Sanjay Bhat

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Sanjay Bhat shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Sanjay Bhat's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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  • Nazm
कहाँ ऐसे मरासिम थे कि कोई लौट के आता
ख़िज़ाँ के फूल को ख़ूँ की नहीं अश्कों की हाजत थी
Sanjay Bhat
किस तरह पूछूँ वो कहाँ है कैसा है
अब माँ की बातें शोर लगती हैं उसे
Sanjay Bhat
फिर से मक़्तल में बहाएा है लहू क़ातिल का
फिर ये उम्मीद है अब कोई न मारा जाए
Sanjay Bhat
किसी ग़रीब के लिए यहाँ कोई दवा नहीं
इलाज हो कहाँ कि ज़ख़्म कोई भी दिखा नहीं
Sanjay Bhat
कोई दुनिया में आ कर तंग तो कोई न जाने से
सभी इंसाँ परेशाँ हैं किसी ज़ाती बहाने से
Sanjay Bhat
हम तमन्नाओं के बहलावे में आ तो जाएँ लेकिन
शौक़ वो बाक़ी कहाँ वो हौसला लाएँ कहाँ से
Sanjay Bhat
और भी ग़म ज़ीस्त में हैं सिर्फ़ अपना ही नहीं
और सितम ये है कि हस्ती से रिहाई भी नहीं
Sanjay Bhat
नहीं लफ़्ज़ का इस क़दर ज़ोर है ज़िंदगी पर
कि मुमकिन नहीं एक भी हाँ मिरी ज़िंदगी में
Sanjay Bhat
ऐ रब तू कहीं तो बस्ता मंदिर में है तो मस्जिद में भी
ये माया है या जादू है कि तुझे भी सब्र-ओ-क़रार नहीं
Sanjay Bhat
दिल का अश्कों से सिलसिला रखना
ज़िंदगी का अटल तमाशा है
Sanjay Bhat
वक़्त मिरे हिस्से की मिट्टी खींच गया
गर्द से और धुएँ से मुझ को सींच गया

मैं खिलता भी तो क्या खिलता आँगन में
वो ज़ालिम हस्ती भी मेरी भींच गया
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Sanjay Bhat
ऐ रब तिरी तलाश से उकता गया हूँ मैं
चलते ही तेरी राह पे मुरझा गया हूँ मैं

थोड़ा तो खोल दे तू भी दिल का किवाड़ अब
हर बार ना-उमीद ही भेजा गया हूँ मैं
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Sanjay Bhat
ग़ालिब के रंज-ओ-ग़म देख के माना हम उन से अच्छे
उन को पढ़ के समझे क्या है दिया उस सूरज के आगे
Sanjay Bhat
माँगता ही रहा कुछ मिला भी नहीं
साँस लेता रहा मैं जिया भी नहीं

बस में कुछ भी नहीं मेरे ऐ ज़िंदगी
मेरे हक़ में तो मेरी दुआ भी नहीं
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Sanjay Bhat
बुझा चराग़ तोड़ना ज़रूरी तो नहीं
हवा के ज़ोर से बुझी है रौशनी मिरी

तू फिर से मुझ को लौ लगा के देख ले ज़रा
चमक उठेगी फिर ये शाम-ए-ज़िंदगी तिरी
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Sanjay Bhat
किसी उम्मीद को यूँँ पाल रक्खा है
कि लाचारी को कल पर टाल रक्खा है

हमें तो आज ही पाना है तुझ को दोस्त
तिरा कल के लिए रूमाल रक्खा है
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Sanjay Bhat
तराश मुझ को कि कोई मिरा सिरा निकले
सिरा दिखे जो अगर कोई सिलसिला निकले

वो सिलसिला हो तिरी मेरी ज़िंदगानी का
अगर जो निकले तो हर लफ़्ज़ हर गिला निकले
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Sanjay Bhat
कोई तमाम रात का जगा हुआ
किसी निगाह से कोई रिहा हुआ

नज़र ही लग गई उसे रक़ीब की
ज़माने भर से कोई बे-वफ़ा हुआ
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Sanjay Bhat
पिघलती है ये क़तरा क़तरा रंग अपना बदलती है
तिरी गर्मी की जुंबिश से तमन्ना भी फिसलती है

जवानी ख़त्म हो जाती है नादानी में जल जल के
दिल-ए-नादाँ को बिल-आख़िर ये मिट्टी ही निगलती है
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Sanjay Bhat
मंज़िलों की प्यास है ये ज़िंदगी
तेरी मेरी आस है ये ज़िंदगी

इस सफ़र में ख़ार भी हैं गुल के साथ
फिर भी कितनी ख़ास है ये ज़िंदगी
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Sanjay Bhat

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