Mehfil Shayari Collection - Shayari that brings charm, gatherings, and poetic vibes alive

Mehfil shayari captures the beauty of gatherings filled with poetry, laughter, and heartfelt conversations. It reflects the charm of a lively mehfil where emotions, ishq, and dosti come together. These verses are perfect for expressing the magic of shared moments and soulful connections.

उठ कर तो आ गए हैं तिरी बज़्म से मगर
कुछ दिल ही जानता है कि किस दिल से आए हैं
Faiz Ahmad Faiz
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तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चराग़
लोग क्या सादा हैं सूरज को दिखाते हैं चराग़
Ahmad Faraz
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बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
Bahadur Shah Zafar
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मुझे अँधेरे से बात करनी है सो करा दो, दिया बुझा दो
कुछ एक लम्हों को रौशनी का गला दबा दो, दिया बुझा दो

रिवाज़-ए-महफ़िल निभा रहा हूँ बता रहा हूँ मैं जा रहा हूँ
मुझे विदा दो, जो रोना चाहे उन्हें बुला दो, दिया बुझा दो
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Vikram Gaur Vairagi
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एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक
जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा
Nida Fazli
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तिरे सिवा भी कहीं थी पनाह भूल गए
निकल के हम तिरी महफ़िल से राह भूल गए
Majrooh Sultanpuri
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तिरे बग़ैर अजब बज़्म-ए-दिल का आलम है
चराग़ सैंकड़ों जलते हैं रौशनी कम है
Shakeel Badayuni
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दूर हूँ लेकिन बता सकता हूँ उन की बज़्म में
क्या हुआ क्या हो रहा है और क्या होने को है
Shakeel Badayuni
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रोज़ बस्ते हैं कई शहर नए
रोज़ धरती में समा जाते हैं
Kaifi Azmi
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दुल्हन बनी हुई हैं राहें
जश्न मनाओ साल-ए-नौ के
Sahir Ludhianvi
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फिर नज़र में फूल महके दिल में फिर शमएँ जलीं फिर तसव्वुर ने लिया उस बज़्म में जाने का नाम
Faiz Ahmad Faiz
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प्यास जहाँ की एक बयाबाँ तेरी सख़ावत शबनम है
पी के उठा जो बज़्म से तेरी और भी तिश्ना-काम उठा
Ali Sardar Jafri
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मुझे तो होश न था उन की बज़्म में लेकिन
ख़मोशियों ने मेरी उन से कुछ कलाम किया
Behzad Lakhnavi
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मैं ढूँढ़ रहा हूँ मिरी वो शम्अ' कहाँ है
जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे
Behzad Lakhnavi
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ऐ दिल की ख़लिश चल यूँँही सही चलता तो हूँ उन की महफ़िल में
उस वक़्त मुझे चौंका देना जब रंग पे महफ़िल आ जाए
Behzad Lakhnavi
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तुम हुस्न की ख़ुद इक दुनिया हो शायद ये तुम्हें मालूम नहीं
महफ़िल में तुम्हारे आने से हर चीज़ पे नूर आ जाता है
Sahir Ludhianvi
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देखो तो चश्म-ए-यार की जादू-निगाहियाँ
बेहोश इक नज़र में हुई अंजुमन तमाम
Hasrat Mohani
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा

हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में
अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
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Santosh S Singh
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हमीं हैं सोज़ हमीं साज़ हैं हमीं नग़्मा
ज़रा सँभल के सर-ए-बज़्म छेड़ना हम को
Moin Ahsan Jazbi
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मैं ने आबाद किए कितने ही वीराने 'हफ़ीज़'
ज़िंदगी मेरी इक उजड़ी हुई महफ़िल ही सही
Hafeez Banarasi
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अब के इस बज़्म में कुछ अपना पता भी देना
पाँव पर पाँव जो रखना तो दबा भी देना
Zafar Iqbal
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चराग़ घर का हो महफ़िल का हो कि मंदिर का
हवा के पास कोई मसलहत नहीं होती
Waseem Barelvi
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महफ़िल में तेरी यूँँ ही रहे जश्न-ए-चरागाँ
आँखों में ही ये रात गुज़र जाए तो अच्छा
Sahir Ludhianvi
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किस की होली जश्न-ए-नौ-रोज़ी है आज
सुर्ख़ मय से साक़िया दस्तार रंग
Imam Bakhsh Nasikh
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नहीं हर चंद किसी गुम-शुदा जन्नत की तलाश
इक न इक ख़ुल्द-ए-तरब-नाक का अरमाँ है ज़रूर

