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    न कर 'सौदा' तू शिकवा हम से दिल की बे-क़रारी का
    मोहब्बत किस को देती है मियाँ आराम दुनिया में
    Mohammad Rafi Sauda
    कौन किसी का ग़म खाता है
    कहने को ग़म-ख़्वार है दुनिया
    Mohammad Rafi Sauda
    तिरा ख़त आने से दिल को मेरे आराम क्या होगा
    ख़ुदा जाने कि इस आग़ाज़ का अंजाम क्या होगा
    Mohammad Rafi Sauda
    मुझ को तजरबों ने ही बाप बन के पाला है
    सोचता हूँ क्या लिक्खूँ वलदियत के ख़ाने में
    Amir Ameer
    ये रंजिश में हम को है बे-इख़्तियारी
    तुझे तेरी खा कर क़सम देखते हैं
    Mohammad Rafi Sauda

Popular

    वो नशा है के ज़बाँ अक़्ल से करती है फ़रेब
    तू मिरी बात के मफ़्हूम पे जाता है कहाँ
    Pallav Mishra
    26 Likes
    मुद्दत के बा'द चाहने वाला कोई हुआ
    मुझ को गले लगा के मुझे उम्र दीजिए
    Rakesh Mahadiuree
    14 Likes
    ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है
    समुंदरों ही के लहजे में बात करता है

    खुली छतों के दिए कब के बुझ गए होते
    कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है

    शराफ़तों की यहाँ कोई अहमियत ही नहीं
    किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है

    ये देखना है कि सहरा भी है समुंदर भी
    वो मेरी तिश्ना-लबी किस के नाम करता है

    तुम आ गए हो तो कुछ चाँदनी सी बातें हों
    ज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है

    ज़मीं की कैसी वकालत हो फिर नहीं चलती
    जब आसमाँ से कोई फ़ैसला उतरता है
    Read Full
    Waseem Barelvi
    16 Likes
    ये कब कहते हैं कि आ कर हम को गले लगा ले वो
    मिल जाए तो रस्मन ही बस हाथ मिला ले काफ़ी है

    इतने कहाँ नसीब कि इस सेे प्यास बुझाएँ खेल करें
    दरिया हम जैसों को अपने पास बिठा ले काफ़ी है
    Read Full
    Vashu Pandey
    37 Likes
    मौत आए तो कुछ पल पहले पता चले
    फ़ोन लगाना है मुझ को इक लड़की को
    Tanoj Dadhich
    18 Likes
    छुपने वाले तू मुलाक़ात क्यूँँ नहीं करता
    इश्क़ है उस सेे तो फिर बात क्यूँँ नहीं करता
    Shubham Rai 'shubh'
    11 Likes
    मुझ सेे बिछड़ कर भी वो लड़की कितनी ख़ुश ख़ुश रहती है
    उस लड़की ने मुझ सेे बिछड़ कर मर जाने की ठानी थी
    Jaun Elia
    174 Likes
    उन की आँखें झील हैं तो क्या करें
    डूब जाएँ काम धंधा छोड़ दें?
    Saurabh Sharma 'sadaf'
    55 Likes
    रेशमी यादों के धागे में लिपट कर
    इश्क़ कीड़ें की तरह ही मर गया था
    Umesh Maurya
    10 Likes
    मैं अपने बाप के सीने से फूल चुनता हूँ
    सो जब भी साँस थमी बाग़ में टहल आया
    Hammad Niyazi
    20 Likes

Shayari Images

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Best from Verified

    पार्क में सब दोस्त मेरे राह देखें हैं मेरी
    अब तो जाने दो मुझे अब तो पढ़ाई हो गई
    Tanoj Dadhich
    50 Likes
    चाँद ला सका नहीं कभी सनम है सच मगर
    ला रहा हूँ मैं तुम्हारी ख़ातिर आफ़ताब अब
    Amaan Pathan
    24 Likes
    इक कमरे के कोने में ग़ज़लें लिखकर
    शाइ'र पूरी दुनिया पर छा जाता है
    Tanoj Dadhich
    18 Likes
    अक़्लमंदों के बस की बात नहीं
    इश्क़ अन्धों का खेल है बेटा
    Shadab Asghar
    26 Likes
    एहसान तेरा पिछला चुकाया नहीं गया
    मुश्किल में अबकी बार बुलाया नहीं गया

