Jawwad Sheikh

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    तो क्या ये आख़िरी ख़्वाहिश है अच्छा भूल जाऊँ
    जहाँ भी जो भी है तेरे अलावा भूल जाऊँ

    तो क्या ये दूसरा ही इश्क़ असली इश्क़ समझूँ
    तो पहला तजरबे की देन में था भूल जाऊँ

    तो क्या इतना ही आसाँ है किसी को भूल जाना
    कि बस बातों ही बातों में भुलाता भूल जाऊँ

    कभी कहता हूँ उस को याद रखना ठीक होगा
    मगर फिर सोचता हूँ फ़ाएदा क्या भूल जाऊँ

    ये कोई क़त्ल थोड़ी है कि बात आई गई हो
    मैं और अपना नज़र-अंदाज़ होना भूल जाऊँ

    है इतनी जुज़इयात इस सानहे की पूछिए मत
    मैं क्या क्या याद रक्खूँ और क्या क्या भूल जाऊँ

    कोई कब तक किसी की बे-वफ़ाई याद रक्खे
    बहुत मुमकिन है मैं भी रफ़्ता रफ़्ता भूल जाऊँ

    तो क्या ये कह के ख़ुद को मुतमइन कर लोगे 'जव्वाद'
    कि वो है भी इसी लाइक़ लिहाज़ा भूल जाऊँ
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    अब हमें देख के लगता तो नहीं है लेकिन
    हम कभी उस के पसंदीदा हुआ करते थे
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    मैं किसी तरह भी समझौता नहीं कर सकता
    या तो सब कुछ ही मुझे चाहिए या कुछ भी नहीं
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    ये नहीं है कि वो एहसान बहुत करता है
    अपने एहसान का एलान बहुत करता है

    आप इस बात को सच ही न समझ लीजिएगा
    वो मेरी जान मेरी जान बहुत करता है
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    कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है
    फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है

    तुझ सेे जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती
    तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है
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    आप जैसों के लिए इस में रखा कुछ भी नहीं
    लेकिन ऐसा तो न कहिए कि वफ़ा कुछ भी नहीं

    आप कहिए तो निभाते चले जाएँगे मगर
    इस तअ'ल्लुक़ में अज़िय्यत के सिवा कुछ भी नहीं

    मैं किसी तरह भी समझौता नहीं कर सकता
    या तो सब कुछ ही मुझे चाहिए या कुछ भी नहीं

    कैसे जाना है कहाँ जाना है क्यूँँ जाना है
    हम कि चलते चले जाते हैं पता कुछ भी नहीं

    हाए इस शहर की रौनक़ के मैं सदक़े जाऊँ
    ऐसी भरपूर है जैसे कि हुआ कुछ भी नहीं

    फिर कोई ताज़ा सुख़न दिल में जगह करता है
    जब भी लगता है कि लिखने को बचा कुछ भी नहीं

    अब मैं क्या अपनी मोहब्बत का भरम भी न रखूँ
    मान लेता हूँ कि उस शख़्स में था कुछ भी नहीं

    मैं ने दुनिया से अलग रह के भी देखा 'जव्वाद'
    ऐसी मुँह-ज़ोर उदासी की दवा कुछ भी नहीं
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    कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है
    फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है

    कैसे किसी की याद हमें ज़िंदा रखती है
    एक ख़याल सहारा कैसे हो सकता है

    तुझ से जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती
    तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है

    यार हवा से कैसे आग भड़क उठती है
    लफ़्ज़ कोई अँगारा कैसे हो सकता है

    कौन ज़माने-भर की ठोकरें खा कर ख़ुश है
    दर्द किसी को प्यारा कैसे हो सकता है

    हम भी कैसे एक ही शख़्स के हो कर रह जाएँ
    वो भी सिर्फ़ हमारा कैसे हो सकता है

    कैसे हो सकता है जो कुछ भी मैं चाहूँ
    बोल ना मेरे यारा कैसे हो सकता है
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    मैं ने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो
    लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो

    तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ
    तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो

    अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझ को
    ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो

    ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या
    और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो

    ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं
    मैं ने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो
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    अ'र्ज़-ए-अलम ब-तर्ज़-ए-तमाशा भी चाहिए
    दुनिया को हाल ही नहीं हुलिया भी चाहिए

    ऐ दिल किसी भी तरह मुझे दस्तियाब कर
    जितना भी चाहिए उसे जैसा भी चाहिए

    दुख ऐसा चाहिए कि मुसलसल रहे मुझे
    और उस के साथ साथ अनोखा भी चाहिए

    इक ज़ख़्म मुझ को चाहिए मेरे मिज़ाज का
    या'नी हरा भी चाहिए गहरा भी चाहिए

    इक ऐसा वस्फ़ चाहिए जो सिर्फ़ मुझ में हो
    और उस में फिर मुझे यद-ए-तूला भी चाहिए

    रब्ब-ए-सुख़न मुझे तिरी यकताई की क़सम
    अब कोई सुन के बोलने वाला भी चाहिए

    क्या है जो हो गया हूँ मैं थोड़ा बहुत ख़राब
    थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए

    हँसने को सिर्फ़ होंट ही काफ़ी नहीं रहे
    'जव्वाद-शैख़' अब तो कलेजा भी चाहिए
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    Jawwad Sheikh
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    नहीं है मुन्हसिर इस बात पर यारी हमारी
    के तू करता रहे नाहक़ तरफदारी हमारी

    अंधेरे में हमें रखना तो ख़ामोशी से रखना
    कही बेदार ना हो जाए बेदारी हमारी

    मगर अच्छा तो ये होता हम एक साथ रहते
    भरी रहती तेरे कपड़ो से अल्मारी हमारी

    हम आसानी से खुल जाए मगर एक मसला है
    तुम्हारी सतह से ऊपर है तहदारी हमारी

    कहानीकार ने किरदार ही ऐसा दिया है
    अदाकारी नहीं लगती अदाकारी हमारी

    हमें जीते चले जाने पर माइल करने वाली
    यहा कोई नहीं लेकिन सुखनकारी हमारी
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    Jawwad Sheikh
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