यहाँ अब कौन करता है ज़माने में वफ़ा उल्फ़त
    यहाँ उल्फ़त के आड़े जिस्म के व्यापार होते हैं

    मुझे बीता हुआ अपना ज़माना याद आता है
    कहाँ फिर से वो बचपन के भला इतवार होते हैं
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    Puneet Mishra Akshat
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    तुम्हारे ख़्वाब बिछड़े आ रहे हैं
    हमें ये बारहा तड़पा रहे हैं

    वहाँ पर तुम किसी से मिल रहे हो
    यहाँ सिगरट जलाए जा रहे हैं
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    किसी की चंद रातों का सुधाकर हो नहीं पाया
    तुम्हारी उर्मियों का मैं, उर-अंतर हो नहीं पाया

    सरल थीं मन की प्रतिमाएं, मगर अफ़सोस है इतना
    मैं सब कुछ था तेरा, मेहंदी महावर हो नहीं पाया
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    तुम से बिछड़ कर और निखरने वाले हैं
    हम माँ की बाँहों में मरने वाले हैं
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    एक बरस अब पूरा होने वाला है
    पिछले साल इसी मौसम में बिछड़े थे
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    दिल में नफ़रत थी जली हैं बस्तियाँ
    ले गए वो सामने से अर्थियाँ

    कह गए आँसू मिरे अल्फ़ाज वो
    जो न थीं कह पाई ये ख़ामोशियाँ

    यूँँ तमाशा मत करो इस प्यार का
    इस तमाशे पर लगी हैं बोलियाँ

    बेवज़ह काटा गया है ये शज़र
    रौंद कर इस को गई थीं आँधियाँ

    आपने तन्हा बनाया है मुझे
    कुछ तो होंगी आप की मज़बूरियाँ

    हम चमन में फिर से लाएँगे अमन
    मन्दिरों मस्ज़िद की कर के सन्धियाँ
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    जिसे चाहा वही अपना तो दिलबर हो नहीं सकता
    मुहब्बत का सबब हर दम मुयस्सर हो नहीं सकता

    कभी ग़र लग गया दामन पे धब्बा इस ज़माने का
    तो कितना कुछ भी कर लो पर वो बेहतर हो नहीं सकता

    ज़ला दो आज नफ़रत को मुहब्बत के हवाले से
    जहाँ पर बैर हो सब सेे कभी घर हो नहीं सकता

    मिलेगा बस तुम्हें उतना लिखा जितना नसीबों में
    जिसे चाहें वही अपना मुकद्दर हो नहीं सकता

    जुदा होकर सफ़र के बीच से फिर छोड़ कर जाना
    हमारा दिल तुम्हारे दिल-सा पत्थर हो नहीं सकता
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    हर दिए को मुयस्सर नहीं रौशनी
    रात भर एक जुगनू जला रह गया

    मैं ने रस्में-निशानी में दिल दे दिया
    और वो था के बस बे-वफ़ा रह गया
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    Puneet Mishra Akshat
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    सपनों का संसार बना कर क्या पाया?
    इक झूठा अख़बार बना कर क्या पाया?

    इश्क़ तुम्हारे पहलू में आ गिरता ख़ुद
    ग़ैरत-सा क़िरदार बना कर क्या पाया?
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    Puneet Mishra Akshat
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    कितने दर्द सहेजे हम ने,तब जा कर ये गीत लिखे हैं
    तुम क्या जानों इन नयनों की कितनी पीर पुरानी होगी
    Puneet Mishra Akshat
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