दिल एक तो फ़ुन्कारी है
    जिस पर शरारत तारी है

    ये जो शिकारी हैं नए
    इन की सदाक़त प्यारी है
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    Zohair Ahmad Sahil
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    दुनिया बदल रही है
    नगरी ये चल रही है

    सब को बना कर अपना
    बातों से जल रही है

    रातों में हर दिए की
    लौ भी दहल रही है

    जो ज़िंदगी थी मेरी
    लड़की फिसल रही है

    बर्बाद कर के मुझ को
    ख़ुद तो सँभल रही है

    यादों के इस चमन में
    कितना वो ढल रही है

    ख़ुशियाँ मना रही थी
    मुझ को निगल रही है

    'जोहैर' क्या बताएँ
    अब वो पिघल रही है
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    Zohair Ahmad Sahil
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    ये डरना कैसा डरना है
    जब मरना तो क्या जीना है
    Zohair Ahmad Sahil
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    हमें जी भर के पीने दो
    कुछ और दिन मुझ को जीने दो

    ये ज़ख़्म-ए-हिज्र है यारा
    इसे कुछ और सीने दो
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    Zohair Ahmad Sahil
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    सर झुका कर मिलूँ मुझ को आता नहीं
    इस लिए उस के दिल को मैं भाता नहीं

    इंतिहा के क़रीं है मोहब्बत मेरी
    क्या करूँँ मैं यक़ीं उस को आता नहीं

    जो मेरे पास होकर भी मेरा नहीं
    दर्द-ए-दिल में भी उस को सुनाता नहीं

    ख़्वाब था संग उस के कटे ज़िंदगी
    पर हक़ीक़त में वो पास आता नहीं
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    Zohair Ahmad Sahil
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    इक दिया था ग़म में सजा हुआ अपने ही दम पर डटा हुआ
    जिस की दीद थी मेरी ज़िंदगी वो कहीं पर है सजा हुआ
    Zohair Ahmad Sahil
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    अपनी मीज़ान बनाया था कभी
    ग़म को वीरान बनाया था कभी

    इक जहान उस ने सजाया था कभी
    हम को इंसान बताया था कभी

    ख़ैर-ओ-शर जिस
    में गिने जा सकते
    ऐसा मीज़ान बनाया था कभी

    जा के धरती पे बसेरा कर लो
    उस को फ़रमान बनाया था कभी

    जिस्म बेकार था मेरा जिस बिन
    वो मेरी जान बनाया था कभी
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    Zohair Ahmad Sahil
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    तुम्हें दिल में बसाया तो सही
    तुम्हें अपना बनाया तो सही
    Zohair Ahmad Sahil
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    ग़म को वीरान बनाया था कभी
    ऐसा ईमान बनाया था कभी
    Zohair Ahmad Sahil
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    ज़ीस्त है मुझ सेे ख़फ़ा लेकिन गिला कोई नहीं
    मसअला ये है कि मेरा मसअला कोई नहीं

    कट रही है ज़िंदगी बेकार फ़ुर्सत में यूँँ ही
    मश्ग़ला ये है कि मेरा मश्ग़ला कोई नहीं
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    Zohair Ahmad Sahil
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