Violence Shayari Collection - Dark emotions, rage, and conflict expressed through intense words

Violence Shayari captures the raw intensity of rage, conflict, and emotional storms that often remain unspoken. Through powerful words, it reflects zulm, anger, and inner chaos, giving voice to dark realities and human struggles. Whether it’s about revenge, injustice, or inner battles, this form of poetry channels deep, unsettling emotions into meaningful expression.

hinsa shayari
सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है
Rahat Indori
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zulm shayari
हमारा ख़ून का रिश्ता है सरहदों का नहीं
हमारे ख़ून में गँगा भी चनाब भी है
Kanval Ziai
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junoon shayari
मेरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा
इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा
Ameer Qazalbash
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वो क़त्ल कर के मुझे हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है, ये काम किस का था?
Dagh Dehlvi
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वो अपने ख़ून से लिखने लगी है नाम मेरा
अब इस मज़ाक़ को संजीदगी से लेना है
Shakeel Jamali
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उस के क़त्ल पे मैं भी चुप था मेरा नंबर अब आया
मेरे क़त्ल पे आप भी चुप हैं अगला नंबर आप का है
Nawaz Deobandi
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उन्हीं के फ़ैज़ से बाज़ार-ए-अक़्ल रौशन है,
जो गाह गाह जुनूँ इख़्तियार करते रहे
Faiz Ahmad Faiz
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उस की तस्वीरें हैं दिलकश तो होंगी
जैसी दीवारें हैं वैसा साया है

एक मैं हूँ जो तेरे क़त्ल की कोशिश में था
एक तू है जो जेल में खाना लाया है
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Tehzeeb Hafi
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हम अम्न चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़
गर जंग लाज़मी है तो फिर जंग ही सही
Sahir Ludhianvi
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इक अव्वल दर्जे का पाक इक माहिर है
मन तो तुझ में रमता है दिल काफ़िर फिर है

अपनी सोचो क़त्ल तुम्हें करना भी है
बन्दे का तो क्या है बन्दा हाज़िर है
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Vikram Gaur Vairagi
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अपने ख़ून से इतनी तो उम्मीदें हैं
अपने बच्चे भीड़ से आगे निकलेंगे
Shakeel Jamali
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मुझ से कहा जिब्रील-ए-जुनूँ ने ये भी वही-ए-इलाही है
मज़हब तो बस मज़हब-ए-दिल है बाक़ी सब गुमराही है
Majrooh Sultanpuri
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हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुम से ज़ियादा
चाक किए हैं हम ने अज़ीज़ो चार गरेबाँ तुम से ज़ियादा
Majrooh Sultanpuri
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कमी न की तिरे वहशी ने ख़ाक उड़ाने में
जुनूँ का नाम उछलता रहा ज़माने में
Firaq Gorakhpuri
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सर पर हवा-ए-ज़ुल्म चले सौ जतन के साथ
अपनी कुलाह कज है उसी बाँकपन के साथ
Majrooh Sultanpuri
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ख़ून से सींची है मैं ने जो ज़मीं मर मर के
वो ज़मीं एक सितम-गर ने कहा उस की है
Javed Akhtar
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मैं क़त्ल तो हो गया तुम्हारी गली में लेकिन
मिरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है
Javed Akhtar
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ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है बढ़ता है तो मिट जाता है
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा
Sahir Ludhianvi
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हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता
Akbar Allahabadi
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जो वक़्त-ए-ख़त्ना मैं चीख़ा तो नाई ने कहा हँस कर
मुसलमानी में ताक़त ख़ून ही बहने से आती है
Akbar Allahabadi
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वही मंज़िलें वही दश्त ओ दर तिरे दिल-ज़दों के हैं राहबर
वही आरज़ू वही जुस्तुजू वही राह-ए-पुर-ख़तर-ए-जुनूँ
Noon Meem Rashid
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अपने दिल के ख़ून से वो गुल खिला देता हूँ मैं
रेगज़ारों को गुलिस्ताँ की अदा देता हूँ मैं
Qaisar Sidddiqui
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एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है
एक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बद-नाम हुए
Ibn E Insha
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जाने क्या क्या ज़ुल्म परिंदे देख के आते हैं
शाम ढले पेड़ों पर मर्सिया-ख़्वानी होती है
Afzal Khan
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आरज़ू' जाम लो झिजक कैसी
पी लो और दहशत-ए-गुनाह गई
Arzoo Lakhnavi
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उस से बढ़ कर किया मिलेगा और इनआम-ए-जुनूँ
अब तो वो भी कह रहे हैं अपना दीवाना मुझे
Hafeez Banarasi
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ज़ालिम था वो और ज़ुल्म की आदत भी बहुत थी
मजबूर थे हम उस से मोहब्बत भी बहुत थी
Kaleem Aajiz
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आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं आग को
आप के भी ख़ून का रंग हो गया है साँवला
Dushyant Kumar
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ग़ैर से खेली है होली यार ने
डाले मुझ पर दीदा-ए-ख़ूँ-बार रंग
Imam Bakhsh Nasikh
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बाद-ए-बहार में सब आतिश जुनून की है
हर साल आवती है गर्मी में फ़स्ल-ए-होली
Wali Uzlat
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मेरी अक्ल-ओ-होश की सब हालतें
तुम ने साँचे में जुनूँ के ढाल दी

