Neend Shayari
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Neend Shayari

    सुन कर तमाम रात मेरी दास्तान-ए-ग़म
    बोले तो सिर्फ़ ये कि बहुत बोलते हो तुम
    Firaq Gorakhpuri
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    शायद किसी बला का था साया दरख़्त पर
    चिड़ियों ने रात शोर मचाया दरख़्त पर
    Abbas Tabish
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    फिर बालों में रात हुई
    फिर हाथों में चाँद खिला
    Adil Mansuri
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    इक रात वो गया था जहाँ बात रोक के
    अब तक रुका हुआ हूँ वहीं रात रोक के
    Farhat Ehsaas
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    मैं ने मुद्दत से कोई ख़्वाब नहीं देखा है
    हाथ रख दे मेरी आँखों पे कि नींद आ जाए
    Waseem Barelvi
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    थी वस्ल में भी फ़िक्र-ए-जुदाई तमाम शब
    वो आए तो भी नींद न आई तमाम शब
    Momin Khan Momin
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    रात भर दर्द की शम्अ' जलती रही
    ग़म की लौ थरथराती रही रात भर
    Makhdoom Mohiuddin
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    चाँद तारे इक दिया और रात का कोमल बदन
    सुब्ह-दम बिखरे पड़े थे चार सू मेरी तरह
    Aziz Nabeel
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    आज की रात न जाने कितनी लंबी होगी
    आज का सूरज शाम से पहले डूब गया है
    Aanis Moin
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    मैं ज़िन्दगी में आज पहली बार घर नहीं गया
    मगर तमाम रात दिल से माँ का डर नहीं गया

    बस एक दुख जो मेरे दिल से उम्र भर न जाएगा
    उस को किसी के साथ देख कर मैं मर नहीं गया
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    Tehzeeb Hafi
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    ये तेरे ख़त ये तेरी ख़ुशबू ये तेरे ख़्वाब-ओ-ख़याल
    मता-ए-जाँ हैं तेरे कौल और क़सम की तरह

    गुज़िश्ता साल मैं ने इन्हें गिनकर रक्खा था
    किसी ग़रीब की जोड़ी हुई रक़म की तरह
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    Jaun Elia
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    शब भर इक आवाज़ बनाई सुब्ह हुई तो चीख़ पड़े
    रोज़ का इक मामूल है अब तो ख़्वाब-ज़दा हम लोगों का
    Abhishek shukla
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    तेरे ख़्वाब सँवर जाएँ तो बेहतर होगा
    अपना क्या है मर जाएँ तो बेहतर होगा
    Vishal Singh Tabish
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    तू है सूरज तुझे मालूम कहाँ रात का दुख
    तू किसी रोज़ मेरे घर में उतर शाम के बा'द
    Farhat Abbas Shah
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    आज की रात भी गुज़री है मिरी कल की तरह
    हाथ आए न सितारे तिरे आँचल की तरह
    Ameer Qazalbash
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    वो रातों-रात 'सिरी-कृष्ण' को उठाए हुए
    बला की क़ैद से 'बसदेव' का निकल जाना
    Firaq Gorakhpuri
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    जिस रात ख़ुद-कुशी के मुझे आए थे ख़याल
    उस रात मैं ने शे'र कहे और सो गया
    Tanoj Dadhich
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    मौत का एक दिन मुअय्यन है
    नींद क्यूँँ रात भर नहीं आती
    Mirza Ghalib
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    ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ
    हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते
    Ummeed Fazli
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    सूरज लिहाफ़ ओढ़ के सोया तमाम रात
    सर्दी से इक परिंदा दरीचे में मर गया
    Athar nasik
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