Naresh sogarwal 'premi'

Naresh sogarwal 'premi'

@Premi

Naresh sogarwal 'premi' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Naresh sogarwal 'premi''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

7

Content

125

Likes

172

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal
नहीं रहता मुसलसल शादमानी से कोई चेहरा
कोई तो देख ले हम को भी संजीदा निगाहों से
Naresh sogarwal 'premi'
ये दूरियाँ तो रास्तों की हैं मता-ए-जाँ
कि नक़्शे में तो तुम बहुत क़रीब लगती हो
Naresh sogarwal 'premi'
तुझ को मालूम नहीं ग़ौर से पढ़ना आलिम
कितना रोया हूँ मैं किस शे'र को लिखते अवसर
Naresh sogarwal 'premi'
तुम आना जब मिरे दिन अच्छे हों मता-ए-जाँ
बुरा है वक़्त अभी और अच्छे दिन नहीं मालूम
Naresh sogarwal 'premi'
वही जनवरी वही फरवरी वही सोमवार वही शुक्रवार
नया साल आ गया ले के फिर वही ज़ाबता वही दास्तान
Naresh sogarwal 'premi'
इसी से सुकूँ और इसी से हूँ बेताब
मैं रो लेता हूँ याद में तेरी अक्सर
Naresh sogarwal 'premi'
आप के चाहने वाले तो बिछड़ जाते हैं जल्द
प्रेमी क्या लज़्ज़त-ए-इश्क़-ए-बुताँ करिएगा आप
Naresh sogarwal 'premi'
तुम किसी तरह मिरे क़रीब आ नहीं सकी
तुम को आने से मिरा ख़याल रोक नइँ सका
Naresh sogarwal 'premi'
अगर मैं कह दूँ मेरे हाल-ए-दिल का हाल सब है ठीक
यही तो वक़्त है जाँ सीने से मुझ को लगाने का
Naresh sogarwal 'premi'
नहीं है ज़ख़्मों को बर्दाश्त मुझ को चैन कहाँ
कि मेरे घाव महकते हैं फूलों की जैसे
Naresh sogarwal 'premi'
जुदा भी तुम मुझ सेे हो गई वो भी ख़ुदस अब दूर हो गया है
वो जाने कब का भी मर चुका कौन है जो मशहूर हो गया है
Naresh sogarwal 'premi'
गो उस ने ऐसी भी आदत छुड़ाई
फ़क़त जिस की ज़बाँ पर आश्ना थी
Naresh sogarwal 'premi'
कटती नहीं है बे-कली मेरी शफ़ीक़
जब तक कि ख़ुद पर तंज़ कस लेता नहीं
Naresh sogarwal 'premi'
हयात से मुझे करिश्में की उमीद थी
मैं ख़ुद ही इक अजूबा था करिश्मा होता क्या
Naresh sogarwal 'premi'
याद आई ख़ूब रोने दिया हम ने ख़ुद को पर
ग़म में कभी रक़ीब की इस्तिदआ की नहीं
Naresh sogarwal 'premi'
शख़्स जो रहता है हर पल मिरी रूह-ओ-जाँ में
बद-नसीबी कि उसे मैं ने छुआ तक भी नहीं
Naresh sogarwal 'premi'
ऐ सनम हमारे तो बड़े नसीब हैं ख़राब
इत्तिफ़ाक़ में ये लड़का ग़मज़दा मिला तुम्हें
Naresh sogarwal 'premi'
यही था हक़ तिरा क्या वो यही मुहब्बत थी
मना किया था तुझे और तू ये मान गई
Naresh sogarwal 'premi'
निशात-ओ-ऐश-ए-अलम की न ही दवा लीजे
अगर कमाना है इल्म इस की फिर सज़ा लीजे
Naresh sogarwal 'premi'
मेरी मजबूरी पे तोहमत ही लगाने आओ
जान फिर से किसी दिन मुझ को रुलाने आओ
Naresh sogarwal 'premi'

LOAD MORE