Powerful Justice Shayari - Voices of truth, insaaf, and fight against injustice

Justice shayari reflects the voice of truth, fairness, and the fight against injustice. It expresses emotions of insaaf, haq, and resistance against zulm, often inspiring courage and moral strength. These verses capture both pain and hope in the journey toward justice.

insaaf shayari
माँ बाप और उस्ताद सब हैं ख़ुदा की रहमत
है रोक-टोक उन की हक़ में तुम्हारे नेमत
Altaf Hussain Hali
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nyay shayari
अज़ीज़-तर मुझे रखता है वो रग-ए-जाँ से
ये बात सच है मेरा बाप कम नहीं माँ से
Tahir Shaheer
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adalat shayari
ज़िंदगी भर तो कोई झूठ जिया है मैं ने
तू जो आ जाए तो ये आख़िरी पल सच हो जाए
Meraj Faizabadi
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haq shayari
जाने कब चुभ जाए आँखों में कोई बे-रहम सच
आइना भी देखने वालो सँभल कर देखना
Meraj Faizabadi
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ये आग वाग का दरिया तो खेल था हम को
जो सच कहें तो बड़ा इम्तिहान आँसू हैं
Abhishek shukla
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हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग
रो-रो के बात कहने की आदत नहीं रही
Dushyant Kumar
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धोखा है इक फ़रेब है मंज़िल का हर ख़याल
सच पूछिए तो सारा सफ़र वापसी का है
Rajesh Reddy
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ये सच है नफ़रतों की आग ने सब कुछ जला डाला
मगर उम्मीद की ठण्डी हवाएँ रोज़ आती हैं
Munawwar Rana
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मुंसिफ़ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे
मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँँ नहीं देते
Ahmad Faraz
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हम अम्न चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़
गर जंग लाज़मी है तो फिर जंग ही सही
Sahir Ludhianvi
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रातें किसी याद में कटती हैं और दिन दफ़्तर खा जाता है
दिल जीने पर माएल होता है तो मौत का डर खा जाता है

सच पूछो तो 'तहज़ीब हाफ़ी' मैं ऐसे दोस्त से आज़िज़ हूँ
मिलता है तो बात नहीं करता और फोन पे सर खा जाता है
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Tehzeeb Hafi
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चले जाओ भी अब जी लेंगे पर
सच कहो मजबूरी है क्या

मुझे ये कहानी कुछ और लिखनी थी
तुम्हारे हिसाब से पूरी है क्या
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Zubair Ali Tabish
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कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की
Parveen Shakir
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मैं सच कहूँगी मगर फिर भी हार जाऊँगी
वो झूट बोलेगा और ला-जवाब कर देगा
Parveen Shakir
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इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे
रौशनी ख़त्म न कर आगे अँधेरा होगा
Nida Fazli
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सच बोलने के तौर-तरीक़े नहीं रहे
पत्थर बहुत हैं शहर में शीशे नहीं रहे
Nawaz Deobandi
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सर पर हवा-ए-ज़ुल्म चले सौ जतन के साथ
अपनी कुलाह कज है उसी बाँकपन के साथ
Majrooh Sultanpuri
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झूट वाले कहीं से कहीं बढ़ गए
और मैं था कि सच बोलता रह गया
Waseem Barelvi
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अगर सच इतना ज़ालिम है तो हम से झूट ही बोलो
हमें आता है पतझड़ के दिनों गुल-बार हो जाना
Ada Jafarey
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ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है बढ़ता है तो मिट जाता है
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा
Sahir Ludhianvi
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ये सच है कि पाँवों ने बहुत कष्ट उठाए
पर पाँव किसी तरह राहों पे तो आए
Dushyant Kumar
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निगाह-ए-गर्म क्रिसमस में भी रही हम पर
हमारे हक़ में दिसम्बर भी माह-ए-जून हुआ
Akbar Allahabadi
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मैं ख़ुद भी यार तुझे भूलने के हक़ में हूँ
मगर जो बीच में कम-बख़्त शा'इरी है ना
Afzal Khan
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जाने क्या क्या ज़ुल्म परिंदे देख के आते हैं
शाम ढले पेड़ों पर मर्सिया-ख़्वानी होती है
Afzal Khan
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सच घटे या बढ़े तो सच न रहे
झूट की कोई इंतिहा ही नहीं
Krishna Bihari Noor
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खुला है झूठ का बाज़ार आओ सच बोलें
न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें
Qateel Shifai
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा

हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में
अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
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Santosh S Singh
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ज़ालिम था वो और ज़ुल्म की आदत भी बहुत थी
मजबूर थे हम उस से मोहब्बत भी बहुत थी
Kaleem Aajiz
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झूठों ने झूठों से कहा है सच बोलो
सरकारी एलान हुआ है सच बोलो

घर के अंदर तो झूठों की एक मंडी है
दरवाज़े पर लिखा हुआ है सच बोलो
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Rahat Indori
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सच तो ये है 'मजाज़' की दुनिया
हुस्न और इश्क़ के सिवा क्या है
Asrar Ul Haq Majaz
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टक गोर-ए-ग़रीबाँ की कर सैर कि दुनिया में
उन ज़ुल्म-रसीदों पर क्या क्या न हुआ होगा
Meer Taqi Meer
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किसी बे-वफ़ा से बिछड़ के तू मुझे मिल गया भी तो क्या हुआ
मेरे हक़ में वो भी बुरा हुआ मेरे हक़ में ये भी बुरा हुआ
Mumtaz Naseem
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होंठ जो कहते है सब कुछ झूठ है
आँख सच कहती है उस की बात सुन
Siddharth Saaz
ये नहीं है कि वो एहसान बहुत करता है
अपने एहसान का एलान बहुत करता है

आप इस बात को सच ही न समझ लीजिएगा
वो मेरी जान मेरी जान बहुत करता है
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Jawwad Sheikh
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बस एक लम्हे के सच झूट के एवज़ 'फ़रहत'
तमाम उम्र का इल्ज़ाम ले गया मुझ से
Farhat Abbas Shah
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जब राह झूठ की चुनी तो लिफ़्ट भी मिली
और सच की राह में मिले पैरों के बस निशाँ
Tanoj Dadhich
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हमारी ज़िंदगी में क्या नया है
वही होता है जो, वो हो रहा है

ज़रा दुनिया का अपनी हाल देखो
ज़रा सोचो कोई सच-मुच ख़ुदा है?
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Shaad Imran
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तुम मिरी ज़िंदगी हो ये सच है
ज़िंदगी का मगर भरोसा क्या
Bashir Badr
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जाने क्या क्या ज़ुल्म परिंदे देख के आते हैं
शाम ढले पेड़ों पर मर्सिया-ख़्वानी होती है
Afzal Khan
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सच बताओ कि सच यही है क्या
साँस लेना ही ज़िंदगी है क्या

कुछ नया काम कर नई लड़की
इश्क़ करना है बावली है क्या
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Vikram Gaur Vairagi
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यूँँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उन की रस्म नई है, न अपनी रीत नई

यूँँ ही हमेशा खिलाए हैं हम ने आग में फूल
न उन की हार नई है, न अपनी जीत नई
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Faiz Ahmad Faiz
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे
अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे

मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी
उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे
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Tehzeeb Hafi
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किसी के झूठ से पर्दा हटाकर
हमारा सच बहुत रोया था उस दिन
Shadab Asghar
इस गए साल बड़े ज़ुल्म हुए हैं मुझ पर
ऐ नए साल मसीहा की तरह मिल मुझ से
Sarfraz Nawaz
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ओ सखी मन उस का तो तन भी उसी का
हक़ है उस को ग़ैर ये आँगन न चू
में
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Neeraj Neer
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तो डर रहे हैं आप कहीं हक़ न माँग ले
या'नी कि सब को खौफ़ है औरत के नाम से
Abhishar Geeta Shukla
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वो कहते हैं मैं ज़िंदगानी हूँ तेरी
ये सच है तो उन का भरोसा नहीं है
Aasi Ghazipuri
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जैसे तुम ने वक़्त को हाथ में रोका हो
सच तो ये है तुम आँखों का धोख़ा हो
Tehzeeb Hafi
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मुझे उस सेे मुहब्बत सच बड़ी महँगी पड़ेगी
अकेलेपन से उस ने इश्क़ ऐसा कर लिया है
Anukriti 'Tabassum'
किसी उम्मीद का ये इस्तिआरा जान पड़ता है
कि तन्हा ही सही सच झूट से अब रोज़ लड़ता है
Tarun Pandey
सच कहें तो वो कहानी बीच में दम तोड़ देगी
जिस कहानी को सभी किरदार छोड़े जा रहे हैं
Anurag Pandey
कम अज़ कम इक ज़माना चाहता हूँ
कि तुम को भूल जाना चाहता हूँ

