Lalit Mohan Joshi

Lalit Mohan Joshi

@Lalitmohanjoshi

Lalit Mohan Joshi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Lalit Mohan Joshi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm
कहो हमें भला बुरा या कुछ भी तुम यहाँ
मगर कहे जो सच वो आइना भी पास हो
Lalit Mohan Joshi
दरयाफ़्त अपने मुश्किलों की तुम करो
यूँँ बात अपनी मंज़िलों की तुम करो

इक बात ये मुझ को बताओ तुम ज़रा
क्यूँँ बात फिर अब बुज़दिलों की तुम करो
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Lalit Mohan Joshi
वक़्त की अब चोट हम को रास ऐसे आ गई है
जबसे जीने की नई फिर आस जैसे आ गई है

ज़िंदगी ज़िंदा रहे गर फूल तब पाएँगे खिल
बात हम में ऐसी देखो यार कैसे आ गई है
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Lalit Mohan Joshi
बुलाया आपने आभार पूरे दिल से करता हूँ
दिया सम्मान ये आभार पूरे दिल से करता हूँ

यही उम्मीद अब है आपसे यूँँ ही बुलाओगे
नमन के साथ ये आभार पूरे दिल से करता हूँ
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Lalit Mohan Joshi
ये नज़र जो है तुम्हारी लड़कियों पर
यार वो भी तो किसी की बेटियाँ हैं
Lalit Mohan Joshi
चाँद को छत से यूँँ तकता रह गया
इक कहानी बोलता सा रह गया

ख़्वाब में कल आ गई वो बन सँवर
रातभर आँखों में जगता रह गया
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Lalit Mohan Joshi
ग़ालिब की बातें तुम ज़रा सी ही मगर दिल से सुनो
है ज़िंदगी को कैसे ग़ज़लों में उतारा ये सुनो

हर लफ़्ज़ अपने में ज़माने को बयाँ करता लिखा
ग़ालिब ने ग़ालिब को लिखा कितने क़रीने से सुनो
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Lalit Mohan Joshi
पाप का इक मैं दरिया ही हूँ
डूबकर आप तर जाइए
Lalit Mohan Joshi
बंदिशों को तोड़ आया हूँ
घर के जाले काट लाया हूँ

जब से सीखा मैं ने हँसना है
तब से ग़म को मैं ही भाया हूँ
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Lalit Mohan Joshi
बे-बहर जुमलों को ग़ज़ल कहते हो तुम
हर्फ़-ए-ग़लत है ये तो मैं कहता रहा
Lalit Mohan Joshi
शोर अंदर मेरे बढ़ता जा रहा है
चेहरे पे उस का ही ग़म अब छा रहा है

क्या कहा ज़ख़्मी हो तुम तो वार से फिर
फिर तुम्हें वो बे-वफ़ा क्यूँ भा रहा है
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Lalit Mohan Joshi
ज़बाँ मीठी रखो या तल्ख़ तुम
मगर सच कहने की आदत रखो
Lalit Mohan Joshi
सुनो यार ख़तरा वो अब टल गया
मैं आख़िर जो उस के गले यूँँ लगा
Lalit Mohan Joshi
घुटन में जी रहा हूँ मैं बहुत
कभी कोई समझ पाया नहीं
Lalit Mohan Joshi
मैं ख़ुद से रूठा आप से हरगिज़ नहीं
अब हिज्र से ही दोस्ती मेरी यहाँ
Lalit Mohan Joshi
खिड़कियाँ खोल सुब्ह होने को है
चाँद भी यार अब तो सोने को है

उड़ चुके हैं परिंदे भी अब तो
साँस फसलें नई ये बोने को है
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Lalit Mohan Joshi
हिज्र के दिन कट रहे हैं
हिस्सों में हम घट रहे हैं

देख कर ये आइना क्यूँँ
सबके ग़म अब छट रहे हैं
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Lalit Mohan Joshi
ख़ुशी मेरी उसे कब यार ये तो रास आई है
कहाँ नादान लड़की अब मिरे तो पास आई है

मिरे तो ज़ेहन से यादें निकलती क्यूँँ नहीं उस की
मगर क्यूँँ याद रहने साथ बारह-मास आई है
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Lalit Mohan Joshi
कैसे क्यूँँ फिर मैं बिखरने अब लगा हूँ
ख़ुद के अंदर से ही मरने अब लगा हूँ

चाँद तारे सबके क़िस्से कहता हूँ मैं
चेहरे पर मुस्कान धरने अब लगा हूँ
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Lalit Mohan Joshi
मरा वो समझता है मुझ को मगर अब
उसे जीत कर फिर दिखाना मुझे है
Lalit Mohan Joshi

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