Das Kanpuri

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@Da__as

Omkar Bhaskar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Omkar Bhaskar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
शब-ए-फ़िराक़ हावी है शब-ए-विसाल पे ऐ दोस्त
सियाह रात में अब तक बदन को कोफ़्त होती है
Das Kanpuri
मुहब्बत वस्ल हिजरत राग सारे
मदन मोहन की बंसी गा रही है
Das Kanpuri
रखूँ काँधे पे सर उन के इजाज़त मिल गई हम को
ख़ुदा का शुक्र है इतनी रियायत मिल गई हम को

किसी से बात कर के इन दिनों यूँँ लग रहा है दोस्त
हमारी इक पसंदीदा वो औरत मिल गई हम को
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Das Kanpuri
ज़रूरी था रिश्ते सभी आज़माते रहे हम
सो अपनों से मिलने को जाते रहे हम

किसी दिल में घर करने की उम्र थी वो हमारी
उसी उम्र में सॉफ़्टवेयर बनाते रहे हम
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Das Kanpuri
जब भी देखा उस हसीं को इक नज़र तो यूँँ लगा
उस की आँखें उस का चेहरा चौदहवीं का चाँद है
Das Kanpuri
किसी के ज़ख़्मों पे इक उम्र तक मरहम रहा हूँ मैं
अचानक एक दिन फिर एक्सपायर डेट थी आई
Das Kanpuri
अमूमन ऐसा होता ही नहीं हैं 'दास' दुनिया में
कि माँ होते हुए भी बच्चे भूखे पेट सो जाएँ
Das Kanpuri
मगर हम ख़ुश-मिज़ाजी कैसे हों 'दास'
उदासी रक़्स करती दिल में आ कर
Das Kanpuri
इश्क़ की अफ़वाहें ऐसे ही नहीं फैलतीं सरे बाज़ार
हम को कभी किसी ने कहीं अकेले जाते नहीं देखा
Das Kanpuri
नए हर शख़्स को सच्चाई अक्सर हम बताते हैं
घरों से दूर आए लोग तो शीशा दिखाते हैं

जिन्हें माँ ने हमेशा शाहज़ादों की तरह पाला
पराए शहर में खाना वो बच्चे ख़ुद पकाते हैं
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Das Kanpuri
किसी के इश्क़ में हम दिल जलाते ही नहीं यूँँ दास
यक़ीं मानो कि वो लड़की बला की ख़ूब-सूरत है
Das Kanpuri
कब मुहब्बत को निभाते हैं ये लोग
महज़ झूठी क़स
में खाते हैं ये लोग

बस कुछ इक लम्हें बिता कर साथ में
उम्र भर को याद आते हैं ये लोग
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Das Kanpuri
वही इक इश्क़ दिल को बे-तहाशा याद आता है
फिर उस ने जो किया हर इक तमाशा याद आता है

दिखाती कब हैं अपना दर्द माएँ इस ज़माने को
वगरना उन को बच्चा बे-तहाशा याद आता है
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Das Kanpuri
साल दर साल कुछ इक तजुर्बे मिले
तब कहीं जाके हम आज ख़ुद से मिले
Das Kanpuri
दुनिया में फैली इस वबा का डर नहीं
इस से ज़ियादा लोग भूखे मर गए

मज़बूरियों नें 'दास' तन्हा कर दिया
मुद्दत हुई अब लौट कर के घर गए
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Das Kanpuri
क्या होगा फिक्र ये करें क्यूँ हम ही ख़ामख़ाह
इस हिज्र में जलाएँ न अब हम जी ख़ामख़ाह

तुम सेे बिछड़ के दिल मिरा रोया है उम्र भर
ऐसा लगा कि ज़िंदगी हमनें जी ख़ामख़ाह
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