कर लिया था मैं ने अहद-ए-तर्क-ए-इश्क़
तुम ने फिर बाँहें गले में डाल दी
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Jaun Elia
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ये क़त्ल-ए-आम और बे-इज़्न क़त्ल-ए-आम क्या कहिए
ये बिस्मिल कैसे बिस्मिल हैं जिन्हें क़ातिल नहीं मिलता

वहाँ कितनों को तख़्त ओ ताज का अरमाँ है क्या कहिए
जहाँ साइल को अक्सर कासा-ए-साइल नहीं मिलता
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Asrar Ul Haq Majaz
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कुछ न मैं समझा जुनून ओ इश्क़ में
देर नासेह मुझ को समझाता रहा
Meer Taqi Meer
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टक गोर-ए-ग़रीबाँ की कर सैर कि दुनिया में
उन ज़ुल्म-रसीदों पर क्या क्या न हुआ होगा
Meer Taqi Meer
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तेग़-बाज़ी का शौक़ अपनी जगह
आप तो क़त्ल-ए-आम कर रहे हैं
Jaun Elia
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ऐ इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा हाँ इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा
आज एक सितमगर को हँस हँस के रुलाना है
Jigar Moradabadi
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रंग की अपनी बात है वर्ना
आख़िरश ख़ून भी तो पानी है
Jaun Elia
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करे जो क़ैद जुनूँ को वो जाल मत देना
हो जिस
में होश उसे ऐसा हाल मत देना

जो मुझ सेे मिलने का तुम को कभी ख़याल आए
तो इस ख़याल को तुम कल पे टाल मत देना
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Kashif Adeeb Makanpuri
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इक ज़रा बात पर अपने से पराए हुए लोग
हाए वो ख़ून पसीने से कमाए हुए लोग
Khan Janbaz
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वफ़ा का ज़ोर अगर बाज़ुओं में आ जाए
चराग़ उड़ता हुआ जुगनुओं में आ जाए

खिराजे इश्क़, कहीं जा के तब अदा होगा
हमारा ख़ून अगर आँसुओं में आ जाए
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Hashim Raza Jalalpuri
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अश्क़-ओ-ख़ून घुलते हैं तब दीदा-ए-तर बनती है
दास्तान इश्क़ में मरने से अमर बनती है
Jaani Lakhnavi
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हर एक सम्त यहाँ वहशतों का मस्कन है
जुनूँ के वास्ते सहरा ओ आशियाना क्या
Azhar Iqbal
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हम नहीं वो जो करें ख़ून का दावा तुझ पर
बल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जाएँगे
Sheikh Ibrahim Zauq
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यूँँ बे-तरतीब ज़ख़्मों ने बताया राज़ क़ातिल का
सलीक़े से जो मेरा क़त्ल गर होता तो क्या होता
Vikram Gaur Vairagi
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जाने क्या क्या ज़ुल्म परिंदे देख के आते हैं
शाम ढले पेड़ों पर मर्सिया-ख़्वानी होती है
Afzal Khan
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अब तो ख़ुद अपने ख़ून ने भी साफ़ कह दिया
मैं आप का रहूॅंगा मगर उम्र भर नहीं
Aalok Shrivastav
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यूँँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उन की रस्म नई है, न अपनी रीत नई

