Shakeb Jalali

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    भीगी हुई इक शाम की दहलीज़ पे बैठे
    हम दिल के सुलगने का सबब सोच रहे हैं
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    मुझे गिरना है तो मैं अपने ही क़दमों में गिरूँ
    जिस तरह साया-ए-दीवार पे दीवार गिरे
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    ये एक अब्र का टुकड़ा कहाँ कहाँ बरसे
    तमाम दश्त ही प्यासा दिखाई देता है
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    बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका
    हम जिस पे मर मिटे वो हमारा न हो सका

    रह तो गई फ़रेब-ए-मसीहा की आबरू
    हर चंद ग़म के मारों का चारा न हो सका

    ख़ुश हूँ कि बात शोरिश-ए-तूफ़ाँ की रह गई
    अच्छा हुआ नसीब किनारा न हो सका

    बे-चारगी पे चारागरी की हैं तोहमतें
    अच्छा किसी से इश्क़ का मारा न हो सका

    कुछ इश्क़ ऐसी बख़्श गया बे-नियाज़ियाँ
    दिल को किसी का लुत्फ़ गवारा न हो सका

    फ़र्त-ए-ख़ुशी में आँख से आँसू निकल पड़े
    जब उन का इल्तिफ़ात गवारा न हो सका

    उल्टी तो थी नक़ाब किसी ने मगर 'शकेब'
    दा'वों के बावजूद नज़ारा न हो सका
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    सोचता हूँ कि वो कितने मा'सूम थे क्या से क्या हो गए देखते-देखते
    मैं ने पत्थर से जिन को बनाया सनम वो ख़ुदा हो गए देखते-देखते

    हश्र है वहशत-ए-दिल की आवारगी हम से पूछो मोहब्बत की दीवानगी
    जो पता पूछते थे किसी का कभी लापता हो गए देखते-देखते

    हम से ये सोच कर कोई वा'दे करो एक वा'दा पे 'उम्रें गुज़र जाएँगी
    ये है दुनिया यहाँ कितने अहल-ए-वफ़ा बे-वफ़ा हो गए देखते-देखते

    ग़ैर की बात तस्लीम क्या कीजिए अब तो ख़ुद पर भी हम को भरोसा नहीं
    अपना साया समझते थे जिन को कभी वो जुदा हो गए देखते-देखते
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    सोचो तो सिलवटों से भरी है तमाम रूह
    देखो तो इक शिकन भी नहीं है लिबास में
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    पहले तो मेरी याद से आई हया उन्हें
    फिर आइने में चूम लिया अपने-आप को
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    प्यार की जोत से घर घर है चराग़ाँ वर्ना
    एक भी शम्अ' न रौशन हो हवा के डर से
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    आज भी शायद कोई फूलों का तोहफ़ा भेज दे
    तितलियाँ मंडला रही हैं काँच के गुल-दान पर
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    तू ने कहा न था कि मैं कश्ती पे बोझ हूँ
    आँखों को अब न ढाँप मुझे डूबता भी देख
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