Vashu Pandey

Top 10 of Vashu Pandey

    वो दर बने या राह की दीवार ख़ुश रहे
    मैं बस ये चाहता हूँ मेरा यार ख़ुश रहे

    ऐसा कोई नहीं कि जिसे कोई ग़म नहीं
    ऐसा कोई नहीं जो लगातार ख़ुश रहे

    मेहमान रह गया है ये बस चंद रोज़ का
    कोशिश ये कीजिएगा कि बीमार ख़ुश रहे
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    तुम्हें कैसा लगेगा गर किसी पिंजरे में रख कर के
    कोई तुम सेे कहे तेरी हिफ़ाज़त कर रहे हैं हम
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    इतने कहाँ नसीब कि इस सेे प्यास बुझाएँ खेल करें
    दरिया हम जैसों को अपने पास बिठा ले काफ़ी है
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    अपना पूरा ज़ोर लगा कर बोल मोहब्बत ज़िन्दाबाद
    नफ़रत की दीवार गिरा कर बोल मोहब्बत ज़िन्दाबाद
    इश्क़ के मुनकिर पूछ रहे हैं पहले गर्दन देगा कौन
    अब तो दोनों हाथ उठा कर बोल मोहब्बत ज़िन्दाबाद

    तेरी चुप्पी ये साबित कर देगी कि तू बुज़दिल है
    वरना आँख से आँख मिलाकर बोल मोहब्बत ज़िन्दाबाद

    इस धरती से उस अंबर तक एक ही नारा गूँजेगा
    मेरे संग आवाज़ मिलाकर बोल मोहब्बत ज़िन्दाबाद
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    हर मंज़र पर जश्न मनाने नाचने गाने वाले लोग
    इक मुद्दत से चुप बैठे हैं शोर मचाने वाले लोग

    हम दोनों को समझाऍंगे डॉंटेंगे फटकारेंगे
    हम दोनों को कब समझेंगे ये समझाने वाले लोग
    इश्क़ क़ैस फ़रहाद रोमियो जैसे ही कर सकते हैं
    हम तो ठहरे दस से छह तक ऑफ़िस जाने वाले लोग

    कुछ चीज़ों का इस दुनिया में कोई नेमुल बदल नहीं है
    कैसे चाँद से काम चलाऍं तुझ को देखने वाले लोग
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    इतने गहरे उतर गया हूँ दरिया-ए-दर्द-ए-दिल में
    हाथ पकड़ कर खींच ले वरना डूब के भी मर सकता हूँ

    कट्टे ख़ंजर रस्सी माचिस कुछ दिन मुझ सेे दूर रखो
    कुछ करने से चूक गया हूँ मैं कुछ भी कर सकता हूँ
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    बड़े बुज़दिल हैं लेकिन फिर भी हिम्मत कर रहे हैं हम
    तुम्हारे शहर में रह कर मोहब्बत कर रहे हैं हम

    अभी तक ठीक से आई नहीं है धुन मोहब्बत की
    गुज़िश्ता सात जन्मों से रियाज़त कर रहे हैं हम

    तुम्हें कैसा लगेगा गर किसी पिंजरे में रख कर के
    कोई तुम सेे कहे तेरी हिफ़ाज़त कर रहे हैं हम

    वगरना जिस को छोड़ा है, उसे मुड़कर नहीं देखा
    ग़नीमत जान के तुझ सेे शिकायत कर रहे हैं हम

    मेरे रोने से ख़ाहिफ़ हैं मगर क्या इस सेे वाक़िफ़ हैं
    कि ये मातम भला किस की बदौलत कर रहे हैं हम
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    उम्र भर यूँँ ही जलते रहे रौशनी भी नहीं कर सके
    गाँव करना था रौशन हमें इक गली भी नहीं कर सके

    हम को इतना डराया गया मेरे मौला तेरे नाम से
    तेरे बंदे कभी ठीक से बंदगी भी नहीं कर सके

    बेख़ुदी में उठे थे क़दम आ फँसे ऐसे रस्ते पे हम
    मंज़िलें भी नहीं मिल सकी वापसी भी नहीं कर सके

    छोटे घर के बड़े थे सो हम ज़िम्मेदारी निभाते रहे
    आशिक़ी तो बड़ी बात थी ख़ुद-कुशी भी नहीं कर सके

    काम दो ही थे करने हमें आशिक़ी या तो फिर शा'इरी
    आशिक़ी भी नहीं कर सके शा'इरी भी नहीं कर सके
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    रात-रात भर जगने वाले तेरी ख़ैर
    आसमान को तकने वाले तेरी ख़ैर

    उस की सब तस्वीरें घर से बाहर फेंक
    ख़ुद दीवार से लगने वाले तेरी ख़ैर

    वक़्त हमेशा एक सा थोड़ी रहता है
    मेरे ऊपर हँसने वाले तेरी ख़ैर

    वो ख़त में आयात लिखा करती थी और
    लिखती थी कि पढ़ने वाले तेरी ख़ैर
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    आप जो ठीक समझते हैं वो करिए साहब
    ऐसे मौसम में मैं दफ़्तर तो नहीं आ सकता
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