    मैं तुझ सेे मिलने आ गया हूँ तेरे शहर तक
    और तुझ सेे रेलगाड़ी तक आया नहीं गया
    Read Full
    Tanoj Dadhich
    58 Likes
    केवल उस का हाथ मेरी बर्बादी में
    और तो कोई ऐब नहीं शहज़ादी में

    प्यार बहुत करता था उस सेे मैं लेकिन
    प्यार नहीं देखा जाता है शादी में
    Read Full
    Tanoj Dadhich
    36 Likes
    ख़ाली पड़ा है और उदासी भरा है दिल
    सो लोग इस मकान से आगे निकल गए
    Ankit Maurya
    52 Likes
    इन के सहारे कुछ नए से धुन बनाऊँगा
    लाया हूँ उस के पाँव से घुँघरू निकाल कर
    Ankit Maurya
    मुझे तो उस का भीतरी ग़ुबार है निकालना
    सो आँख चूमता हूँ उस के होंठ चूमता नहीं
    Siddharth Saaz
    29 Likes
    रब्त को ऐसे रुस्वा मत कर
    ग़ुस्सा कर ले झगड़ा मत कर

    हाथ पकड़ ले पागल मेरा
    मर जाऊँगा तन्हा मत कर

    उस की पलकें झुक जाती हैं
    उस को ऐसे देखा मत कर

    पेशानी पे बल आएँगे
    इतना भी तू सोचा मत कर

    तुझ को मुझ सेे प्यार हुआ है.?
    रोक ले ख़ुद को ऐसा मत कर

    अगर बनाया तो काम में ला
    मुझ को यूँँ हीं ज़ाया' मत कर

    मैं था वो थी रात हसीं थी
    इस के आगे पूछा मत कर
    Read Full
    Ankit Maurya

Listen Shayari

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mallaahon ka dhyaan batakar dariyaa chori kar lena hai
Voice: Sumer Soni
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vo badhte faasle paiham hamaari jaan le baithe
Voice: Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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vo jo shayar tha
Voice: Hasrat
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vo badhte faasle paiham hamaari jaan le baithe
Voice: Saurabh Mehta 'Alfaaz'

Poetistic Choice

    ज़िंदगी फ़िरदौस-ए-गुम-गश्ता को पा सकती नहीं
    मौत ही आती है ये मंज़िल दिखाने के लिए
    Hafeez Jalandhari
    26 Likes
    तू ने देखी है वो पेशानी वो रुख़्सार वो होंठ
    ज़िंदगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हम ने

    तुझ पे उठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें
    तुझ को मालूम है क्यूँ उम्र गँवा दी हम ने
    Read Full
    Faiz Ahmad Faiz
    62 Likes
    दीदा ओ दिल में कोई हुस्न बिखरता ही रहा
    लाख पर्दों में छुपा कोई सँवरता ही रहा

    रौशनी कम न हुई वक़्त के तूफ़ानों में
    दिल के दरिया में कोई चाँद उतरता ही रहा

    रास्ते भर कोई आहट थी कि आती ही रही
    कोई साया मिरे बाज़ू से गुज़रता ही रहा

    मिट गया पर तिरी बाँहों ने समेटा न मुझे
    शहर दर शहर मैं गलियों में बिखरता ही रहा

    लम्हा लम्हा रहे आँखों में अंधेरे लेकिन
    कोई सूरज मिरे सीने में उभरता ही रहा
    Read Full
    Jaan Nisar Akhtar
    की मेरे क़त्ल के बा'द उस ने जफ़ा से तौबा
    हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशीमाँ होना
    Mirza Ghalib
    शुक्र है वो नज़र तो आने लगी
    ये उदासी कहीं ठिकाने लगी

