ADITYA TIWARI

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    आसमाँ शान में अपनी अभी बोला ही था
    और तभी टूटते तारे ने हक़ीक़त कह दी
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    मेरे हालात पे दुनिया को तरस आता है
    बस मिरी आह को मैं ही नहीं सुन पाता हूँ
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    मिरी ये ज़िंदगी हद से ज़ियादा क्या होगी
    बहुत ज़ियादा भी होगी तो बस फ़ना होगी

    किसी कम अक्ल का क़लमा भी होगा इक बकवास
    किसी ज़हीन की गाली भी फ़लसफ़ा होगी

    भुगत रहा हूँ सज़ा माज़ी की मैं बन कर ख़ार
    और आज ख़ार हूँ कल इस की भी सज़ा होगी

    तुम्हारे बा'द मुझे मौत से भी क्या होगा
    तुम्हारे बा'द मिरी ज़िंदगी भी क्या होगी

    मिरे ज़हान में आने का क्या सबब है शम्स
    मिरे जहान से जाने की वज्ह क्या होगी
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    एक धोका है ख़ुश नहीं हूँ मैं
    कौन कहता है ख़ुश नहीं हूँ मैं

    एक रिश्ता बचाना है जिस
    में
    वो भी तन्हा है ख़ुश नहीं हूँ मैं

    क्या सबब है कि सिर्फ़ मेरे ब-जुज़
    सब को लगता है ख़ुश नहीं हूँ मैं

    ख़ुश-मिज़ाजी में शा'इरी कैसी
    फिर तो अच्छा है ख़ुश नहीं हूँ मैं

    क्या सितम है कि तुम को पा कर भी
    ऐसा लगता है ख़ुश नहीं हूँ मैं

    यार ऐसे हैं क्या कहूँ तुम सेे
    यार ऐसा है ख़ुश नहीं हूँ मैं
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    मेरे हम साए को मुझ सेे जी चुराना आ गया
    जब मैं उस के सामने जैसा था वैसा आ गया

    मुत्मइन था पूरे घर में रौशनी भर दूँगा आज
    पहला दीया ही जला और ख़ुद का साया आ गया

    फिर बताऊँगा सभी को सर झुकाने का हुनर
    पहले ख़ुद हैरान हो लूँ ये मुझे क्या आ गया

    छूने की ज़िद में उसे महसूस कर पाया नहीं
    प्यास ही ले कर गया था और प्यासा आ गया

    क्या अँधेरा मिट गया सबने फ़क़त पूछा यही
    कब किसी को थी तसल्ली दीप ज़िंदा आ गया
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    न इतनी पास है मंज़िल कि तय करें पैदल
    न इतनी दूर कि कोई सवारी मिल जाए
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    वक़्त के दुख में मिरी आँखों से छलके आँसू
    हो गए अश्क मिरे ऐसे अजल के आँसू

    इतना ग़म था कि मिरी ओर से रोया अंबर
    हो गए अब्र तिरे हिज्र में जल के आँसू

    वो कोई लाल सियाही नहीं है ख़त में सनम
    अबकी आँखों से गिरे रंग बदल के आँसू

    हर घड़ी सफ़्हे के आरिज़ पे नमी रहती है
    यूँँ तिरी याद में गिरते हैं ग़ज़ल के आँसू

    दिल ने फिर मारा तमाचा मिरी मजबूरी को
    फिर तिरा ज़िक्र चला आँख से छलके आँसू

    फिर ख़याल आया है तुम सेे है बिछड़ना इक दिन
    फिर चले आए हैं आँखों में टहल के आँसू

    अब की बारिश में कोई तुझ सेे भी तन्हा था शम्स
    रोके रुकते नहीं थे अब की फ़सल के आँसू
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    ऐसी नौबत न आए रिश्ते में
    तुझ सेे हारूँ तो हार हो मेरी
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    दिए बना तो रहा हूँ मगर दुखी हूँ मैं
    दिए के होने का मतलब है रात फिर होगी
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    इक वो हम सेे जो बिछड़ कर कभी तन्हा न लगे
    और इक हम के कभी फिर से शगुफ़्ता न लगे

    आह उस शब की सहर जिस
    में बिछड़ना था हमें
    हम तिरे साथ कभी पहले यूँँ तन्हा न लगे

    सिर्फ़ उसे बे-वफ़ा लिख दूँ ये ख़याल आया था
    फिर ये सोचा कहीं इस दिल को ही अच्छा न लगे

    इतना ख़ुश भी नहीं ये दिल के भुला दे तुझ को
    पर यूँँ ग़म में भी नहीं है कि दोबारा न लगे

    उफ़ के इस नूर भरे चेहरे पे काजल तौबा
    चाँद उतर आए तो भी आप के जैसा न लगे

    बे-वफ़ाई की भी तरतीब सिखा दी उस ने
    दिल भी इस तरह से तोड़ा कि शिकस्ता न लगे
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