Zafar Iqbal

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@zafar-iqbal

Zafar Iqbal shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Zafar Iqbal's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
ख़ुद को तरतीब दिया आख़िर-ए-कार अज़-सर-ए-नौ
ज़िंदगी में तेरा इन्कार बहुत काम आया
Zafar Iqbal
वो सूरत देख ली हम ने तो फिर कुछ भी न देखा
अभी वर्ना पड़ी थी एक दुनिया देखने को
Zafar Iqbal
तुम ही बतलाओ कि उस की क़द्र क्या होगी तुम्हें
जो मोहब्बत मुफ़्त में मिल जाए आसानी के साथ
Zafar Iqbal
रात ख़ाली ही रहेगी मेरे चारो जानिब
और ये कमरा तेरी यादों से भर जाएगा
Zafar Iqbal
काम आई न कुछ दानिश-ओ-दानाई हमारी
हारी है तेरे झूठ से सच्चाई हमारी

यूँँ है कि यहाँ नाम-ओ-निशाँ तक नहीं तेरा
और तुझ से भरी रहती है तन्हाई हमारी
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Zafar Iqbal
मुझे ख़राब किया उस ने हाँ किया होगा
उसी से पूछिए मुझ को ख़बर ज़ियादा नहीं
Zafar Iqbal
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वो क़हर था कि रात का पत्थर पिघल पड़ा
क्या आतिशीं गुलाब खिला आसमान पर
Zafar Iqbal
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सफ़र पीछे की जानिब है क़दम आगे है मेरा
मैं बूढ़ा होता जाता हूँ जवाँ होने की ख़ातिर
Zafar Iqbal
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बदन का सारा लहू खिंच के आ गया रुख़ पर
वो एक बोसा हमें दे के सुर्ख़-रू है बहुत
Zafar Iqbal
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वो बहुत चालाक है लेकिन अगर हिम्मत करें
पहला पहला झूट है उस को यक़ीं आ जाएगा
Zafar Iqbal
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मौत के साथ हुई है मिरी शादी सो 'ज़फ़र'
उम्र के आख़िरी लम्हात में दूल्हा हुआ मैं
Zafar Iqbal
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तुझ को मेरी न मुझे तेरी ख़बर जाएगी
ईद अब के भी दबे पाँव गुज़र जाएगी
Zafar Iqbal
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ख़ुदा को मान कि तुझ लब के चूमने के सिवा
कोई इलाज नहीं आज की उदासी का
Zafar Iqbal
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अब के इस बज़्म में कुछ अपना पता भी देना
पाँव पर पाँव जो रखना तो दबा भी देना
Zafar Iqbal
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जो यहाँ ख़ुद ही लगा रक्खी है चारों जानिब
एक दिन हम ने इसी आग में जल जाना है
Zafar Iqbal
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चेहरे से झाड़ पिछले बरस की कुदूरतें
दीवार से पुराना कैलन्डर उतार दे
Zafar Iqbal
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थकना भी लाज़मी था कुछ काम करते करते
कुछ और थक गया हूँ आराम करते करते
Zafar Iqbal
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