ख़ुदारा मुझ को तन्हा छोड़ दीजे
मैं खुल कर मुस्कुराना चाहता हूँ

सरासर आप हूँ मद्दे मुक़ाबिल
ख़ुदी ख़ुद को हराना चाहता हूँ

मेरे हक़ में उरूस-ए-शब है मक़्तल
सो उस से लब मिलाना चाहता हूँ

ये आलम है, कि अपने ही लहू में
सरासर डूब जाना चाहता हूँ

सुना है तोड़ते हो दिल सभों का
सो तुम से दिल लगाना चाहता हूँ

उसी बज़्म-ए-तरब की आरज़ू है
वही मंज़र पुराना चाहता हूँ

नज़र से तीर फैंको हो, सो मैं भी
जिगर पर तीर खाना चाहता हूँ

चराग़ों को पयाम-ए-ख़ामुशी दे
तेरे नज़दीक आना चाहता हूँ
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Kazim Rizvi
ज़माने ने ग़लत को सच कहा है
ज़माने की ख़राबी है हमीं से
Meem Alif Shaz
ज़माना ज़ुल्म करता है ख़ुशी से
कभी तुझ को कभी मुझ को सताए
Meem Alif Shaz
इतने अफ़सुर्दा नहीं हैं हम कि कर लें ख़ुद-कुशी
और न इतने ख़ुश कि सच में मरने की ख़्वाहिश न हो
Charagh Sharma
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बस एक मैं था जिस सेे सच मुच में दिलबरी की
वरना हर आदमी से उस ने दो नंबरी की

जिस बात में भी हम ने ख़ुद को अकेला रक्खा
बाग़ात में भी हम ने जोड़ों की मुख़बरी की
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Muzdum Khan
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बे-वफ़ा शख़्स तेरे होंठों पे ये लफ़्ज़-ए-वफ़ा
सच बताऊँ मुझे बिल्कुल नहीं अच्छा लगता
Shajar Abbas
नहीं थकते मुझे इल्ज़ाम देते
भला कब तक ये बेरहमी करोगे

अगर सच बोलने मैं लग गया तो
ग़लत फ़हमी ग़लत फ़हमी करोगे
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Gopesh "Tanha"
सज़ा सच बोलने की ये मिली है
सभी ने कर लिया हम से किनारा
Meem Alif Shaz
तुम मिरे साथ हो ये सच तो नहीं है लेकिन
मैं अगर झूट न बोलूँ तो अकेला हो जाऊँ
Ahmad Kamal Parvazi
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तू तो सच में ही झूठा निकला यारा
तू तो कहता था हम मिलते रहेंगे
Vicky Kumar Rajak
या'नी तुम वो हो वाक़ई हद है
मैं तो सच-मुच सभी को भूल गया
Jaun Elia
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मुझे चाह थी किसी और की, प मुझे मिला कोई और है
मेरी ज़िन्दगी का है और सच, मेरे ख़्वाब सा कोई और है

तू क़रीब था मेरे जिस्म के, बड़ा दूर था मेरी रूह से
तू मेरे लिए मेरे हमनशीं कोई और था कोई और है
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Avtar Singh Jasser
दोस्त अपना हक़ अदा करने लगे
बेवफ़ाई हमनवा करने लगे

