वो आँखों से आँखें मिला कर गया है
वो अपनी ख़ताएँ छुपा कर गया है
वो क्या ज़िन्दगी ढूँढ़ता है किसी में
जो मुझ
में ज़माने बिता कर गया है
मुझे दुख यही है कि वो बे-वफ़ाई
का इल्ज़ाम मुझ पर लगा कर गया है
ये कैसी जुदाई है जिस
में वो इंसाँ
कहाँ जा रहा है, बता कर गया है
नहीं बदला है कुछ भी जाने से उस के
वो बस इन्तिज़ारी बढ़ा कर गया है
रुलाना उसे अब भी आया नहीं है
वो मासूमियत पे हँसा कर गया है
तुझे ‘किंशु’ कहने में दिक़्क़त है उस को
मगर तू तो उस को ख़ुदा कर गया है
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