Subhan Asad

Top 10 of Subhan Asad

    ये काँटे, ये धूप, ये पत्थर इनसे कैसा डरना है
    राहें मुश्किल हो जाएँ तो छोड़ी थोड़ी जाती हैं
    Subhan Asad
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    जब भी उस कूचे में जाना पड़ता है
    ज़ख़्मों पर तेज़ाब लगाना पड़ता है

    उस के घर से दूर नहीं है मेरा घर
    रस्ते में पर एक ज़माना पड़ता है
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    उस ने पूछा था पहले हाल मेरा
    फिर किया देर तक मलाल मेरा

    मैं वफ़ा को हुनर समझता था
    मुझ पे भारी पड़ा कमाल मेरा
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    तुम्हें देखे ज़माना हो गया है
    नज़र महके ज़माना हो गया है

    बिछड़के तुम सेे आँखें बुझ गई हैं
    ये दिल धड़के ज़माना हो गया है
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    उस ने ये कहके मुझे छोड़ दिया
    हाशिया छोड़ दिया जाता है
    Subhan Asad
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    तू इस तरह से मिला फिर मलाल भी न रहा
    तेरे ख़याल में अपना ख़याल भी न रहा

    कुछ इस अदास झुकी थी हया से आँख तेरी
    हमारी आँख में कोई सवाल भी न रहा
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    मैं एक ठहरा हुआ पुल, तू बहता दरिया है
    तुझे मिलूँगा तो फिर टूट कर मिलूँगा मैं
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    रिश्तों की ये नाज़ुक डोरें तोड़ी थोड़ी जाती हैं,
    अपनी आँखें दुखती हों तो फोड़ी थोड़ी जाती हैं

    ये काँटे, ये धूप, ये पत्थर इनसे कैसा डरना है
    राहें मुश्किल हो जाएँ तो छोड़ी थोड़ी जाती हैं
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    Subhan Asad
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    मैं जानता हूँ तेरी रूह की तलब जानाँ
    तुझे बदन की तरफ़ से नहीं छुऊँगा मैं
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    गिला नहीं कि मेरे हाल पर हँसी दुनिया
    गिला तो ये है कि पहली हँसी तुम्हारी थी
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