दुनिया बदल रही है
नगरी ये चल रही है
सब को बना कर अपना
बातों से जल रही है
रातों में हर दिए की
लौ भी दहल रही है
जो ज़िंदगी थी मेरी
लड़की फिसल रही है
बर्बाद कर के मुझ को
ख़ुद तो सँभल रही है
यादों के इस चमन में
कितना वो ढल रही है
ख़ुशियाँ मना रही थी
मुझ को निगल रही है
'जोहैर' क्या बताएँ
अब वो पिघल रही है
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