Vishakt ki Kalam se

Vishakt ki Kalam se

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Vishakt ki Kalam se shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Vishakt ki Kalam se's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm
हवस में जीत के मैं सौ दफ़ा हारा हुआ हूँ
नगर की धूप वर्षा धूल का मारा हुआ हूँ

मुझे इस जान का मालिक न समझो लाश हूँ मैं
पसंदीदा हमारे फूल का मारा हुआ हूँ
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Vishakt ki Kalam se
कभी ख़ुद से लड़ाई का
मुझे मौक़ा नहीं देती

मुहब्बत मौत से की है
वही धोखा नहीं देती
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Vishakt ki Kalam se
नतीजे की कभी परवाह तो कर
मुहब्बत में मिलन की चाह तो कर

घुमा लेना उसे दिल के महल में
मगर दिल के महल में राह तो कर
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Vishakt ki Kalam se
अगर मेरा चले बस तो हवा भी पूछती मुझ सेे
बता माशूक को तेरी हमारी क्या ज़रूरत है
Vishakt ki Kalam se
नहीं नाम मेरा शरीफ़ों में लेकिन
समझ तू नहीं ये शरारत हमारी

अगर हम दिखा दें शराफ़त हमारी
ख़ुदा भी करेगा वकालत हमारी
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Vishakt ki Kalam se
क्या पुराने साल में तू ने बड़ा कुछ कर दिया है
या नए इस साल में तू कुछ बड़ा ही कर रहा है

ढूँढ़ता है रोज़ मौक़े' बस मिले दारू कहीं से
और पी कर फिर वही जो कर रहा था कर रहा है
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Vishakt ki Kalam se
हिसाबों की किताबें खोल अपनी
बता अब केस क्या हैं नाम मेरे

बता दे जो बकाया रह गया था
बता अब शेष क्या हैं काम मेरे
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Vishakt ki Kalam se
ज़रूरी तो नहीं उस की हँसी में प्यार ही हो
हँसी के इस जहाँ में और भी मतलब बहुत हैं
Vishakt ki Kalam se
मुझे आज़ाद कर दो रोज़ के इस मा'मले से अब
मुझे अब मौत बख़्शो जी चुका मैं ज़िंदगी अपनी
Vishakt ki Kalam se
मुझे जो साथ में भी रख न पाया
उसे दिल में बसाए घूमता हूँ

नहीं तस्वीर कोई पास मेरे
उसे मैं रोज़ मन में चूमता हूँ
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Vishakt ki Kalam se
बदल कर मैं कहानी को तुम्हें आज़ाद कर दूँ क्या
न कोई नाम लेगा फिर तुम्हारा साथ में मेरे
Vishakt ki Kalam se
मुझे इक काम है तुम से करोगे तो बताओ तुम
तुम्हें जब नींद आ जाए पता देना उसे मेरा
Vishakt ki Kalam se
दिनों की बात छोड़ो रात कैसे कट रही है
सुना है जुगनुओं से दोस्ती तुम कर रहे हो

बुरे हालात की कुछ ख़ास यादों को समेटे
उन्हीं से डर रहे हो और डर से मर रहे हो
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Vishakt ki Kalam se
सिकंदर से कभी आँखें मिलाना चाहता था
वही आँखें उठाना आज भारी हो गया है

नहीं जो मानता था हार छोटे खेल में भी
वही हारा ज़माने से लिखारी हो गया है
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Vishakt ki Kalam se
मुझे भी तो पिलाओ मैं नशा भी आज़माऊॅं
अमर हूँ मैं मुझे पी ज़हर भी तो मर गया है
Vishakt ki Kalam se
क्या हुआ ये भीड़ कैसी
ग़म नहीं फिर पीड़ कैसी
Vishakt ki Kalam se
बुराई तो कई हैं आज भी मुझ
में
मगर मैं आज भी धोखा नहीं देता
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Vishakt ki Kalam se
जवानी और मुश्किल लग रही है
वही बचपन सही था यार अपना
Vishakt ki Kalam se
हवा को रोकने की बात जैसे कर रहे हो तुम
मुझे ये नौकरी कम जेल ज़्यादा लग रही है जी
Vishakt ki Kalam se
घूँट भर ख़्वाहिश नहीं है
मैं समुंदर चाहता हूँ

लूट लो तुम ये हवाएँ
मैं बवंडर चाहता हूँ
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Vishakt ki Kalam se

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