    छुप के मिलना भी राएगाँ ही गया
    उस की ख़ुशबू बदन से आने लगी

    तू मुझे रोक भी नहीं रहा है
    और ये बस भी दूर जाने लगी

    पहले तो दूर रक्खा दिल से मुझे
    फिर वो ख़ुद रास्ता दिखाने लगी
    Read Full
    Kafeel Rana
    21 Likes
    रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं
    दर से उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं
    इश्क़ आग़ाज़ में हल्की सी ख़लिश रखता है
    बा'द में सैकड़ों आज़ार से लग जाते हैं

    पहले पहले हवस इक-आध दुकाँ खोलती है
    फिर तो बाज़ार के बाज़ार से लग जाते हैं

    बेबसी भी कभी क़ुर्बत का सबब बनती है
    रो न पाएँ तो गले यार से लग जाते हैं

    कतरनें ग़म की जो गलियों में उड़ी फिरती हैं
    घर में ले आओ तो अम्बार से लग जाते हैं

    दाग़ दामन के हों दिल के हों कि चेहरे के 'फ़राज़'
    कुछ निशाँ उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं
    Read Full
    Ahmad Faraz
    नुक़ूश-ए-हसरत मिटा के उठना, ख़ुशी का परचम उड़ा के उठना
    मिला के सर बैठना मुबारक तराना-ए-फ़त्ह गा के उठना

    ये गुफ़्तुगू गुफ़्तुगू नहीं है बिगड़ने बनने का मरहला है
    धड़क रहा है फ़ज़ा का सीना कि ज़िंदगी का मुआमला है
    ख़िज़ाँ रहे या बहार आए तुम्हारे हाथों में फ़ैसला है
    न चैन बे-ताब बिजलियों को न मुतमइन कारवान-ए-शबनम
    कभी शगूफ़ों के गर्म तेवर कभी गुलों का मिज़ाज बरहम
    शगूफ़ा ओ गुल के इस तसादुम में गुल्सिताँ बन गया जहन्नम

    सजा लें सब अपनी अपनी जन्नत अब ऐसे ख़ाके बना के उठना

    ख़ज़ाना-ए-रंग-ओ-नूर तारीक रहगुज़ारों में लुट रहा है
    उरूस-ए-गुल का ग़ुरूर-ए-इस्मत सियाहकारों में लुट रहा है
    तमाम सरमाया-ए-लताफ़त ज़लील ख़ारों में लुट रहा है
    घुटी घुटी हैं नुमू की साँसें छुटी छुटी नब्ज़-ए-गुलिस्ताँ है
    हैं गुरसना फूल, तिश्ना ग़ुंचे, रुख़ों पे ज़र्दी लबों पे जाँ है
    असीर हैं हम-सफ़ीर जब से ख़िज़ाँ चमन में रवाँ-दवाँ है

    इस इंतिशार-ए-चमन की सौगंद बाब-ए-ज़िंदाँ हिला के उठना

    हयात-ए-गीती की आज बदली हुई निगाहें हैं इंक़िलाबी
    उफ़ुक़ से किरनें उतर रही हैं बिखेरती नूर-ए-कामयाबी
    नई सहर चाहती है ख़्वाबों की बज़्म में इज़्न-ए-बारयाबी
    ये तीरगी का हुजूम कब तक ये यास का अज़दहाम कब तक
    निफ़ाक़ ओ ग़फ़लत की आड़ ले कर जियेगा मुर्दा निज़ाम कब तक
    रहेंगे हिन्दी असीर कब तक रहेगा भारत ग़ुलाम कब तक

    गले का तौक़ आ रहे क़दम पर कुछ इस तरह तिलमिला के उठना
    Read Full
    Kaifi Azmi
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    ऐसी सर्दी है कि सूरज भी दुहाई माँगे
    जो हो परदेस में वो किस सेे रज़ाई माँगे
    Rahat Indori
    76 Likes
    उस की हर इक याद में लज़्ज़त होती है
    पहली मोहब्बत पहली मोहब्बत होती है

    तेरे साथ नहीं हैं तो एहसास हुआ
    इक तस्वीर की कितनी क़ीमत होती है
    Read Full
    Aadil Rasheed
    55 Likes
    मोहब्बत से मुकर जाना ज़रूरी हो गया था
    पलट के अपने घर जाना ज़रूरी हो गया था

    नज़र-अंदाज़ करने की सज़ा देनी थी तुझ को
    तेरे दिल में उतर जाना ज़रूरी हो गया था

