Shobhit Dixit

Shobhit Dixit

@Shobhit_Dixit

Shobhit Dixit shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Shobhit Dixit's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm
काग़ज़ की नाव बनाते थे
और उस पर भी इतराते थे

अब तो छुट्टी भर है बस तब
दीवाली यार मनाते थे
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Shobhit Dixit
जिन हाथों से हो कश्मीर बनाते तुम
काश उसी से हर तक़दीर बनाते तुम
Shobhit Dixit
बारिशों में नेत्र विह्वल हो रहे हैं
प्रेम के अब मेघ श्यामल हो रहे हैं

दिन-ब-दिन तुम ख़ूब-सूरत हो रही हो
दिन ब दिन हम और पागल हो रहे हैं
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Shobhit Dixit
दिन-ब-दिन तुम ख़ूब-सूरत हो रही हो
दिन-ब-दिन हम और पागल हो रहे हैं
Shobhit Dixit
पत्थर दिल के आँसू ऐसे बहते हैं
जैसे इक पर्वत से नदी निकलती है
Shobhit Dixit
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साँप को अपना बनाया जा रहा है
आस्तीनों में बसाया जा रहा है
Shobhit Dixit
पापा का वो हल्का वाला कुर्ता पहना
कंधे पे कुछ भारी भारी सा लगता है
Shobhit Dixit
हँसकर के कितना रोते हैं
लड़के भी लड़के होते हैं
Shobhit Dixit
देखा जिस मेहताब ने तुम को
उस को उस की ईद मुबारक
Shobhit Dixit
आँखों पर चश्मा होंठों पर तिल भी है
वहीं कहीं देखो तो मेरा दिल भी है

हम को एक पेपर में अव्वल आना है
जो दूसरे दर्जे का है और मुश्किल भी है
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Shobhit Dixit
अब तो मेरे सारे सावन बीत गए
बिन मौसम अब बादल बरसे उस सेे क्या
Shobhit Dixit
तेरी ही यादों में पाकीज़ा होना पड़ता है
उस के ख़ातिर भी इन आँखों को रोना पड़ता है

तुम को तो बस मेरे ख़्वाबों में आना होता है
ये सोचो मुझ को तो रातों में सोना पड़ता है
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Shobhit Dixit
छत पे जाने को बोल रहे हैं
फिर तह ख़ानों को खोल रहे हैं

दस्तक देने में डर लगता है
सो खुल जा सिम सिम बोल रहे हैं
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Shobhit Dixit
बाकी है तुम को तुम सेे माँगे जाना
वैसे तो शिव से भी तुम को माँगा है
Shobhit Dixit
पहले दरवाजा खटकाया जाता था
अब तो पहले फ़ोन मिलाया जाता है
Shobhit Dixit
हर सफ़र में ख़ूबसूरती को चाहिए
कुछ हसीन लोग और प्यारे रास्ते
Shobhit Dixit
हम ने इक वहम पाल रखा है
उस का ही तो मलाल रखा है

टूटा था दिल तो एक दफ़ा बस
वो दर्द अब तक सम्हाल रखा है
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Shobhit Dixit
दोनों पहलू निकाल देती है
कैसा सिक्का उछाल देती है

इस लिए ही तो मैं रो देता हूँ
वो जो अपना रुमाल देती है
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Shobhit Dixit
मेरे दुख को मुझ सेे ज़्यादा कौन समझा
मेरा दुख भी बिल्कुल मुझ-सा हो रहा था
Shobhit Dixit
तजरबा जितना बढ़ने लगता है
आईना शक्लें पढ़ने लगता है
Shobhit Dixit

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