बा'द मुद्दत के हम ने घर देखा
यूँँ लगा ज्यूँँ ख़ुदा का दर देखा
खिड़कियाँ देखी,बाम ओ दर देखा
फिर दीवारों को आँख भर देखा
इक शजर रोया देख कर मुझ को
ला-मकानी का जब असर देखा
उस ने आँखों में झाँकना चाहा
आँख नम थी, इधर उधर देखा
याद बाबा की ख़ूब आई हमें
हम ने जब माँ का सूना सर देखा
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