    मैं सन्नाटे के जंगल से बहुत तंग आ गई थी
    किसी आवाज़ पर जाना ज़रूरी हो गया था

    मैं सस्सी की तरह सोती रही और चल दिए तुम
    बता देते अगर जाना ज़रूरी हो गया था

    तआ'क़ुब ख़ुद न करती तो मेरे आँसू निकलते
    मैं क्या करती 'क़मर' जाना ज़रूरी हो गया था
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    Rehana Qamar
    "बस यूँँही जीते रहो"
    बस यूँँही जीते रहो
    कुछ न कहो
    सुब्ह जब सो के उठो
    घर के अफ़राद की गिनती कर लो
    टाँग पर टाँग रखे रोज़ का अख़बार पढ़ो
    उस जगह क़हत गिरा
    जंग वहाँ पर बरसी
    कितने महफ़ूज़ हो तुम शुक्र करो
    रेडियो खोल के फिल्मों के नए गीत सुनो
    घर से जब निकलो तो
    शाम तक के लिए होंटों में तबस्सुम सी लो
    दोनों हाथों में मुसाफ़े भर लो
    मुँह में कुछ खोखले बे-मअ'नी से जुमले रख लो
    मुख़्तलिफ़ हाथों में सिक्कों की तरह घिसते रहो
    कुछ न कहो
    उजली पोशाक
    समाजी इज़्ज़त
    और क्या चाहिए जीने के लिए
    रोज़ मिल जाती है पीने के लिए
    बस यूँँही जीते रहो
    कुछ न कहो
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    Nida Fazli
    1 Like
    दास्तानों में मिले थे दास्ताँ रह जाएँगे
    उम्र बूढ़ी हो तो हो हम नौजवाँ रह जाएँगे

    शाम होते ही घरों को लौट जाना है हमें
    साहिलों पर सिर्फ़ क़दमों के निशाँ रह जाएँगे

    हम किसी के दिल में रहना चाहते थे इस तरह
    जिस तरह अब गुफ़्तुगू के दरमियाँ रह जाएँगे

    ख़्वाब को हर ख़्वाब की ता'बीर मिलती है कहाँ
    कुछ ख़याल ऐसे भी हैं जो राएगाँ रह जाएँगे

    किस ने सोचा था कि रंग-ओ-नूर की बारिश के बा'द
    हम फ़क़त बुझते चराग़ों का धुआँ रह जाएँगे

    ज़िन्दगी बे-नाम रिश्तों के सिवा कुछ भी नहीं
    जिस्म किस के साथ होंगे दिल कहाँ रह जाएँगे
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    Fazil Jamili
    आज तो रोने को जी हो जैसे
    फिर कोई आस बँधी हो जैसे

    शहर में फिरता हूँ तन्हा तन्हा
    आश्ना एक वही हो जैसे

    हर ज़माने की सदा-ए-मातूब
    मेरे सीने से उठी हो जैसे

    ख़ुश हुए तर्क-ए-वफ़ा कर के हम
    अब मुक़द्दर भी यही हो जैसे

    इस तरह शब गए टूटी है उमीद
    कोई दीवार गिरी हो जैसे

    यास-आलूद है एक एक घड़ी
    ज़र्द फूलों की लड़ी हो जैसे

    मैं हूँ और वादा-ए-फ़र्दा तेरा
    और इक उम्र पड़ी हो जैसे

    बे-कशिश है वो निगाह-सद-लुत्फ़
    इक मोहब्बत की कमी हो जैसे

    क्या अजब लम्हा-ए-ग़म गुज़रा है
    उम्र इक बीत गई हो जैसे
    Read Full
    Rajinder Manchanda Bani
    हम वो हैं जो ख़ुदा को भूल गए
    तुम मेरी जान किस गुमान में हो
    Jaun Elia
    563 Likes
    दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
    मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ
    Mirza Ghalib
    27 Likes
    ज़ंजीर कट के क्या गिरी आधे सफ़र के बीच
    मैं सर पकड़ के बैठ गया रहगुज़र के बीच

