जो शख़्स जी रहा हो उसूलों की ज़िंदगी
    डरता नहीं वो शख़्स ज़माने को देख कर
    salman khan "samar"
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    तारीख़ मुझे याद रखे या न रखे पर
    तारीख़ बदलने की हिमाकत मैं करूँँगा
    salman khan "samar"
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    मजबूत हैं उसूल बुज़ुर्गों के आज भी
    देखो तो आज़मा के उन्हें एक बार तुम
    salman khan "samar"
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    होती हैं किस तरह की परेशानियाँ उन्हें
    शायद कभी बुज़ुर्ग बनो तो समझ सको
    salman khan "samar"
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    जलते चिरागों को बुझाना तो पड़ेगा
    सुब्ह में सूरज को बुलाना तो पड़ेगा
    salman khan "samar"
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    चंदन को माथे पे लगा के बैठी है
    चेहरे पे मुस्कान रखा के बैठी है

    एक सहेली है मेरी जो कि आजकल
    अपने कृष्ण से नैन लड़ा के बैठी है
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    salman khan "samar"
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    बाँध कर रख ले ज़रा बालों को तू अपने सनम
    खुल गए जो बाल तेरे तो गिरे है बिजलियाँ
    salman khan "samar"
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    दिसंबर आता है तो तेरी याद आती है
    वो पहली पहली मुलाक़ात याद आती है
    salman khan "samar"
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    याद ग़ालिब ने किया है हम को अपने शहर में तो
    लाज़मी है हम सभी पर इल्म कुछ हासिल करेंगे
    salman khan "samar"
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    सामने मेरे वो बैठा था मगर ख़ामोश था
    और मैं उस के बोल सुनने को बड़ा बेताब था
    salman khan "samar"
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