बज़्म-ए-दोशंबा की हसरत तो नहीं है मुझ को
मेरी नज़रों में कोई और शबिस्ताँ है ज़रूर
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Asrar Ul Haq Majaz
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मोहब्बत करने वाले कम न होंगे
तिरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे
Hafeez Hoshiarpuri
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शोर की इस भीड़ में ख़ामोश तन्हाई सी तुम
ज़िन्दगी है धूप तो मद-मस्त पुर्वाई सी तुम

चाहे महफ़िल में रहूँ चाहे अकेले में रहूँ
गूँजती रहती हो मुझ में शोख़ शहनाई सी तुम
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Kunwar Bechain
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उस ने महफ़िल से उठाया हम को
जिस को पलकों पे बिठाया हम ने
Vishal Bagh
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अगर लगता है वो क़ाबिल नहीं है
तो रिश्ता तोड़ना मुश्किल नहीं है

रक़ीब आया है मेरे शे'र सुनने
तो अब ये जंग है महफ़िल नहीं है
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Tanoj Dadhich
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फिर इस के बा'द मनाया न जश्न ख़ुश्बू का
लहू में डूबी थी फ़स्ल-ए-बहार क्या करते
Azhar Iqbal
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गुमान है या किसी विश्वास में है
सभी अच्छे दिनों की आस में है

ये कैसा जश्न है घर वापसी का
अभी तो राम ही वनवास में है
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Azhar Iqbal
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गले मिली कभी उर्दू जहाँ पे हिन्दी से
मिरे मिज़ाज में उस अंजुमन की ख़ुशबू है
Satish Shukla Raqeeb
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ख़ुशबू से किस ज़बान में बातें करेंगे लोग
महफ़िल में ये सवाल तुझे देख कर हुआ
Mansoor Usmani
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ये गूँगों की महफ़िल है निकलना ही पड़ेगा
क्या इतनी ख़ता कम है कि हम बोल पड़े हैं
Waseem Barelvi
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जो बुजुर्गों की दु'आओं के दीयों से रौशन
रोज़ उस घर में दीवाली का जश्न होता है
Pratap Somvanshi
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दर्द की बात किसी हँसती हुई महफ़िल में
जैसे कह दे किसी तुर्बत पे लतीफ़ा कोई
Ahmad Rahi
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दफ्न ताबूत में कर तिरी हर ख़ुशी
जश्न कैसे मनाते है मय्यत पे भी

ख़ास तारीख़ थी इम्तिहाँ की मगर
आज बारात उस की बुला ली गई
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Shilpi
खिला कर भंग की गुजिया समा रंगीन कर दो तुम
बड़ी मुश्क़िल से तो हो पाया है दीदार होली में
Vijay Anand Mahir
कम अज़ कम इक ज़माना चाहता हूँ
कि तुम को भूल जाना चाहता हूँ

ख़ुदारा मुझ को तन्हा छोड़ दीजे
मैं खुल कर मुस्कुराना चाहता हूँ

सरासर आप हूँ मद्दे मुक़ाबिल
ख़ुदी ख़ुद को हराना चाहता हूँ

मेरे हक़ में उरूस-ए-शब है मक़्तल
सो उस से लब मिलाना चाहता हूँ

ये आलम है, कि अपने ही लहू में
सरासर डूब जाना चाहता हूँ

सुना है तोड़ते हो दिल सभों का
सो तुम से दिल लगाना चाहता हूँ

उसी बज़्म-ए-तरब की आरज़ू है
वही मंज़र पुराना चाहता हूँ

नज़र से तीर फैंको हो, सो मैं भी
जिगर पर तीर खाना चाहता हूँ

चराग़ों को पयाम-ए-ख़ामुशी दे
तेरे नज़दीक आना चाहता हूँ
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Kazim Rizvi
ज़ेहन से यादों के लश्कर जा चुके
वो मेरी महफ़िल से उठ कर जा चुके

