Kamran Abbas

Top 10 of Kamran Abbas

    वो मुझ से दूर हुआ मेरे पास आते हुए
    अँधेरा हो गया घर में दिया जलाते हुए
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    ज़िंदगी इस तरह गुज़री है ग़मों के दरमियाँ
    दर्द थे इतने कि मेरा मुस्कुराना रह गया
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    ख़ंजर गले पे रख के मोहब्बत के नाम का
    धड़कन वफ़ा की रोक दी ज़ालिम मिज़ाज ने
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    तुम मुझ से हो ख़फ़ा या दिल तुम से गुरेज़ाँ है
    नज़दीकियों में अपनी सदियों की दूरियाँ हैं
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    कोई पूछे तो ज़रा क्या है ये अंदाज़-ए-सुख़न
    लहजा शीरीं है मगर ज़ख़्म लगे जाते हैं
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    रात भर दीदा-ए-पुर-नूर से मुख़ातिब थे
    फ़ज्र होते ही हमें तीरगी नज़र आई
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    दिल के एक गोशे में तीरगी है यादों की
    और इस ज़माने में चार सू उजाला है
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    टूटे सपनों से मुझे रोज़ घुटन होती है
    साँस लेता हूँ तो सीने में चुभन होती है
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    अश'आर अधूरे हैं किरदार अधूरे हैं
    मिलने के लिए आओ घर-बार अधूरे हैं
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    तीरगी बैठी है मेरे घर में
    और तो हर तरफ़ उजाले हैं
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