यूँँ ही हमेशा खिलाए हैं हम ने आग में फूल
न उन की हार नई है, न अपनी जीत नई
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Faiz Ahmad Faiz
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पिछ्ला बरस तो ख़ून रुला कर गुज़र गया
क्या गुल खिलाएगा ये नया साल दोस्तो
Farooq Engineer
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इस गए साल बड़े ज़ुल्म हुए हैं मुझ पर
ऐ नए साल मसीहा की तरह मिल मुझ से
Sarfraz Nawaz
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ऐ मिरी ज़ात के सुकूँ आ जा
थम न जाए कहीं जुनूँ आ जा

इस से पहले कि मैं अज़िय्यत में
अपनी आँखों को नोच लूँ आ जा
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Fareeha Naqvi
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पहले कहता है जुनूँ उस का गिरेबान पकड़
फिर मेरा दिल मुझे कहता है इधर कान पकड़

ऐसी वहशत भी न हो घर के दरो बाम कहें
कोई आवाज़ ही ले आ कोई मेहमान पकड़
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Azbar Safeer
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जिन हौसलों से मेरा जुनूँ मुतमइन न था
वो हौसले ज़माने के मेआ'र हो गए
Ali Jawwad Zaidi
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ख़ून से जोड़ा हुआ हर ईंट ढेला हो गया
दो तरफ़ चूल्हे जले औ' घर अकेला हो गया
Dhiraj Singh 'Tahammul'
ज़माना ज़ुल्म करता है ख़ुशी से
कभी तुझ को कभी मुझ को सताए
Meem Alif Shaz
बच्चों के हाथों में रख दी अय्यारी टॉफी के बदले
देखो मेरा ही ख़ूँ अब मुझ को छलता है धीरे-धीरे
Tarun Pandey
मच्छरदानी ऑलआउट पे पैसे क्यूँ बर्बाद करूँँ
ख़ून तो उस ने चूस लिया है मच्छर से अब डरना क्यूँँ
SHIV SAFAR
ख़ुदा रोया बहुत उस दिन ख़ुदा के नेक बंदों ने
ख़ुदा के नाम पर मासूम का जब ख़ून कर डाला
Umesh Maurya
सब ने माना मरने वाला दहशत-गर्द और क़ातिल था
माँ ने फिर भी क़ब्र पे उस की राज-दुलारा लिक्खा था
Ahmad Salman
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रोज़ रोने के बहाने ढूँढ़ते है
बेबसी से अपने रिश्ते ख़ून के है

देख लेंगे फिर ग़लत क्या है सही क्या
आ अभी इक दूसरे को चूमते है
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Aman Mishra 'Anant'
ये उस की मेहरबानी है वो घर में ही सँवरती है
निकल आए जो महफ़िल में तो क़त्ल-ए-आम हो जाए
Ashraf Jahangeer
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डाली है ख़ुद पे ज़ुल्म की यूँँ इक मिसाल और
उस के बग़ैर काट दिया एक साल और
Subhan Asad
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तेरे बग़ैर ख़ुदा की क़सम सुकून नहीं
सफ़ेद बाल हुए हैं हमारा ख़ून नहीं

न हम ही लौंडे लपाड़ी न कच्ची उम्र का वो
ये सोचा समझा हुआ इश्क़ है जुनून नहीं
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Shamim Abbas
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मुहब्बत में बहाएा ख़ून औ पानी कहा हम ने
तेरी हर ख़ामियों को हँस के नादानी कहा हम ने
Alankrat Srivastava
दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़
तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो
Kaleem Aajiz
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हमीं को क़ातिल कहेगी दुनिया हमारा ही क़त्ल-ए-आम होगा
हमीं कुएँ खोदते फिरेंगे हमीं पे पानी हराम होगा