मेरा दिल भी जैसे पाकिस्तान है
सब हुकूमत कर के बाहर जा चुके
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Tehzeeb Hafi
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महफ़िल में बैठे लोगों को भाने लगी
जब वो मेरे अश'आर फ़रमाने लगी
Rachit Sonkar
समुंदर में भी सहरा देखना है
मुझे महफ़िल में तन्हा देख लेना
Aqib khan
मुझ सेे होकर के ही बे-ज़ार चले जाते हैं
मेरी महफ़िल से मेरे यार चले जाते हैं

मुझ को मालूम है रहता नहीं है अब वो वहाँँ
साल में फिर भी हम इक बार चले जाते हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
ये उस की मेहरबानी है वो घर में ही सँवरती है
निकल आए जो महफ़िल में तो क़त्ल-ए-आम हो जाए
Ashraf Jahangeer
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मैं तुझे बज़्म में लाऊँगा मेरी जान मगर
लोग जब दूसरे चेहरों पे फ़िदा हो जाएँ
Ashu Mishra
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पहले थोड़ी मुश्किल होगी
आगे लेकिन मंज़िल होगी

सब बाराती शाइ'र होंगे
मेरी शादी महफ़िल होगी
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Tanoj Dadhich
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ज़ब्त से चूर हो गया होगा
ग़म से मामूर हो गया होगा

बज़्म-ए-अहबाब छोड़ने वाला
कितना मजबूर हो गया होगा
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Nusrat Siddiqui
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तमन्नाओं में उलझाया गया हूँ
खिलौने दे के बहलाया गया हूँ

दिल-ए-मुज़्तर से पूछ ऐ रौनक़-ए-बज़्म
मैं ख़ुद आया नहीं लाया गया हूँ
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Shad Azimabadi
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चराग़ बन के जली थी मैं जिस की महफ़िल में
उसे रुला तो गया कम से कम धुआँ मेरा
Aziz Bano Darab Wafa
हम अंजुमन में सब की तरफ़ देखते रहे
अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला
Mustafa Zaidi
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ज़िंदगी और मौत का मतलब
तुम को पाना है तुम को खोना है

उठ के महफ़िल से मत चले जाना
तुम से रौशन ये कोना कोना है
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Wajida Tabassum
सरसरी अंदाज़ से देखोगे तो महफ़िल ही महफ़िल
ग़ौर से देखोगे तो हर आदमी तन्हा लगेगा
Shuja Khawar
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हम ने हँस हँस के तेरी बज़्म में ऐ पैकर-ए-नाज़
कितनी आहों को छुपाया है तुझे क्या मालूम
Makhdoom Mohiuddin
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हट के देखेंगे उसे रौनक़-ए-महफ़िल से कभी
सब्ज़ मौसम में तो हर पेड़ हरा लगता है
Irfan Siddiqi
दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब
क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
Allama Iqbal
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हम खड़े रहते हैं मुजरिम की तरह महफ़िल में
उन का अंदाज़ वकीलों की तरह होता है
Shakir Dehlvi
यूँँ भरी महफ़िल में मेरा नाम न लो
हमारे रिश्ते सर-ए-आम फाश हो जाएँगे

तुम्हें अपना बनाने का चाहत रखने वाले
मेरे साथ तुम्हें देखेंगे तो उदास हो जाएँगे
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MANOBAL GIRI
चंद लम्हें साथ में गुज़ारे कोई
हम को इस दर्द से उबारे कोई

है लाज़िम तेरी आँखों की शर्मिंदगी भी
मेरा नाम जब महफ़िल में पुकारे कोई
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Kuldeep Nagar
पहले तो बर्बादियों का जश्न होना चाहिए
बा'द में आराम से अच्छे से रोना चाहिए
Dharmesh Solanki
ये अब सहा नहीं जाता कि इक ही महफ़िल में
रहे तू और मैं फिर भी हमारी बात न हो
Dharmesh Solanki
बाहरस महफ़िल लगता हूँ
लेकिन अंदर से तन्हा हूँ
Pawan
तिरी आँखों कि ख़ामोशी बता देगी
कि महफ़िल में तिरे गर पास ना बैठा
Abhishek Jadhav
ये महफ़िल कब बिखरेगी बतलाओ तो
हम को उस के कूचे में भी जाना है
Pawan
वस्ल हिज्र वादे सब इक आह में शरीक थे
हम किसी की महफ़िल ए निकाह में शरीक थे
Aarush Sarkaar
तन्हाई में महफिल होता हूँ
पर भीड़ अकेला कर देती है
Prashant Sitapuri
उसे इतना क़रीबी क्यूँँ बनाया 'कब्क'
गया इक शख़्स तो महफ़िल गई जैसे
Krishnakant Kabk
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ये महफ़िल है दिल की महफ़िल
आँखों से बातें होती है
Pawan
बैठे हैं तनकर महफ़िल में
ये इक लड़की की रहमत है
Pawan
लोग बैठे है जो सभी तन्हा
उन को ना छोड़ना कभी तन्हा

