Zafar Siddqui

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    जंग मैदान-ए-जंग में होगी
    क़त्ल भी अब किसी को होना है
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    हाथ में उस के अँगूठी नाक में थी उस के नथ
    रात मुझ को देख कर वो ख़ूब शरमाती रही
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    जिस ने ज़ख़्मों को ही उभारा हो
    साथ उस के कहाँ गुज़ारा हो

    चाँद कितना हसीन लगता है
    साथ में जब कोई सितारा हो

    इक इशारे पे जान भी दे दूँ
    काश तेरा अगर इशारा हो

    मुझ को डसने लगी है तन्हाई
    साथ कुछ रोज़ अब तुम्हारा हो

    होश खो बैठे ये ज़फर अपना
    इस क़दर हुस्न का नज़ारा हो
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    कुछ नहीं तेरी सुनने वाले अब
    तू लगा ले ज़बाँ पे ताले अब

    सब के सब कब तलक यूँँ बैठोगे
    पाँव घर से कोई निकाले अब

    जितना चाहे तराश डाले तू
    ख़ुद को तेरे किया हवाले अब

    ज़ुल्म तुम को नज़र नहीं आता
    साफ़ आँखों के कर लो जाले अब

    ज़ाइक़ा ही बिगड़ गया मुँह का
    ऐसे महँगे हुए निवाले अब

    मौत अब जान ले के छोड़ेगी
    है कोई जो तुझे बचा ले अब

    बुज़दिली अब नहीं दिखाऍंगे
    हो गए हैं ज़फर जियाले अब
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    मिल रहा है गले ज़फ़र दुश्मन
    ईद ऐसी बहार लाई है
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    प्यास बुझती नहीं होंठ सूखे पड़े
    हाल क्या हो गया ग़म के बाज़ार में

    रात कटती है बिस्तर पे करवट में अब
    चैन लूटा है तू ने सनम प्यार में
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    उम्र भर की मेरी कमाई हो
    पास आ हिज्र रिहाई हो

    तू कोई तो दवा बता ऐसी
    ज़ख़्म की जो मिरे दवाई हो

    ज़िन्दगी भर ही ज़ख़्म झेले हैं
    ज़ख़्म से काश अब जुदाई हो

    शोहरतें क्यूँ नहीं मिलेंगी मुझे
    हर तरफ़ मेरी भी बुराई हो

    फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
    काश इस बह्र में रुबाई हो

    एक पल भी बता मुझे ऐसा
    जब 'ज़फ़र' ने ख़ुशी मनाई हो
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    मैं ने बचा रखा है ईमान ज़िन्दगी में
    दूँ साथ हक का है ये अरमान ज़िन्दगी में

    मैं चल पड़ा मिटाने नफ़रत जहाँ से सारे
    ये राह भी नहीं है आसान ज़िन्दगी में
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    हुस्न की मत नुमाइश किया कीजिए
    यूँँ न बे-पर्दा छत पर दिखा कीजिए
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    दाग़ समझे है ज़माना
    चाँद हूँ माँ के लिए मैं
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