Kavi Bhimsen Singh Ujjwal

Kavi Bhimsen Singh Ujjwal

@kavibhim

Kavi Bhimsen Singh Ujjwal shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Kavi Bhimsen Singh Ujjwal's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Shayari
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  • Sher
ज़ख़्म जो भी थे भर चुके हैं अब
लोग दिल से उतर चुके हैं अब
Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
मैं किसी रोज़ जान दे दूँगा
दर्द हद से गुज़र चुके हैं अब
Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
हमारा दिल भला अब क्या लगेगा
हमारा दिल तो तुम सेे लग चुका है
Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
पढ़ाई में नहीं लगता है जानाँ
हमारा दिल तो तुम सेे लग चुका है
Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
तेरे आँचल तले बचपन सजा माँ
उसी में लौट जाना चाहता हूँ

मेरी पलकों पे अपने होंठ रख दे
मैं फिर सपने सजाना चाहता हूँ
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Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
कभी फुटपाथ पर कोई न सोए
मैं "उज्ज्वल" आशियाना चाहता हूँ
Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
पिता के कांध पर राजा सा बैठा
वहीं बचपन सुहाना चाहता हूँ

वो दादी की कहानी रात वाली
उसी में लौट जाना चाहता हूँ
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Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
मुझे तुम याद ना आना कभी भी
मैं तुम को भूल जाना चाहता हूँ

सताएं हिज्र की रातें तुम्हें भी
मैं इतना याद आना चाहता हूँ
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Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
नया इक घर बनाना चाहता हूँ
जहाँ तुझ को बसाना चाहता हूँ

तुझे दिल के बहुत ही पास रख कर
तुझे हर ग़म दिखाना चाहता हूँ
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Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
गुजारी है गमो की रात हम ने रो के कमरे में
मेरी आँखों से नींदों को वो कुछ ऐसे चुरा निकला
Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
वफा के नाम पर हम सेे ज़फा करता रहा जो दिल
हमारी नींद सपने सब वो पल भर में उड़ा निकला
Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
बुरी आदत सुरा पीना जो कहता था सदा मुझ सेे
उसी के पास से देखो कि कैसे हैं सुरा निकला
Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
समझकर के ख़ुदा जिस को बिठा बैठे थे माथे पर
वही इंसान सारे भ्रम मुझ
में से मिटा निकला
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Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
कभी उज्ज्वल ने छोड़ी थी जहांदारी लिए जिस के
वही इंसान अपने हाथ हाथों से छुड़ा निकला
Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
लुटा दूँगा मैं अपनी जान तक तेरे लिए जानूं
वो कहता था मगर इक दिन मेरी ही जाँ चुरा निकला
Kavi Bhimsen Singh Ujjwal
जिसे समझा बहुत अच्छा वहीं कितना बुरा निकला
मेरा ही यार हाथों में लिए कट्टा छुरा निकला
Kavi Bhimsen Singh Ujjwal