Insaan Shayari - Human nature, emotions, and sach of life expressed deeply

Insaan shayari reflects the true nature of human life, emotions, and behavior. It captures the realities of insaniyat, the complexity of aadmi ki fitrat, and the silent truths we often ignore. Whether it's about kindness, hypocrisy, or inner struggles, these verses bring out the real face of human existence.

insaan shayari
अब जो पत्थर है आदमी था कभी
इस को कहते हैं इंतिज़ार मियाँ
Afzal Khan
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aadmi shayari
है दुख तो कह दो किसी पेड़ से परिंदे से
अब आदमी का भरोसा नहीं है प्यारे कोई
Madan Mohan Danish
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banda shayari
इत्तिफ़ाक़ अपनी जगह ख़ुश-क़िस्मती अपनी जगह
ख़ुद बनाता है जहाँ में आदमी अपनी जगह
Anwar Shaoor
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insaniyat shayari
वो मुझ को छोड़ के जिस आदमी के पास गया
बराबरी का भी होता तो सब्र आ जाता
Parveen Shakir
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fitrat shayari
ख़ुदा बचाए तिरी मस्त मस्त आँखों से
फ़रिश्ता हो तो बहक जाए आदमी क्या है
Khumar Barabankvi
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zarf shayari
इंसान अपने आप में मजबूर है बहुत
कोई नहीं है बे-वफ़ा अफ़्सोस मत करो
Bashir Badr
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वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
आदत इस की भी आदमी सी है
Gulzar
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इश्क़ में कहते हो हैरान हुए जाते हैं
ये नहीं कहते कि इंसान हुए जाते हैं
Josh Malihabadi
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ऐ आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़
डरते हैं ऐ ज़मीन तेरे आदमी से हम
Unknown
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शरीफ़ इंसान आख़िर क्यूँ इलेक्शन हार जाता है
किताबों में तो ये लिक्खा था रावन हार जाता है
Munawwar Rana
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उम्र भर साँप से शर्मिंदा रहे ये सुन कर
जब से इंसान को काटा है तो फन दुखता है
Munawwar Rana
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साया है कम खजूर के ऊँचे दरख़्त का
उम्मीद बाँधिए न बड़े आदमी के साथ
Kaif Bhopali
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लोगों ने बहुत चाहा अपना सा बना डालें
पर हम ने कि अपने को इंसान बहुत रक्खा
Abdul Hameed
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मैं तुझे खो के भी ज़िंदा हूँ ये देखा तू ने
किस क़दर हौसला हारे हुए इंसान में है
Abbas Tabish
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जानिए उस से निभेगी किस तरह
वो ख़ुदा है मैं तो बंदा भी नहीं
Jaun Elia
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इक अव्वल दर्जे का पाक इक माहिर है
मन तो तुझ में रमता है दिल काफ़िर फिर है

अपनी सोचो क़त्ल तुम्हें करना भी है
बन्दे का तो क्या है बन्दा हाज़िर है
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Vikram Gaur Vairagi
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हमें पता है कि मसरूफ़ हो बहुत फिर भी
हमारी दस्तकें सुनते रहो ज़मीर हैं हम
Madan Mohan Danish
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इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा
आदमी काम का नहीं होता
Jigar Moradabadi
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जहल-ए-ख़िरद ने दिन ये दिखाए
घट गए इंसाँ बढ़ गए साए
Jigar Moradabadi
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हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना
Nida Fazli
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कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है
सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है
Nida Fazli
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उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा
Nida Fazli
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रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं
Mirza Ghalib
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बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना
Mirza Ghalib
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इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के
Mirza Ghalib
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देवताओं का ख़ुदा से होगा काम
आदमी को आदमी दरकार है
Firaq Gorakhpuri
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अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए
Gopaldas Neeraj
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वर्ना इंसान मर गया होता
कोई बे-नाम जुस्तुजू है अभी
Ada Jafarey
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भूक से या वबास मरना है
फ़ैसला आदमी को करना है
Ishrat Afreen
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मौत ही इंसान की दुश्मन नहीं
ज़िंदगी भी जान ले कर जाएगी
Arsh Malsiyani
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अपनी हस्ती का भी इंसान को इरफ़ाँ न हुआ
ख़ाक फिर ख़ाक थी औक़ात से आगे न बढ़ी
Shakeel Badayuni
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पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसाँ पाए हैं
तुम शहर-ए-मोहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आए हैं
Sudarshan Fakir
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देखें क़रीब से भी तो अच्छा दिखाई दे
इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे
Zafar Gorakhpuri
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मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं
Meer Taqi Meer
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इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बा'द
Kaifi Azmi
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बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए
इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए
Kaifi Azmi
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गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया
होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया
Nida Fazli
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वो जंग जिस में मुक़ाबिल रहे ज़मीर मिरा
मुझे वो जीत भी 'अंबर' न होगी हार से कम
Ambreen Haseeb Ambar
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इसी लिए तो यहाँ अब भी अजनबी हूँ मैं
तमाम लोग फ़रिश्ते हैं आदमी हूँ मैं
Bashir Badr
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फूल कर ले निबाह काँटों से
आदमी ही न आदमी से मिले
Khumar Barabankvi
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न जाने बाहर भी कितने आसेब मुंतज़िर हों
अभी मैं अंदर के आदमी से डरा हुआ हूँ
Aanis Moin
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आदमी होता है माहौल से अच्छा या बुरा
जानवर घर में रखे जाएँ तो इंसान से हैं
Shakeel Azmi
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जैसा मूड हो वैसा मंज़र होता है
मौसम तो इंसान के अंदर होता है
Aziz Ejaaz
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वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है
माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है