ये जो महफिल लगी है रोने पर
हँस के हो जाऊँगा अभी तन्हा
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maqbul alam
है गुज़ारिश आप से, महफ़िल में मत लाना उसे
बे-बहर हो शे'र तो जंगल में छोड़ आना उसे
Zaman Zaidi ZAMAN
नाम जब महफ़िल में मेरा आता होगा
वो कहीं उठके चला तो जाता होगा
karan singh rajput
सुना है बज़्म में कल उस के ख़ूब चर्चे थे
जरूर उस ने मेरा नज़्म पढ़ दिया होगा
Ashraf Ali
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हर घड़ी जश्न मनाने के लिए होती है
ज़िन्दगी जश्न मनाने के लिए होती है
Ramnath Shodharthi
गुमाँ मत कर कि है तेरी बदौलत रौनक़े-महफ़िल
ग़ज़ल वालो यहाँ हम हैं तो ये बाज़ार चलता है
Ramnath Shodharthi
करे हो ज़िक्र-ए-सुख़न ज़िक्र-ए-ख़ाकसार बग़ैर
ये कैसा ज़ौक़-ए-सुख़न है ये कैसी महफ़िल है
Ramnath Shodharthi
उन का ज़िक्र जब भी हुआ है महफ़िल में
क़सम ख़ुदा की कुछ-कुछ हुआ है तब दिल में
Abdul Rahman "Vaahid"
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ज़िन्दगी का पहला सिगरेट पी रहा हूँ आज मैं
दोस्तों महफ़िल करो मुझ को मुबारकबाद दो
Shajar Abbas
महफ़िल में उस ने इश्क़ का ऐलान कर दिया
सब दोस्तों को सखियों को हैरान कर दिया
Shajar Abbas
निशान-ए-तुर्बत-ए-लैला-ओ-क़ैस मिट न सके
दिफा है आप पे वाजिब सुनो गर आशिक़ हो

अगरचे इश्क़ पे आँच आई जाँ लूटा देंगे
ये बात बर सरे महफ़िल कहो गर आशिक़ हो
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Shajar Abbas
चल कर 'शजर' ये शहर में सब को बताइए
दिल भर के रक़्स कीजिए महफ़िल सजाइए

माज़ी की सारी दिल से मिटाकर क़ुदूरतें
सब मिलके साथ जश्न-ए-चराग़ाँ मनाइए
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Shajar Abbas
सुकून आप को देती है महफ़िल-ए-ख़ूबाँ
हमें तो मुल्क-ए-ख़मोशाँ सुकून देता है
Shajar Abbas
है मजलिस-ए-फ़िराक़ मेरे क़ल्ब में बपा
धड़कन के ज़रिए आह-ओ-बुका कर रहा हूँ मैं
Shajar Abbas
मुनकिर-ए-इश्क़ के सीने से निकलता है धुआँ
जानिब-ए-कू-ए-बुतां मेरे क़दम उठते हैं

रोक लेती हैं वो आँखों का इशारा देकर
उन की महफ़िल से अगर जाने को हम उठते हैं
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Shajar Abbas
गैर की महफ़िल में इतनी बेख़ुदी अच्छी नहीं
लौटना हो घर को वापस तो मुसीबत मयकशी
anupam shah
ख़बर मेरे चले जाने की सब को मिल गई होगी
किसी का जश्न होगा अब कोई मातम मनायेगा
Harshwardhan Aurangabadi
ग़ज़लें तो पढ़ रहे थे वो 'अहमद फ़राज़' की
महफ़िल में लोग मुझ को बड़े चोर लगे हैं
Maviya abdul kalam khan
मेरे क़ुसूर वहाँ बात बात पर निकले
वो कैसी बज़्म थी ग़द्दार मो'तबर निकले
Rekhta Pataulvi
महफ़िल में कौन आया है सागर लिए हुए
इक ख़ास कैफ़ियत का समुंदर लिए हुए
Rekhta Pataulvi
महफ़िल में कौन आया है साग़र लिए हुए
इक ख़ास कैफ़ियत का समुंदर लिए हुए
Rekhta Pataulvi
कभी शिरकत करूँँगा मैं तिरी महफ़िल
रिहाई तो मिले इस क़ैद से आख़िर
Vikas Sanwa
उसे महफ़िल में छाने में ज़रा सी देर लगती है
कोई नगमा बनाने में ज़रा सी देर लगती है

