एक चेहरे से उतरती हैं नक़ाबें कितनी
    लोग कितने हमें इक शख़्स में मिल जाते हैं
    Khalil Ur Rehman Qamar
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    तेरे दिल के निकाले हम कहाँ भटके कहाँ पहुँचे
    मगर भटके तो याद आया भटकना भी ज़रूरी था
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    मैं समझा था तुम हो तो क्या और माँगू
    मेरी ज़िन्दगी में मेरी आस तुम हो

    ये दुनिया नहीं है मेरे पास तो क्या
    मेरा ये भरम था मेरे पास तुम हो
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    Khalil Ur Rehman Qamar
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    कुछ न रह सका जहाँ विरानियाँ तो रह गईं
    तुम चले गए तो क्या कहानियाँ तो रह गईं
    Khalil Ur Rehman Qamar
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    "मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम"
    मेरी शोहरत मेरा डंका
    मेरे ए'जाज़ का सुन कर
    कभी ये न समझ लेना
    मैं चोटी का लिखारी हूँ
    मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम
    मैं छोटा सा ब्योपारी हूँ

    मेरी आरत पे बरसों से
    जो महँगे दाम बिकता है
    वो तेरे ग़म का सौदा है
    तेरी आँखें तेरे आँसू
    तेरी चाहत तेरे जज़्बे
    यहाँ सेल्फों पे रखे हैं
    वही तो मैं ने बेचे हैं

    तुम्हारी बात छिड़ जाए तो बातें बेच देता हूँ
    ज़रूरत कुछ ज़ियादा हो तो यादें बेच देता हूँ

    तुम्हारे नाम के सदके बहुत पैसा कमाया है
    नई गाड़ी ख़रीदी है नया बँगला बनाया है

    मगर क्यूँँ मुझ को लगता है
    मेरे अंदर का ब्योपारी
    तुम्हीं को बेच आया है
    मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम
    मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम
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    Khalil Ur Rehman Qamar
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    "याद है पहले रोज़ कहा था"

    याद है पहले रोज़ कहा था
    फिर न कहना ग़लती दिल की
    प्यार समझ के करना लड़की
    प्यार निभाना होता है
    फिर पार लगाना होता है

    याद है पहले रोज़ कहा था
    साथ चलो तो पूरे सफ़र तक
    मर जाने की अगली ख़बर तक
    समझो यार ख़ुदा तक होगा
    सारा प्यार वफ़ा तक होगा
    फिर ये बंधन तोड़ न जाना
    छोड़ गए तो फिर न आना
    छोड़ दिया जो तेरा नहीं है
    चला गया जो मेरा नहीं है

    याद है पहले रोज़ कहा था
    या तो टूट के प्यार न करना
    या फिर पीठ पे वार न करना
    जब नादानी हो जाती है
    नई कहानी हो जाती है
    नई कहानी लिख लाऊँगा
    अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा
    तेरे गुल जब खिल जाएँगे
    मुझ को पैसे मिल जाएँगे

    याद है पहले रोज़ कहा था
    बिछड़ गए तो मौज उड़ाना
    वापस मेरे पास न आना
    जब कोई जा कर वापस आए
    रोए तड़पे या पछताए
    मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ
    साथ दोबारा चलता नहीं हूँ
    गुम जाता हूँ खो जाता हूँ
    मैं पत्थर का हो जाता हूँ
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    Khalil Ur Rehman Qamar
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    जैसे हर ज़ेहन को ज़ंजीर से डर लगता है
    पीर-ओ-मुर्शद मुझे हर पीर से डर लगता है

    मक़्तब-ए-फ़िक्र की बोहतात जहाँ होती है
    तर्जुमा ठीक है तफ़सीर से डर लगता है

    जिस
    में तक़दीर बदलने की सहूलत न मिले
    ऐसी लिक्खी हुई तक़दीर से डर लगता है

    जिस सेे चुप चाप ज़मीरों को सुलाया जाए
    ऐसे कम-ज़र्फ़ की तक़दीर से डर लगता है
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    Khalil Ur Rehman Qamar
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    अश्क-ए-नादाँ से कहो बा'द में पछताएँगे
    आप गिरकर मेरी आँखों से किधर जाएँगे

    अपने लफ़्ज़ों को तकल्लुम से गिरा कर जाना
    अपने लहजे की थकावट में बिखर जाएँगे

    इक तेरा घर था मेरी हद-ए-मुसाफ़ित लेकिन
    अब ये सोचा है कि हम हद से गुज़र जाएँगे

    अपने अफ़्कार जला डालेंगे काग़ज़ काग़ज़
    सोच मर जाएगी तो हम आप भी मर जाएँगे

    इस सेे पहले कि जुदाई की ख़बर तुम सेे मिले
    हम ने सोचा है कि हम तुम सेे बिछड़ जाएँगे
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    Khalil Ur Rehman Qamar
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    ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना था वो ख़्वाब में भी मिले
    मैं नींद नींद को तरसा मगर नहीं सोया

    ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल था कि थम गई बारिश
    ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म है कि मैं नहीं रोया
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    Khalil Ur Rehman Qamar
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    आँख में नम तक आ पहुँचा हूँ
    उस के ग़म तक आ पहुँचा हूँ

    पहली बार मुहब्बत की थी
    आख़िरी दम तक आ पहुँचा हूँ
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    Khalil Ur Rehman Qamar
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