वो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू
मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है
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Dushyant Kumar
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तदबीर के दस्त-ए-रंगीं से तक़दीर दरख़्शाँ होती है
क़ुदरत भी मदद फ़रमाती है जब कोशिश-ए-इंसाँ होती है
Hafeez Banarasi
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जिस ने इस दौर के इंसान किए हैं पैदा
वही मेरा भी ख़ुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं
Hafeez Jalandhari
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आने वाले जाने वाले हर ज़माने के लिए
आदमी मज़दूर है राहें बनाने के लिए
Hafeez Jalandhari
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मोहब्बत एक ख़ुशबू है हमेशा साथ चलती है
कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता
Bashir Badr
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जो मेरे साथ मोहब्बत में हुई आदमी एक दफा सोचेगा
रात इस डर में गुजारी हम ने कोई देखेगा तो क्या सोचेगा
Tehzeeb Hafi
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फिरता है कैसे-कैसे सवालों के साथ वो
उस आदमी की जामा-तलाशी तो लीजिए
Dushyant Kumar
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फ़रिश्ते से बढ़ कर है इंसान बनना
मगर इस में लगती है मेहनत ज़ियादा
Altaf Hussain Hali
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तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
Sahir Ludhianvi
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मिरे किरदार जाने दे नज़रअंदाज कर दे
ख़ुदा की फ़िल्म है ये आदमी से क्या शिकायत
Vikram Sharma
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सब से पुर-अम्न वाक़िआ' ये है
आदमी आदमी को भूल गया
Jaun Elia
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ख़ूब-सूरत है सिर्फ़ बाहरस
ये इमारत भी आदमी सी है
Azhar Nawaz
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उस के अच्छे शे'र नहीं भाते हम को
जो अच्छा इंसान नहीं बन पाता है
Tanoj Dadhich
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देख कर इंसान की बेचारगी
शाम से पहले परिंदे सो गए
Iffat Zarrin
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मैं मारा जाऊँगा पहले किसी फ़साने में
फिर इस के ब'अद हक़ीक़त में मारा जाऊँगा

मैं चुप रहा तो मुझे मार देगा मेरा ज़मीर
गवाही दी तो अदालत में मारा जाऊँगा
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Rana Saeed Doshi
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इंसान को ही अक़्ल ये आना तो है नहीं
धरती के ही अलावा ठिकाना तो है नहीं

भर लो सिलेंडरों में जहाँ भर की ऑक्सीजन
तुम को मगर दरख़्त लगाना तो है नहीं
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Gagan Bajad 'Aafat'
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मिरी ज़बान के मौसम बदलते रहते हैं
मैं आदमी हूँ मिरा ए'तिबार मत करना
Asim Wasti
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आदमी देश छोड़े तो छोड़े 'अली'
दिल में बसता हुआ घर नहीं छोड़ता

एक मैं हूँ कि नींदें नहीं आ रही
एक तू है कि बिस्तर नहीं छोड़ता
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Ali Zaryoun
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जान ले लो जान तुम मेरी यक़ीनन
जान लेना तो मिरी फितरत नहीं है
Shashank Shekhar Pathak
ठहाका मार कर हथियार हँसते
नहीं जीतेंगे अब इंसान हम सेे
Umesh Maurya
संग-ए-मरमर की मूरत नहीं आदमी
इस क़दर ख़ूब-सूरत नहीं आदमी

