Kaffir

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@Kaffir

Kaaffir shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Kaaffir's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
है आख़िरी ये इश्क़ है हद साँस आख़िरी
हो मौत तेरी बाँहों में जन्नत भी लाज़मी

ऐसी मिसाल दूँ ख़ुदा को नाम तेरा दूँ
तू शा'इरी है तुझ सेे मेरा इश्क़ काफ़िरी
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Kaffir
रोज़ शाम हम बैठे उस के ख़्वाब में डूबे
फिर उसे भुलाना था तो शराब में डूबे

क्या सवाल पूछा था क्या ही फ़र्क़ पड़ता है
हम तो सिर्फ़ 'काफ़िर' अब इक जवाब में डूबे
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Kaffir
तेरी इन्हीं ग़ज़लों से मेरी रोज़गारी चलती है
गर छोड़ दूँ लिखना तो जैसे बे-क़रारी चलती है

ये इश्क़ भी तो वक़्त के पीछे ग़ुलामी ही करे
'काफ़िर' यहाँ दौलत नहीं चलती उधारी चलती है
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Kaffir
इश्क़ इमाम है मेरा क्यूँ मुरीद रक्खा है
क्या है तुम में ऐसा जो सब ख़रीद रक्खा है

है न इश्क़ की चाहत या न ही ज़रूरत अब
क्यूँँ न जाने 'काफ़िर' को यूँँ वदीद रक्खा है
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Kaffir
प्यासे का मान क्या है दुनिया से काम क्या है
ये प्यास ही न हो गर क्या दरिया जाम क्या है
Kaffir
ग़ुस्सा भी करे लेकिन वो कमाल लगती है
काला जब पहनती है वो बवाल लगती है

मेरा दिन उसी का है मेरी रात भी उस की
ख़ूबसूरती की ख़ुद वो मिसाल लगती है
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Kaffir
देखते लोग अगर हम को तो नफ़रत करते
क्या फ़रिश्ते कभी जिन्नों से मुहब्बत करते

मुफ़्लिसी ने हमें बदनाम किया है वरना
देखते आज हमें और वो इज़्ज़त करते
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Kaffir
तू ठहरे तो चाहूँ कि चलता वक़्त थम जाए मेरा
फिर गोद में सोऊँ तेरी तो ख़ून जम जाए मेरा

ये मौत जब भी आए तो बाँहें मिले तेरी मुझे
मुझ को गले से तू लगाए और दम जाए मेरा
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Kaffir
ये सफ़र का अंत मेरा मैं मोहब्बत कर चुका हूँ
अब ख़ुदा का ख़ौफ़ नइँ मैं तो बग़ावत कर चुका हूँ

जिस्म की अब भूख नइँ नइँ रूह की कोई ज़रूरत
आख़िरी लम्हों के ख़्वाबों को हक़ीक़त कर चुका हूँ
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Kaffir
बेवजह ये ज़िंदगी ऐसा तमाशा कर रही है
हम न जी सकते न ये 'काफ़िर' जनाज़ा कर रही है
Kaffir
न हो इश्क़ में दर्द ऐसा भी कोई तरीक़ा बता दो
वो ग़ुस्सा न हो ऐसा 'काफ़िर' कोई तो सलीक़ा बता दो
Kaffir
ग़लतफ़हमी तुम्हारी है कि हम तो बस ज़रूरत तक पिएँगे
अगर महफ़िल में बैठेंगे तो 'काफ़िर' हम क़यामत तक पिएँगे
Kaffir
वो सारे झूठ बोलेंगे खड़े होकर अदालत में
वहाँ पर मसअला है लोग आईना नहीं रखते
Kaffir
उस की नादाँ आँखों की गुस्ताख़ियाँ ये दिल जलाए
क़त्ल कर के जैसे कोई जिस्म भी क़ातिल जलाए
Kaffir
वैसे समुंदर हूँ मगर ख़ुद को मैं क़तरा भी मेरा हासिल नहीं
वो भी मेरा होकर ज़रा सा मेरे हिस्से में कभी शामिल नहीं

मैं गर कहूँ ये रात बाक़ी है ज़रा सा ठहर मेरी पलकों पर
काफ़िर वो तो कहता है मेरी ये नज़र अब चाँद के क़ाबिल नहीं
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Kaffir
आख़िर तो कठघरे में सब को हाज़िर होना है
हिसाब ये पुण्य-पाप का सब ज़ाहिर होना है

तुम कर लो नाटक मंदिर वाले-मस्जिद वाले
आख़िर में तो सब को काफ़िर-काफ़िर होना है
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Kaffir
नाम लिखूँ जो तेरा पत्थर भी मख़मल हो जाए
चाँद लिखूँ तो सारे तारे भी ओझल हो जाए

जाम कहूँ तो आँखें तेरी दिखे ओ मेरे काफ़िर
नाम लूँ तेरा महफ़िल में तो यार ग़ज़ल हो जाए
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Kaffir
तिरा शहर मेरे सफ़र का भी हक़दार है
मिरा इश्क़ तेरी वफ़ा का तलबगार है

तिरे बा'द ये घाव मेरे भरे ही नहीं
अकेला मेरे मर्ज़ का तू गुनहगार है
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Kaffir
उस दौर का कह दूँ अगर तो फिर इबादत है मुझे
अपनी ज़बाँ में गर कहूँ तुम सेे मोहब्बत है मुझे

ये इश्क़ हो या ज़हर हो या दर्द हो या हो दवा
हर चीज़ की अब तो लगी नादान आदत है मुझे
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Kaffir
डूब कर तेरी आँखों में मैं ने जहाँ देखा है
तुझ सेे ज़्यादा हसीं भी किसी ने कहाँ देखा है

मैं बताऊँ उन्हें जो बताते ख़ुदा है नहीं
होता है मैं ने देखा है काफ़िर यहाँ देखा है
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