Karan Sahar

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    उस की निगाह-ए-नाज़ में आने के वास्ते
    मेहनत के साथ-साथ मुक़द्दर भी चाहिए
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    ज़ख़्म है दर्द है दवा भी है
    जैसे जंगल है रास्ता भी है

    यूँँ तो वादे हज़ार करता है
    और वो शख़्स भूलता भी है

    हम को हर सू नज़र भी रखनी है
    और तेरे पास बैठना भी है

    यूँँ भी आता नहीं मुझे रोना
    और मातम की इब्तिदा भी है

    चूमने हैं पसंद के बादल
    शाम होते ही लौटना भी है
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    Karan Sahar
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    वस्ल की बात ही नहीं होती
    इस तरह आशिक़ी नहीं होती

    आग ख़ुद को लगाए बैठा हूँ
    फिर भी क्यूँ रौशनी नहीं होती

    हिज्र में ही तो ये सहूलत है
    वस्ल में शा'इरी नहीं होती
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    Karan Sahar
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    आप रोने लगे हैं सरगम में
    इस क़दर खो गए हैं मातम में

    हिज्र का दुख, विसाल के आँसू
    लुत्फ़ है दो नदी के संगम में

    इश्क़ इक मोजज़ा सा लगता है
    फूल खिलते हैं ज़र्द मौसम में

    शब की तारीकियाँ बताएँगी
    कितने आँसू छिपे हैं शबनम में
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    Karan Sahar
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    आरज़ू थी कि कभी उस के बराबर बैठूँ
    और इतना ही नहीं हाथ पकड़ कर बैठूँ

    तेरी दुनिया में पस-ओ-पेश बहुत हैं साक़ी
    इस से बेहतर है कि मैं शे'र कहूँ घर बैठूँ

    तुम तो मसरूफ़ बहुत रहने लगे हो ख़ुद में
    मुंतज़िर हूँ मैं, अगर तुम कहो बाहर बैठूँ
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    महसूस कर रहा हूँ तेरा शुमार ख़ुद में
    सो झाँकने लगा हूँ मैं बार-बार ख़ुद में

    तेरी चमक से रौशन हर रहगुज़ार होगा
    इतना तो मेरे जुगनू रख ऐतिबार ख़ुद में
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    कौन देता है सदा हम को घने जंगल में
    तू है या तेरा तसव्वुर है भरे जंगल में

    कोई मंज़िल है न रास्ता है न साया कोई
    मैं अकेला ही भटकता हूँ मेरे जंगल में
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    आधी रात गुज़रने को है
    कमरा ख़्वाब से भरने को है
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    न रोए तो बहुत आँसू गिरेंगे
    मुझे ही देख लो भीगा पड़ा हूँ
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    वो मुझे ले गया गुलों के बीच
    और कहने लगा कि ऐसा बन
    Karan Sahar
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