चंद क़िस्सों की दरकार है बस इसे
आदमी की ज़रूरत नहीं आदमी
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anupam shah
इक आदमी जो घर पे कभी हँसता ही नहीं
पकड़ा गया है हँसता हुआ कैमरे के साथ
Shadab khan
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पत्थर के इस जहाँ में थी रोने लगी सभा
जब आदमी ने आदमी को आदमी कहा
SHIV SAFAR
जिस की फ़ितरत ही बे वफ़ाई हो
उस सेे उम्मीद-ए-वफ़ा क्या करना
Ajeetendra Aazi Tamaam
बस एक मैं था जिस सेे सच मुच में दिलबरी की
वरना हर आदमी से उस ने दो नंबरी की

जिस बात में भी हम ने ख़ुद को अकेला रक्खा
बाग़ात में भी हम ने जोड़ों की मुख़बरी की
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Muzdum Khan
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कोई हादसा ले कर आदमी किधर जाए
आदमी अगर कह दे हादसा उदासी है
Rohit tewatia 'Ishq'
बंदा किसी के साथ, ख़ुदा हो किसी के साथ
जाने पराए शहर में क्या हो किसी के साथ
Mueed Mirza
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मन के हारे हुए इंसान को हुस्न-ए-शय से
कोई मतलब नहीं कोई भी सरोकार नहीं
shaan manral
वो दुनिया से बिल्कुल जुदा देखते हैं
जो कम-ज़र्फ़ में हौसला देखते हैं
Dileep Kumar
सुब्ह-ए-मग़रूर को वो शाम भी कर देता है
शोहरतें छीन के गुमनाम भी कर देता है

वक़्त से आँख मिलाने की हिमाकत न करो
वक़्त इंसान को नीलाम भी कर देता है
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Nadeem Farrukh
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अलमास धरे रह जाते हैं बिकता है तो पत्थर बिकता है
अजनास नहीं इस दुनिया में इंसाँ का मुक़द्दर बिकता है

'खालिद सज्जाद' सुनार हूँ मैं इस ग़म को ख़ूब समझता हूँ
जब बेटा छुप कर रोता है तब माँ का ज़ेवर बिकता है
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Khalid Sajjad
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क्या ग़लत-फ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं
वो मुझे समझा तो सकता था कि ऐसा कुछ नहीं
इश्क़ से बच कर भी बंदा कुछ नहीं होता मगर
ये भी सच है इश्क़ में बंदे का बचता कुछ नहीं
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Tehzeeb Hafi
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शबो रोज़ की चाकरी ज़िन्दगी की
मुयस्सर हुईं रोटियाँ दो घड़ी की

नहीं काम आएँ जो इक दिन मशीनें
ज़रूरत बने आदमी आदमी की

कि कल शाम फ़ुरसत में आई उदासी
बता दी मुझे क़ीमतें हर ख़ुशी की

किया क्या अमन जी ने बाइस बरस में
कभी जी लिया तो कभी ख़ुद-कुशी की

ग़मों को ठिकाने लगाते लगाते
घड़ी आ गई आदमी के ग़मी की

ये सारी तपस्या का कारण यही है
मिसालें बनें तो बनें सादगी की
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Aman G Mishra
तुम्हारी ज़िंदगी में तुम हमेशा
मुझे हर आदमी में सुन सकोगी

सुनोगी जब कभी भी शे'र मेरे
तो ख़ुद को शा'इरी में सुन सकोगी
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Sanskar Shrivastav
जब सर-ए-शाम पजीराई-ए-फ़न होती है
शाहज़ादी को कनीज़ों से जलन होती है

ले तो आया हूँ तुझे घेर के अपनी जानिब
आगे इंसान की अपनी भी लगन होती है
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Azhar Faragh
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कभी हँस के कभी रो के मिलूँगा मैं
मैं भी इंसान हूँ ऐसे मिलूँगा मैं

मुझे सब की मोहब्बत चाहिए वरना
मरीज़े ज़र्द के जैसे मिलूँगा मैं
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Meem Alif Shaz
जीने का बस एक यही ढब अच्छा है
मेरा तेरा सबका ही रब अच्छा है

बंदा हो तो यार हमारे जैसा हो
सब कुछ खो कर भी बोले, सब अच्छा है
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Tanoj Dadhich
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उस को जो कुछ भी कहूँ अच्छा बुरा कुछ न करे
यार मेरा है मगर काम मेरा कुछ न करे