    उतरा लहद में ख़्वाहिशों के साथ आदमी
    जैसे मुसाफ़िरों-भरी नाव भँवर के बीच

    दुश्मन से क्या बचाएँगी ये झाड़ियाँ मुझे
    बचते नहीं यहाँ तो पयम्बर शजर के बीच

    जितना उड़ा मैं उतना उलझता चला गया
    इक तार-ए-कम-नुमा था मिरे बाल-ओ-पर के बीच

    देते हो दस्तकें यहाँ सर फोड़ते हो वाँ
    कुछ फ़र्क़ तो रवा रखो दीवार-ओ-दर के बीच

    घर से चला तो घर की उदासी सिसक उठी
    मैं ने उसे भी रख लिया रख़्त-ए-सफ़र के बीच

    थकने के हम नहीं थे मगर अब के यूँँ हुआ
    देता रहा फ़रेब सितारा सफ़र के बीच

    मेरा सभी के साथ रवय्या है एक सा
    'शाहिद' मुझे तमीज़ नहीं ख़ैर ओ शर के बीच
    Read Full
    Shahid Zaki
    या रब मुआ'फ़ कर के न दे कर्ब-ए-इंफ़ि'आल 
    मैं ने ख़ताएँ की हैं सज़ा चाहिए मुझे 

    ख़ामोशी-ए-हयात से उकता गया हूँ मैं 
    अब चाहे दिल ही टूटे सदा चाहिए मुझे 

    उन मस्त मस्त आँखों में आँसू अरे ग़ज़ब 
    ये इश्क़ है तो क़हर-ए-ख़ुदा चाहिए मुझे 

    नासेह नसीहतों का ज़माना गुज़र गया 
    अब प्यारे सिर्फ़ तेरी दुआ चाहिए मुझे 

    हर दर्द को दवा की ज़रूरत है ऐ 'ख़ुमार' 
    जो दर्द ख़ुद हो अपनी दवा चाहिए मुझे 
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    Khumar Barabankvi
    बस ख़तरों की ख़ातिर जाने जाते हैं
    जिन रस्तों से हम दीवाने जाते हैं

    इतनी शोहरत काफ़ी है जीने के लिए
    उन की नज़रों में पहचाने जाते हैं

    हिम्मत वाले हिज्र में कहते हैं ग़ज़लें
    जो बुज़दिल हैं वो मयख़ाने जाते हैं

    रोज़ बुझा देते हैं ख़ुद ही तीली को
    रोज़ तिरी तस्वीर जलाने जाते हैं

    उन को देख के पूरी ग़ज़ल हो जाती है
    हम तो बस इक शे'र सुनाने जाते हैं
    Read Full
    Ahmad Azeem
    फिर कभी लौट कर न आएँगे
    हम तिरा शहर छोड़ जाएँगे

    दूर-उफ़्तादा बस्तियों में कहीं
    तेरी यादों से लौ लगाएँगे

    शम-ए-माह-ओ-नुजूम गुल कर के
    आँसुओं के दिए जलाएँगे

    आख़िरी बार इक ग़ज़ल सुन लो
    आख़िरी बार हम सुनाएँगे

    सूरत-ए-मौजा-ए-हवा 'जालिब'
    सारी दुनिया की ख़ाक उड़ाएँगे
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    Habib Jalib
    फूल ने टहनी से उड़ने की कोशिश की
    इक ताइर का दिल रखने की कोशिश की

    कल फिर चाँद का ख़ंजर घोंप के सीने में
    रात ने मेरी जाँ लेने की कोशिश की

    कोई न कोई रहबर रस्ता काट गया
    जब भी अपनी रह चलने की कोशिश की

    कितनी लंबी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ
    उन सेे कितना कुछ कहने की कोशिश की

    एक ही ख़्वाब ने सारी रात जगाया है
    मैं ने हर करवट सोने की कोशिश की

    एक सितारा जल्दी जल्दी डूब गया
    मैं ने जब तारे गिनने की कोशिश की

    नाम मिरा था और पता अपने घर का
    उस ने मुझ को ख़त लिखने की कोशिश की

    एक धुएँ का मर्ग़ोला सा निकला है
    मिट्टी में जब दिल बोने की कोशिश की
    Read Full
    Gulzar