अब पाक यहाँ कोई किरदार नहीं होता
दिखता है भले लेकिन वो प्यार नहीं होता
कब इश्क़ के दीवाने नुक़सान नफ़ा देखे
जो सोच के हो जाए वो प्यार नहीं होता
झुक जाती अना थोड़ी फिर टूट नहीं सकते
नाता कोई भी इतना लाचार नहीं होता
मसरूफ़ हुआ हर दिन अब चैन सुकूँ चाहत
इतवार भी पहले सा इतवार नहीं होता
आते हैं वो अक्सर छत पे चाँद की ख़्वाहिश में
यूँँ जागना अपना भी बेकार नहीं होता
पत्थर है ख़ुदा कहते मुझ सेे ये जहाँ वाले
जब उस के करम से घर गुलज़ार नहीं होता
हो जानना मुझ को तो दिल पे मेरे दो दस्तक
हर बार मेरा चेहरा अख़बार नहीं होता
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