कोई शाइ'र नहीं पैदा हुआ है जन्म से यारों
ग़ज़ल की ताब आने में ज़रा सी देर लगती है
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Aniket sagar
तुझे बदनाम करने की निय्यत रखता नहीं था मैं ,लेकिन
ये मजबूरी थी मेरी, बज्म में जो नाम बोला है तेरा
A R Sahil "Aleeg"
जश्न-ए-मक़तल को मिरे शाम मनाते तो सही
तुम चराग़ों को हवाओं में जलाते तो सही

पा-ब-जौलाँ ही सही दौड़ के आता मैं तो
अपने जानिब मुझे इक बार बुलाते तो सही
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Faiz Ahmad
काँटों की महफ़िल में, हम फूल कहाँ जाएँगे
तेरी उस चाहत को, हम भूल कहाँ पाएँगे
Rudransh Trigunayat
तुम्हारी होंठों की लाली
तुम्हारे गालों का वो तिल

हमें भी कर दिया रुस्वा
बना के यूँँ भरी महफ़िल
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Real Abhishek Singh
साल-ए-नौ का जश्न मुबारक तुम को
हम तो रोएँगे अपना दुख ले कर
Dileep Kumar
मसलहत है फरेब-ए-हसीं
एक झूठी किरन की तरह

हो गई महफ़िल-ए-नाज़ भी
एक उजड़े चमन की तरह
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Rekhta Pataulvi
चाय का रंग तेरे जैसा था
तू बहुत याद आई महफ़िल में
Shajar Abbas
कि इक ईंट औ गिर गई ज़िन्दगी की
नए साल के जश्न में डूबे हैं सब
Irshad Siddique "Shibu"
फिर आज यारों ने तुम्हारी बात की
फिर यार महफ़िल में मिरी खिल्ली उड़ी
Harsh saxena
तुम्हारे नाम को जब क़ाफ़िया बनाया गया
तो सानी मिसरा सभी होंटों पर सजाया गया

जो मुनकिरान-ए-मोहब्बत थे बज़्म-ए-इशरत में
कलेजा उन का शजर रात भर जलाया गया
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Shajar Abbas
बज़्म-ए-शोरा में मेरा यार अगर आएगा
अनगिनत साथ में मौज़ू-ए-ग़ज़ल लाएगा

देख लेंगे ये अगर झाँक के आँखों में तेरी
नश्शा सर से न जवानों के उतर पाएगा
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Shajar Abbas
एहसास नहीं होता लुटने का सनम हम को
जब आप की महफ़िल से हम लौट के आते हैं
Ajeetendra Aazi Tamaam
चला जाता है महफ़िल में हसीनों की सुलगने को
गम-ए-फ़ुर्क़त में दिल इक ग़म नया हरदम लगाता है
Ajeetendra Aazi Tamaam
बिना तेरे अधूरे मेरे हर इक शे'र रह जाते
कि जैसे राम बिन शबरी के सारे बेर रह जाते

तुम्हारे वास्ते मैं ने यहाँ महफ़िल सजाई थी
भला होता अगर तुम और थोड़ी देर रह जाते
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Alankrat Srivastava
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हम आज यहाँ दिल में ही जश्न मनाने आए है
हम यार शहर अपना ही आज जलाने आए है
Raunak Karn
अब तो बस तन्हाइयाँ ही साथ रहती हैं सदा
याद पड़ता है कि पहले रौनक़-ए -महफ़िल थे हम
Salman ashhadi sahil
न जाने कब से इक मतला लिए बैठा हूँ महफ़िल में
तुम्हारा ज़िक्र कर दे कोई तो पूरी ग़ज़ल कर लूँ
Harsh saxena