दूसरी बार भी पड़ जाए अगर कुछ करना
आदमी पहली मोहब्बत के सिवा कुछ न करे
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Abid Malik
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रंग और नस्ल ज़ात और मज़हब जो भी है आदमी से कमतर है
इस हक़ीक़त को तुम भी मेरी तरह मान जाओ तो कोई बात बने
Sahir Ludhianvi
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तबक़ों में रंग-ओ-नस्ल के उलझा के रख दिया
ये ज़ुल्म आदमी ने किया आदमी के साथ
Bakhtiyar Ziya
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ढा दे जो इंसान के दिल में रंग ओ नस्ल की दीवारें
कोई तो दस्तूर-ए-मोहब्बत ऐसा आलमगीर लिखो
Iliyas ishqi
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अच्छी बुरी हर इक कमी के साथ हैं
हम यार आँखों की नमी के साथ हैं

दो जिस्म ब्याहे जा रहे हैं आज भी
हम सब पराए आदमी के साथ हैं
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Neeraj Neer
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अच्छों से पता चलता है इंसाँ को बुरों का
रावन का पता चल न सका राम से पहले
Rizwan Banarasi
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बात ये है कि आदमी शाइ'र
या तो होता है या नहीं होता
Mahboob Khizan
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इस दौर में इंसान का चेहरा नहीं मिलता
कब से मैं नक़ाबों की तहें खोल रहा हूँ
Moghisuddin Fareedi
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सरहदें अच्छी कि सरहद पे न रुकना अच्छा
सोचिए आदमी अच्छा कि परिंदा अच्छा
Irfan Siddiqi
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उस को देखा तो मैं समझा हो सकता है
एक इंसान भी पूरी दुनिया हो सकता है
Mirza Faisal
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ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र-दर-सफ़र
आख़िरी साँस तक बे-क़रार आदमी
Nida Fazli
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कह रहा है शोर-ए-दरिया से समुंदर का सुकूत
जिस का जितना ज़र्फ़ है उतना ही वो ख़ामोश है
Natiq Lakhnavi
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बड़ी हसरत से इंसाँ बचपने को याद करता है
ये फल पक कर दोबारा चाहता है ख़ाम हो जाए
Nushur Wahidi
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मेरे बस में नहीं इलाज उस का
ज़ख़्म देखा है मैं ने आज उस का

जितना आगे का आदमी है वो
रद न कर दे उसे समाज उस का
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Azhar Faragh
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ये कैसी सियासत है मिरे मुल्क पे हावी
इंसान को इंसाँ से जुदा देख रहा हूँ
Sabir Dutt
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साथ चावल के ये कंकर भी निगल जाता है
भूक में आदमी पत्थर भी निगल जाता है
Javed Naseemi
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न ग़ैर ही मुझे समझो न दोस्त ही समझो
मिरे लिए ये बहुत है कि आदमी समझो
Mahshar Inayati
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सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें
आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत
Bashir Badr
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फ़क़त अपनी तकलीफ़ दिखती है तुझ को
कभी तू समझता है इंसान मुझ को
Sapna Moolchandani
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सरसरी अंदाज़ से देखोगे तो महफ़िल ही महफ़िल
ग़ौर से देखोगे तो हर आदमी तन्हा लगेगा
Shuja Khawar
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कौन कहता है कि हर शख़्स फ़रिश्ता हो जाए
आदमी थोड़ा तो इंसान के जैसा हो जाए
Hina Rizvi
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नफ़रत धोका बुग़्ज़ तअ'स्सुब झूट दिखावा ख़ुद-ग़रज़ी
कैसे कैसे ज़हर भरे हैं इंसाँ की शिरयानों में
Hina Rizvi
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बेचता यूँँ ही नहीं है आदमी ईमान को
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को

शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को
Read Full
Adam Gondvi
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आदमी जान के खाता है मोहब्बत में फ़रेब
ख़ुद-फ़रेबी ही मोहब्बत का सिला हो जैसे
Iqbal Azeem
अब हम भी सोचते हैं कि बाज़ार गर्म है
अपना ज़मीर बेच के दुनिया ख़रीद लें
Iqbal Azeem
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सुर्ख़-रू होता है इंसाँ ठोकरें खाने के बा'द
रंग लाती है हिना पत्थर पे पिस जाने के बा'द
Syed Gulam Mohammad Mast Kalkattvi
यही है इबादत यही दीन-ओ-ईमाँ
कि काम आए दुनिया में इंसाँ के इंसाँ
Altaf Hussain Hali
हज़ार शम्अ' फ़रोज़ाँ हो रौशनी के लिए
नज़र नहीं तो अँधेरा है आदमी के लिए
Nushur Wahidi