मेरे घर से एक चिंगारी उठी
पेड़ पत्ते सब हवा करने लगे
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Santosh S Singh
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उस के वालिद नवाब हैं भाई
उस को हक़ है हमें भुलाने का
Deepak Sharma Deep
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वक़्त, वफ़ा, हक़, आँसू, शिकवे जाने क्या क्या माँग रहे थे
एक सहूलत के रिश्ते से हम ही ज़्यादा माँग रहे थे

उस की आँखें उस की बातें उस के लब वो चेहरा उस का
हम उस की हर एक अदास अपना हिस्सा माँग रहे थे
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Shikha Pachouly
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ख़ुशरंग नज़र आता है जाज़िब नहीं लगता
माहौल मेरे दिल से मुख़ातिब नहीं लगता

मैं भी नहीं हर शे'र में मौजूद ये सच है
ग़ालिब भी हर इक शे'र में ग़ालिब नहीं लगता
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Obaid Azam Azmi
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क्या ग़लत-फ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं
वो मुझे समझा तो सकता था कि ऐसा कुछ नहीं
इश्क़ से बच कर भी बंदा कुछ नहीं होता मगर
ये भी सच है इश्क़ में बंदे का बचता कुछ नहीं
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Tehzeeb Hafi
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मुझे आज़ाद कर दो एक दिन सब सच बता कर
तुम्हारे और उस के दरमियाँ क्या चल रहा है
Tehzeeb Hafi
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मुझ को भी ज़िद करने का हक़ दो साहब
मेरे भीतर भी इक बच्चा रहता है
Atul K Rai
डाली है ख़ुद पे ज़ुल्म की यूँँ इक मिसाल और
उस के बग़ैर काट दिया एक साल और
Subhan Asad
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मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है
क्या मिरे हक़ में फ़ैसला देगा
Sudarshan Fakir
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हमेशा इक दूसरे के हक़ में दुआ करेंगे ये तय हुआ था
मिलें या बिछड़ें मगर तुम्हीं से वफ़ा करेंगे ये तय हुआ था
Shabeena Adeeb
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न खाओ क़स
में वग़ैरा न अश्क ज़ाया' करो
तुम्हें पता है मेरी जान हक़-पज़ीर हूँ मैं
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Amaan Haider
पूछती है सच बताएँ, गर किसी से इश्क़ है
सच तो ये है, हाँ मुझे अब हर किसी से इश्क़ है

फिर रहा है बेटी के रिश्ते के ख़ातिर क्यूँ वो बाप
पूछ लेता काश, ऐ दुख़्तर, किसी से इश्क़ है
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Adnan Ali SHAGAF
तबक़ों में रंग-ओ-नस्ल के उलझा के रख दिया
ये ज़ुल्म आदमी ने किया आदमी के साथ
Bakhtiyar Ziya
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भले ही जान-लेवा हो सियासत को ग़लत कहना
मगर फिर भी ये सच ईमान वाले लोग कहते हैं
Amaan Pathan
सच की डगर पे जब भी रक्खे क़दम किसी ने
पहले तो देखी ग़ुर्बत फिर तख़्त-ओ-ताज देखा
Amaan Pathan
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अब तो अमान होने लगा है यक़ीन ये
उस के ही हक़ में आएगा मुंसिफ़ का फ़ैसला
Amaan Pathan
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झूटी ता'रीफ़ों के पीछे भागते रहते हो दिन भर
अभी अगर मैं सच कह दूँगा वो तुम को चुभ जाएगा
Amaan Pathan
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ख़ैर सच तो है सच मगर ऐ झूठ
मैं ने तेरा भी ए'तिबार किया
Firaq Gorakhpuri
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पाना या खोना तो उसे क़िस्मत की बात थी
हम को तो दिल लगाने का हक़ भी न मिल सका
Harsh saxena
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चाँद ला सका नहीं कभी सनम है सच मगर
ला रहा हूँ मैं तुम्हारी ख़ातिर आफ़ताब अब
Amaan Pathan
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जो दिया सच की आग से रौशन
वो तो दरिया से भी बुझा ही नहीं
Amaan Pathan
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कितने आशिक़ सँभल गए हैं मेरा फ़साना सुन सुन कर
मेरे हक़ में जैसी भी हो काम की है नाकामी भी
Qaisar Shameem
अदाकारी बहुत दुख दे रही है
मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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काठ की हाँडी अब न चढ़ेगी ज़ुल्म के चूल्हे पर यारो
वक़्त का पहिया घूमेगा मुंसिफ़ भी जेल में जाएगा
Amaan Pathan
आसमानों से फ़रिश्ते जो उतारे जाएँ
वो भी इस दौर में सच बोलें तो मारे जाएँ
Ummeed Fazli
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अपने अंदर हँसता हूँ मैं और बहुत शरमाता हूँ
ख़ून भी थूका सच-मुच थूका और ये सब चालाकी थी
Jaun Elia
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हमें अपने घर से चले हुए सर-ए-राह उम्र गुज़र गई
कोई जुस्तुजू का सिला मिला न सफ़र का हक़ ही अदा हुआ
Iqbal Azeem
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कुछ न कहने से भी छिन जाता है एजाज़-ए-सुख़न
ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है
Muzaffar Warsi
चाहे जीतनी भले ही देरी हो
इक़ दुआ है कभी तो पूरी हो

