Rahat Indori

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    किस ने दस्तक दी ये दिल पर कौन है
    आप तो अंदर हैं बाहर कौन है
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    गुलाब ख़्वाब दवा ज़हर जाम क्या क्या है
    मैं आ गया हूँ बता इंतिज़ाम क्या क्या है
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    ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे
    मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे

    तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव
    मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे

    तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है?
    जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
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    मुझ में कितने राज़ हैं बतलाऊँ क्या
    बंद एक मुद्दत से हूँ खुल जाऊँ क्या

    आजिज़ी मिन्नत ख़ुशामद इल्तिजा
    और मैं क्या क्या करूँँ मर जाऊँ क्या

    तेरे जलसे में तेरा परचम लिए
    सैकड़ों लाशें भी हैं गिनवाऊँ क्या

    कल यहाँ मैं था जहाँ तुम आज हो
    मैं तुम्हारी ही तरह इतराऊँ क्या

    एक पत्थर है वो मेरी राह का
    गर न ठुकराऊँ तो ठोकर खाऊँ क्या

    फिर जगाया तू ने सोए शे'र को
    फिर वही लहजा दराज़ी आऊँ क्या
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    रास्ते में फिर वही पैरों का चक्कर आ गया
    जनवरी गुज़रा नहीं था और दिसंबर आ गया

    ये शरारत है, सियासत है, के है साज़िश कोई
    शाख़ पर फल आएँ इस सेे पहले पत्थर आ गया

    मैं ने कुछ पानी बचा रखा था अपनी आँख में
    एक समुंदर अपने सूखे होंठ ले कर आ गया

    अपने दरवाज़े पे मैं ने पहले ख़ुद आवाज़ दी
    और फिर कुछ देर में ख़ुद ही निकल कर आ गया

    मैं ने बस्ती में कदम रखा तो यूँ लगा
    जैसे जंगल मेरे पैरो से लिपट कर आ गया

    पाँव के ठोकर में जिस के तेरे तख़्तों ताज है
    शाह से जा कर कोई कह दे कलंदर आ गया
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    झूठों ने झूठों से कहा है सच बोलो
    सरकारी एलान हुआ है सच बोलो

    घर के अंदर तो झूठों की एक मंडी है
    दरवाज़े पर लिखा हुआ है सच बोलो

    गुलदस्ते पर यकजहती लिख रक्खा है
    गुलदस्ते के अंदर क्या है सच बोलो

    गंगा मइया डूबने वाले अपने थे
    नाव में किस ने छेद किया है सच बोलो
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    बुलाती है मगर जाने का नहीं
    ये दुनिया है इधर जाने का नहीं

    मेरे बेटे किसी से इश्क़ कर
    मगर हद से गुज़र जाने का नहीं

    ज़मीं भी सर पे रखनी हो तो रखो
    चले हो तो ठहर जाने का नहीं

    सितारे नोच कर ले जाऊँगा
    मैं ख़ाली हाथ घर जाने का नहीं

    वबा फैली हुई है हर तरफ़
    अभी माहौल मर जाने का नहीं

    वो गर्दन नापता है नाप ले
    मगर जालिम से डर जाने का नहीं
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    शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम
    आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
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    ये अलग बात कि ख़ामोश खड़े रहते हैं
    फिर भी जो लोग बड़े हैं, वो बड़े रहते हैं
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    सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
    किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है
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