा
    सोचिए आदमी अच्छा कि परिंदा अच्छा
    Irfan Siddiqi
    27 Likes
    बदन के दोनों किनारों से जल रहा हूँ मैं
    कि छू रहा हूँ तुझे और पिघल रहा हूँ मैं
    Irfan Siddiqi
    52 Likes
    देख लेता है तो खिलते चले जाते हैं गुलाब
    मेरी मिट्टी को ख़ुश-आसार किया है उस ने
    Irfan Siddiqi
    17 Likes
    तू ये न देख कि सब टहनियाँ सलामत हैं
    कि ये दरख़्त था और पत्तियाँ भी रखता था
    Irfan Siddiqi
    26 Likes
    नहीं तो बर्फ़ सा पानी तुम्हें जला देगा
    गिलास लेते हुए उँगलियाँ न छू लेना
    Irfan Siddiqi
    27 Likes
    चराग़ देने लगेगा धुआँ न छू लेना
    तू मेरा जिस्म कहीं मेरी जाँ न छू लेना

    ज़मीं छुटी तो भटक जाओगे ख़लाओं में
    तुम उड़ते उड़ते कहीं आसमाँ न छू लेना

    नहीं तो बर्फ़ सा पानी तुम्हें जला देगा
    गिलास लेते हुए उँगलियाँ न छू लेना

    हमारे लहजे की शाइस्तगी के धोके में
    हमारी बातों की गहराइयाँ न छू लेना

    उड़े तो फिर न मिलेंगे रफ़ाक़तों के परिंद
    शिकायतों से भरी टहनियाँ न छू लेना

    मुरव्वतों को मोहब्बत न जानना 'इरफ़ान'
    तुम अपने सीने से नोक-ए-सिनाँ न छू लेना
    Read Full
    Irfan Siddiqi
    2 Likes
    तुम परिंदों से ज़ियादा तो नहीं हो आज़ाद
    शाम होने को है अब घर की तरफ़ लौट चलो
    Irfan Siddiqi
    29 Likes

Top 10 of Similar Writers