अगर यही ज़ेहनियत रही तो मुझे ये डर है कि इस सदी में
न कोई अब्दुल हमीद होगा न कोई अब्दुल कलाम होगा
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Meraj Faizabadi
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तबक़ों में रंग-ओ-नस्ल के उलझा के रख दिया
ये ज़ुल्म आदमी ने किया आदमी के साथ
Bakhtiyar Ziya
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क़त्ल से पहले वो हर शख़्स के दिल की हसरत
पूछ लेता था मगर पूरी नहीं करता था
Vishnu virat
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दिल-ख़राशी-ओ-जिगर-चाकी-ओ-ख़ूँ-अफ़्शानी
हूँ तो नाकाम प रहते हैं मुझे काम बहुत
Meer Taqi Meer
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ख़ून से भर गया है क़फ़स
छोड़ दो या मुझे मार दो
Amaan Pathan
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अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल
मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यूँँ तेरा घर मिले
Mirza Ghalib
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काठ की हाँडी अब न चढ़ेगी ज़ुल्म के चूल्हे पर यारो
वक़्त का पहिया घूमेगा मुंसिफ़ भी जेल में जाएगा
Amaan Pathan
अपने अंदर हँसता हूँ मैं और बहुत शरमाता हूँ
ख़ून भी थूका सच-मुच थूका और ये सब चालाकी थी
Jaun Elia
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बहार-ए-गुलिस्ताँ हम को न पहचाने तअज्जुब है
गुलों के रुख़ पे छिड़का है बहुत ख़ून-ए-जिगर हम ने
Salik Lakhnavi
मुझ में सात समुंदर शोर मचाते हैं
एक ख़याल ने दहशत फैला रक्खी है
Saqi Faruqi
कुछ न कहने से भी छिन जाता है एजाज़-ए-सुख़न
ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है
Muzaffar Warsi
बचा लिया मुझे ग़र्क़ाब होने से उस ने
जुनून ए इश्क़ है लाया नदी के पार मुझे
Amaan Pathan
की मेरे क़त्ल के बा'द उस ने जफ़ा से तौबा
हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशीमाँ होना
Mirza Ghalib
इक बार तुझे अक़्ल ने चाहा था भुलाना
सौ बार जुनूँ ने तिरी तस्वीर दिखा दी
Mahir ul Qadri
ख़ामुशी कब चीख़ बन जाए किसे मालूम है
ज़ुल्म कर लो जब तलक ये बे-ज़बानी और है
Munawwar Rana
ये काएनात मेरे सामने है मिस्ल-ए-बिसात
कहीं जुनूँ में उलट दूँ न इस जहान को मैं
Akhtar Usman
तू कहानी के बदलते हुए मंज़र को समझ
ख़ून रोते हुए किरदार की जानिब मत देख
Azhar Abbas
मेरी जाँ कोई ज़ुल्म न कर ख़ुदा के लिए
यहाँ कोई ग़ुरूर नहीं रहता सदा के लिए
Praveen Bhardwaj
क़त्ल कर के सब मेरे ख़ुशियों का तुम ने
हाथ फिर धो दिए आँसू गिरते इक इक से
Zain Aalamgir
इश्क़ के वो सारे दस्तावेज़ लाओ मेज़ पर
ख़ून से कर दस्तख़त, तुम सेे निभाऊँ प्यार फिर
Zain Aalamgir
उस घूँघट में इक चेहरा है उस चेहरे पे इक तिल भी है
उस तिल पे हमारी जान फिदा कुरबान उसी पर दिल भी है

