हमारा दिल भला अब क्या लगेगा
    हमारा दिल तो तुम सेे लग चुका है
    Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
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    तेरे आँचल तले बचपन सजा माँ
    उसी में लौट जाना चाहता हूँ

    मेरी पलकों पे अपने होंठ रख दे
    मैं फिर सपने सजाना चाहता हूँ
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    Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
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    कभी फुटपाथ पर कोई न सोए
    मैं "उज्ज्वल" आशियाना चाहता हूँ
    Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
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    पिता के कांध पर राजा सा बैठा
    वहीं बचपन सुहाना चाहता हूँ

    वो दादी की कहानी रात वाली
    उसी में लौट जाना चाहता हूँ
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    Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
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    मुझे तुम याद ना आना कभी भी
    मैं तुम को भूल जाना चाहता हूँ

    सताएं हिज्र की रातें तुम्हें भी
    मैं इतना याद आना चाहता हूँ
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    Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
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    नया इक घर बनाना चाहता हूँ
    जहाँ तुझ को बसाना चाहता हूँ

    तुझे दिल के बहुत ही पास रख कर
    तुझे हर ग़म दिखाना चाहता हूँ
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    Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
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    गुजारी है गमो की रात हम ने रो के कमरे में
    मेरी आँखों से नींदों को वो कुछ ऐसे चुरा निकला
    Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
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    वफा के नाम पर हम सेे ज़फा करता रहा जो दिल
    हमारी नींद सपने सब वो पल भर में उड़ा निकला
    Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
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    बुरी आदत सुरा पीना जो कहता था सदा मुझ सेे
    उसी के पास से देखो कि कैसे हैं सुरा निकला
    Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
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    जिसे समझा बहुत अच्छा वहीं कितना बुरा निकला
    मेरा ही यार हाथों में लिए कट्टा छुरा निकला
    Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
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