Khurram Afaq

Khurram Afaq

@khurram-afaq

Khurram Afaq shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Khurram Afaq's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
वो आग बुझी तो हमें मौसम ने झिंझोड़ा
वर्ना यही लगता था कि सर्दी नहीं आई
Khurram Afaq
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ये रख रखाव कभी ख़त्म होने वाला नहीं
बिछड़ते वक़्त भी तुझ को गुलाब दूँगा मैं
Khurram Afaq
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पहले ये रब्त मेरी ज़रूरत बनाओगे
और फिर कहोगे राब्ता मुमकिन नहीं रहा
Khurram Afaq
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इक रात उस ने चंद सितारे बुझा दिए
उस को लगा था कोई उन्हें गिन नहीं रहा
Khurram Afaq
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तुम इस का नुक़सान बताती अच्छी लगती हो
वरना हम को शौक़ नहीं है सिगरेट-नोशी का
Khurram Afaq
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यूँँ न कर वस्ल के लम्हों को हवस से ता'बीर
चंद पत्ते ही तो तोड़े हैं शजर से मैं ने
Khurram Afaq
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बुरा बनता हूँ कि शायद ऐसे
वो मिरे सामने अच्छा बन जाए
Khurram Afaq
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तूफ़ान की उम्मीद थी आँधी नहीं आई
वो आप तो क्या उस की ख़बर भी नहीं आई

शायद वो मोहब्बत के लिए ठीक नहीं था
शायद ये अँगूठी उसे पूरी नहीं आई
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Khurram Afaq
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नताएज जब सर-ए-महशर मिलेंगे
मोहब्बत के अलग नंबर मिलेंगे

तुम्हारी मेज़बानी के बहाने
कोई दिन हम भी अपने घर मिलेंगे
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Khurram Afaq
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बड़ी मुश्किल से नीचे बैठते हैं
जो तेरे साथ उठते बैठते हैं
Khurram Afaq
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बात करते हुए बे-ख़याली में ज़ुल्फ़ें खुली छोड़ दी
हम निहत्थों पे उस ने ये कैसी बलाएँ खुली छोड़ दी

साथ जब तक रहे एक लम्हे को भी रब्त टूटा नहीं
उस ने आँखें अगर बंद कर ली तो बाँहें खुले छोड़ दी
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Khurram Afaq
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बातचीत में आला हो बस ठीक न हो
फ़ाइदा क्या महबूब अगर बारीक न हो

हम तेरी क़ुर्बत में अक्सर सोचते हैं
दरिया खेत के इतना भी नज़दीक न हो
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Khurram Afaq
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ज़ख़्म की इज़्ज़त करते हैं
देर से पट्टी खोलेंगे

चेहरा पढ़ने वाले चोर
गठरी थोड़ी खोलेंगे
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Khurram Afaq
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अब ऐसे ज़ाविए पर लौ रखी जाने लगी है
चराग़ों के तले भी रौशनी जाने लगी है

नया पहलू सलीक़े से बयाँ करना पड़ेगा
कहानी अब तवज्जोह से सुनी जाने लगी है
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Khurram Afaq
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किए कराए का सारा हिसाब दूँगा मैं
सवाल जो भी करोगे जवाब दूँगा मैं

ये रख-रखाव कभी ख़त्म होने वाला नहीं
बिछड़ते वक़्त भी तुझ को गुलाब दूँगा मैं
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Khurram Afaq
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जो ज़रा ठीक से किरदार निगारी हो जाए
ये कहानी तो हक़ीक़त पे भी तारी हो जाए

तेरे हामी है सो उठ कर भी नहीं जा सकते
जाने किस वक़्त यहाँ राय-शुमारी हो जाए
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Khurram Afaq
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ख़ुद बुलाओ कि वो यूँँ घर से नहीं निकलेगा
यहाँ इनआ'म मुक़द्दर से नहीं निकलेगा

ऐसे मौसम में बिना काम के आया हुआ शख़्स
इतनी जल्दी तेरे दफ़्तर से नहीं निकलेगा
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Khurram Afaq
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बुरा मनाया था हर आहट हर सरगोशी का
सोचो कितना ध्यान रखा उस ने ख़ामोशी का

तुम इस का नुक़सान बताती अच्छी लगती हो
वरना हम को शौक़ नहीं है सिगरेट-नोशी का
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Khurram Afaq
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दवा से हल न हुआ तो दुआ पे छोड़ दिया
तिरा मोआ'मला हम ने ख़ुदा पे छोड़ दिया
Khurram Afaq
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बड़ी मुश्किल से नीचे बैठते हैं
जो तेरे साथ उठते-बैठते हैं

अकेले बैठना होगा किसी को
अगर हम तुम इकट्ठे बैठते हैं
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Khurram Afaq
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