वो सत्रह आशिक़ क़त्ल हुए इन तेरी फ़रेबी नज़रों से
इक हद तक तो मासूम तू है पर इक हद तक क़ातिल भी है
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Shubham Seth
यूँँ ज़ोर से ना दे दुहाई, ज़ुल्म सहता शख़्स तू
रूठे ख़ुदा ना और भी, तेरा ख़ुदा है सो रहा
Zain Aalamgir
सब याद रहता है मुझे
ये ज़ुल्म भी तारी यहाँ
Zain Aalamgir
कोई उठता नहीं मज़लूम का हामी बनकर
कब तलक ज़ुल्म पा ख़ामोश रहेगी दुनिया
''Akbar Rizvi"
रोटियां फेंकते हो रोटियों की क़द्र करो
एक रोटी के लिए क़त्ल भी हो जाता है
Ramnath Shodharthi
एक शख़्स मुझ
में खूब हँसता था कभी
एक हादसे ने उस का ख़ून कर दिया
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Amaan mirza
मैं ने लिखा है बख़्त पसीने से ख़ून से
मुझ
में हुनर नहीं था गुज़ारिश का अर्ज़ का
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Prashant Sitapuri
देर तक कोई भी एहल-ए-ज़ुल्म यूँँ टिकता नहीं
चार सू फैली हुई है कर्बला की रौशनी
''Akbar Rizvi"
देखना है अगर जुनून-ए-इश्क़
लहरों पे नाचते सफ़ीने देख
Chandan Sharma
मोहब्बत में फिर ज़िन्दगी कौन जीता है
जिसे देखिए, अपना वो ख़ून पीता है
Umrez Ali Haider
जो घर, गली, शहर, देश खोया ज़रूर लेंगे
नए रखो नाम हम पुराना ज़रूर लेंगे

सुनो कि तुम जितना सह सको उतना ज़ुल्म करना
ये याद रखना, के हम भी बदला ज़रूर लेंगे
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Abuzar kamaal
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उतर न पाएगा ता उम्र इन के सर से जुनूँ
ये नौजवान अगर देख लेंगे आँखें तेरी
Shajar Abbas
अभी तक बह रहा है ख़ून मेरा
निशां उस के मिटाना चाहता था
Tiwari Jitendra
दिवाने पन की अपने भी कोई सीमा नहीं यारो
जुनूँ में ख़ुद ही ख़ुद से ख़ुद का ही सर फोड़ लेते हैं
Ajeetendra Aazi Tamaam
उस की ख़ामोशी ने रंग ले लिया है
या'नी अब मैं ख़ून थूकने लगा हूँ
Intzar Akhtar
इश्क़ की अब, इंतिहा क्या? इब्तिदा क्या?
शय ये ला-हासिल व ला-फ़ानी जुनूँ है
A R Sahil "Aleeg"
क़ातिल-ए-अमद को क्यूँँ दोष दे रहे हो तुम
मेरे यार उस की तो शौक-ए-क़त्ल आदत है
Kartik tripathi
मैं चाहता हूँ मुझे फिर से याद आओ तुम
मैं चाहता हूँ कि मैं ख़ून थूकूँ फिर मुँह से
Shajar Abbas
मैं चुप हूँ यार सो चुप रहने दे ख़ुदा के लिए
ज़बाँ खुलेगी तो लफ़्ज़ों से ख़ून टपकेगा
Shajar Abbas
आँखें मूँदे रहे लब को सीते गए
पेट ख़ाली रहे ग़म को पीते गए

शर्म करते हैं अब ख़ुद की हस्ती पे हम
ज़ुल्म सहते रहे और जीते गए
Read Full
Amaan Javed
अब मेरे बा'द ऐसा लड़का तुम को फिर न मिलेगा
जो दौर-ए-कंप्यूटर में भी ख़ून से ख़त लिखता हो
Intzar Akhtar
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वो पौदा इश्क़ का अब गिन रहा है आख़री साँसें
मुज़फ़्फ़रपुर में पनगाया था अश्क-ए-खूँ से मैं जिस को
A R Sahil "Aleeg"
हर एक बात पे करते हो क़त्ल-ए-आम की बातें
तुम्हीं बताओ अब अंज़ाम-ए-गर्मी-ए-जुनूँ क्या है
Ajeetendra Aazi Tamaam
क़त्ल का शौक़ तो नहीं लेकिन
एक बच्चे को मारना है मुझे
Upendra Bajpai