काश हम तुम से हक़ से कह पाते
जान ए जॉ तुम तो सिर्फ़ मेरी हो
Read Full
Shadab Asghar
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ये समझ के माना है सच तुम्हारी बातों को
इतने ख़ूब-सूरत लब झूट कैसे बोलेंगे
Shahzad Ahmad
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तुम्हारे सामने सच बोलने से रुक गए हैं
हमें बताओ तुम्हें और क्या पसंद नहीं
Sanaullah Zaheer
उन को डर है कि कोई राज़ न खुल जाए कहीं
और मुझ में वो तलब है कि कोई सच न दबे
Haresh Vanza
अगर तौफ़ीक़ हो सच बोलने की
तो अपनी भी तरफ़-दारी न करना
Raees Rampuri
ख़ामुशी कब चीख़ बन जाए किसे मालूम है
ज़ुल्म कर लो जब तलक ये बे-ज़बानी और है
Munawwar Rana
दोस्तों का क्या है वो तो यूँँ भी मिल जाते हैं मुफ़्त
रोज़ इक सच बोल कर दुश्मन कमाने चाहिएँ
Rajesh Reddy
वाक़िआ' कुछ भी हो सच कहने में रुस्वाई है
क्यूँँ न ख़ामोश रहूँ अहल-ए-नज़र कहलाऊँ
Shahzad Ahmad
शे'र अच्छे भी कहो सच भी कहो कम भी कहो
दर्द की दौलत-ए-नायाब को रुस्वा न करो
Abdul Ahad Saaz
मैं बिखर गया तो सँवर गया मेरे मुंसिफ़ो को ये दुख रहा
वही फ़ैसला मेरे हक़ में था जो मेरे ख़िलाफ़ किया गया
Shahid Zaki
धोका है इक फ़रेब है मंज़िल का हर ख़याल
सच पूछिए तो सारा सफ़र वापसी का है
Rajesh Reddy
तुम्हारे सामने सच बोलने से रुक गए हैं
हमें बताओ तुम्हें और क्या पसंद नहीं
Sanaullah Zaheer
मुझे अब आ गए हैं नफ़रतों के बीज बोने
सो मेरा हक़ ये बनता है कि सरदारी करूँँगा
Abdurrahman Wasif
मेरे साथ मेरे तमाम दोस्तों को भी ब्लॉक कर दिया
सच बताओ इतनी नफरत है या मेरी मोहब्बत का ख़ौफ़
Piyush
रोओ धोओ कोई बात नहीं
पर सच मुच में इतना दुख है क्या
Pawan
तुम कितनी प्यारी हो सच में
तुम पर जाँ कुर्बान हमारी
Pawan
बन जाती कैसे दुनिया से
सच कहने की आदत ठहरी
Pawan