Rekhta Pataulvi

Rekhta Pataulvi

@Shahzad

Rekhta Pataulvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Rekhta Pataulvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm
मसलहत है फरेब-ए-हसीं
एक झूठी किरन की तरह

हो गई महफ़िल-ए-नाज़ भी
एक उजड़े चमन की तरह
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Rekhta Pataulvi
अपनी शोहरत अपनी कुर्सी अपना मतलब है अज़ीज़
क़ौम से क्या लेना, थोड़ी सी रवादारी बहुत
Rekhta Pataulvi
ख़ुदा ने मुहाफ़िज़ बनाया है इनको
सताएँ न फ़ूलों को, ख़ारों से कह दो
Rekhta Pataulvi
मज़लूम को कुछ लोग बुरा कहने लगे हैं
ज़ालिम को बजा कहने का अंदाज़ तो देखो
Rekhta Pataulvi
एक आलम की नज़रें हैं मुझ पर
और मेरे जाम में ज़रा सी है
Rekhta Pataulvi
दस्तूर बन रहे हैं बड़ी धूमधाम से
साज़िश भी हो रही है बड़े एहतिमाम से
Rekhta Pataulvi
धोका खाने के हम आदी है किस क़दर
अब के भी उन के धोके में हम आ गए
Rekhta Pataulvi
मस्त है तारीख़ अपने हाल में
इस को मुस्तक़बिल का अंदाज़ा नहीं
Rekhta Pataulvi
हज़ारों आंधियाँ तूफ़ान आए और गए यारो
चराग़-ए-रेख़्ता मद्धम सही पर अब भी जलता है
Rekhta Pataulvi
ए लो अख़बार भी क़ानून भी मुंसिफ़ भी बिके
किस में हिम्मत है हक़ीक़त को हक़ीक़त लिक्खे
Rekhta Pataulvi
रेख़्ता हाथ में ज़मीं भी नहीं
बात करते हो आसमानों की
Rekhta Pataulvi
मेरे सुख़न से लतीफ़े तराशे लोगों ने
कि ज़हर भी तो हँसी में उगल रहे हैं लोग

इसी में रेख़्ता अब ख़ैर है कि ख़ार बनो
वो देखो फूलों को कैसे मसल रहे हैं लोग
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Rekhta Pataulvi
महफ़िल में कौन आया है साग़र लिए हुए
इक ख़ास कैफ़ियत का समुंदर लिए हुए
Rekhta Pataulvi
इस भरी काइ‌नात में या रब
अपने रहने को एक घर भी नहीं

पेड़ के नीचे जो गुज़र जाए
ज़िन्दगी इतनी मुख़्तसर भी नहीं
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Rekhta Pataulvi
नसीब अपना है रूठे हुए सनम की तरह
अगर ख़ुशी कभी मिलती भी है तो ग़म की तरह
Rekhta Pataulvi
सारे हुक़ूक़ छीन चुके मेरे घर के लोग
अपने ही घर में रहता हूँ मेहमान की तरह
Rekhta Pataulvi
था झूठा वा'दा मगर ए'तिबार हम ने किया
तमाम रात तेरा इंतिज़ार हम ने किया
Rekhta Pataulvi
हलचल मची हुई थी दिल-ए-बेक़रार में
सिगरेट पी रहा था तेरे इंतिज़ार में
Rekhta Pataulvi
जुदाई इश्क़ का दस्तूर क्यूँँ है हम नहीं समझे
मोहब्बत इस क़दर मजबूर क्यूँँ है हम नहीं समझे
Rekhta Pataulvi
मैं अपनी राह अलग ख़ुद बनाके चलता हूँ
वो और होंगे जो नक़्शे कदम पे चलते हैं
Rekhta Pataulvi

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