Bhoomi Srivastava

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@Bhoomi890

Bhoomi Srivastava shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Bhoomi Srivastava's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm
बाप का साया नहीं था मुझ पे बचपन के दिनों में
इक बहादुर माँ के हाथों परवरिश मेरी हुई है
Bhoomi Srivastava
मेरी सच्चाई अब तो राएगाँ ही है
उसे कुछ वसवसों ने छीना है मुझ से
Bhoomi Srivastava
ये समुंदर ग़ालिबन औरत के अश्कों से बने हैं
ये जहाँ सदियों से औरत को रुलाता आ रहा है
Bhoomi Srivastava
मैं अगर इक फूल पर तेरी हसीं तस्वीर रख दूँ
ऐन मुमकिन है कि सारी तितलियाँ उस पे मिलेंगी
Bhoomi Srivastava
बताओ ना तुम्हें किस रंग के गुल रास आते हैं
उसी की बाग़बानी सीख लेना फ़र्ज़ है मेरा
Bhoomi Srivastava
मिरा क्या हाल है तुम से अलग हो के
दिखाऊँगी हथेली उँगलियों के बिन
Bhoomi Srivastava
क्यूँ उसे हम दूर से देखा करें
प्यार है तो खुल के फिर इज़हार हो
Bhoomi Srivastava
मेरे होंठों पे उस के नाम का हर पल तराना है
वो दीवाना समझता है वही केवल दिवाना है

उसे मैं, मुझ को वो सारी कमी के साथ है मंज़ूर
मुहब्बत के दयारों में यही अपना फ़साना है
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Bhoomi Srivastava
कभी नहीं क़ुबूल होगी ये दुआ मेरी मगर
सितारे टूटते गए मैं उस को माँगती रही
Bhoomi Srivastava
एक पंछी जिस को उड़ने की तलब थी चाह थी पर
घोंसले से प्यार इतना था कि वो फिर उड़ न पाई
Bhoomi Srivastava
गाँव में तन्हा हुए माँ बाप के चिंतक सभी हैं
शहर में रहते हुए बच्चों के आलम कौन जाने
Bhoomi Srivastava
जब से जाना है तुम्हें है शौक़ पढ़ने लिखने का
मैं ने आँखों को किताबों सा बना कर रख दिया
Bhoomi Srivastava
जब सियासती मुद्दे ख़त्म होंगे दुनिया से
क्या पता तभी सुधरे काइनात दुखड़ों की
Bhoomi Srivastava
होली मुबारक तुझ को और
बदले तेरे रंगों को भी
Bhoomi Srivastava
तेरे आने से मेरे चेहरे पर रंगत है
इस
में होली के रंगों का कोई हाथ नहीं
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Bhoomi Srivastava
सब कुछ सही था अब तलक
फिर वो अचानक दिख गया
Bhoomi Srivastava
मैं नफ़रत उस से कैसे कर लूँ जिस ने
मुझे काँटे हटाकर गुल दिए हैं
Bhoomi Srivastava
गुलाबों की तरह नाज़ुक है मेरा दोस्त
किताबों की तरह मैं ध्यान रक्खूँगी
Bhoomi Srivastava
कितना किया है 'भूमि' तू ने इस जहाँ के वास्ते
बदले में तुझ को क्या मिला है बे-वफ़ाई के सिवा
Bhoomi Srivastava
ज़रा सी चोट पर मेरी उठाता था जो पर्वत
ज़माने हो गए हैं उस ने आलम तक न पूछा
Bhoomi Srivastava

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