Greed Shayari - Lalach, self-interest, and insaan ki fitrat in poetic words

Greed Shayari captures the harsh reality of human desire, where lalach often overpowers emotions, relationships, and values. These poetic lines reflect how selfishness and material obsession shape behavior and break trust. Whether it’s about money, power, or ego, greed shayari gives a deep and honest look into insaan ki fitrat.

एक ही तो हवस रही है हमें
अपनी हालत तबाह की जाए
Jaun Elia
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कौन से शौक़ किस हवस का नहीं
दिल मेरी जान तेरे बस का नहीं
Jaun Elia
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एक दिन देखने को आ जाते
ये हवस उम्र भर नहीं होती
Ibn E Insha
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तीर खाने की हवस है तो जिगर पैदा कर
सरफ़रोशी की तमन्ना है तो सर पैदा कर
Ameer Minai
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बाक़ी न दिल में कोई भी या रब हवस रहे
चौदह बरस के सिन में वो लाखों बरस रहे
Ameer Minai
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न हुआ नसीब क़रार-ए-जाँ हवस-ए-क़रार भी अब नहीं
तिरा इंतिज़ार बहुत किया तिरा इंतिज़ार भी अब नहीं

तुझे क्या ख़बर मह-ओ-साल ने हमें कैसे ज़ख़्म दिए यहाँ
तिरी यादगार थी इक ख़लिश तिरी यादगार भी अब नहीं
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Jaun Elia
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रंग-ओ-रस की हवस और बस
मसअला दस्तरस और बस

यूँँ बुनी हैं रगें जिस्म की
एक नस टस से मस और बस
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Ammar Iqbal
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यूँँ न कर वस्ल के लम्हों को हवस से ता'बीर
चंद पत्ते ही तो तोड़े हैं शजर से मैं ने
Khurram Afaq
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इतना मसरूफ़ हूँ जीने की हवस में 'शाहिद'
साँस लेने की भी फ़ुर्सत नहीं होती मुझ को
Shahid Zaki
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तलाश हम को किसी भी बदन की है ही नहीं
हवस की भूख हमारे ज़ेहन की है ही नहीं

किसी से बिछड़े तो कोई फ़ना नहीं होता
क़ज़ा की बात तो अब के ज़मन की है ही नहीं
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Shadab Asghar
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ये इश्क़-विश्क़ का क़िस्सा तमाम हो जाए
सफ़ेद दाढ़ी हवस की ग़ुलाम हो जाए

जवान लड़कियों बूढ़ों से तुम रहो हुश्यार
न जाने कौन कहाँ आसाराम हो जाए
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Paplu Lucknawi
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ये गहरा राज़ है इस का बदन को खा ही जाती है
मोहब्बत पाक होकर भी हवस तक आ ही जाती है
ALI ZUHRI
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कोई हसीन बदन जिन की दस्तरस में नहीं
यही कहेंगे कि कुछ फ़ाएदा हवस में नहीं
Umair Najmi
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मैं वो सहरा जिसे पानी की हवस ले डूबी
तू वो बादल जो कभी टूट के बरसा ही नहीं
Sultan Akhtar
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इश्क़ और हवस, दो अलग बातें हैं
पनाह और क़फ़स, दो अलग बातें हैं

है सारा ग़म यही कि दुनिया की बातों में
मैं और तू हमनफ़स, दो अलग बातें हैं
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Sushrut Tiwari
नाम पा इश्क़ के जिस्मों की हवस मिटती है
इश्क़ अब बाक़ी नहीं पहले ज़माने वाला
Shajar Abbas
इस तरह मैं ने हवस पर इश्क़ को तरजीह दी
उस का माथा चूमा भी तो हाथ रख के चूमा है
Intzar Akhtar
जवानी से यही तो बस गिला है
हवस को छोड़ इस सेे क्या मिला है

ग़ज़ल यूँँ ही नहीं कहने लगे हम
किसी से इश्क़ करने का सिला है
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Vinamrachayan
मुहब्बत या हवस में था अभी तक
मैं किस के दस्तरस में था अभी तक
Chandan Sharma
इश्क़ कोई हवस का खेल नहीं
या'नी बस दस्तरस का खेल नहीं

ज़िंदगी तो बहुत ही अच्छी है
हाँ मगर अपने बस का खेल नहीं
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Shaad Imran
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इज़हार पर उन के कभी इक़रार मत करना यहाँ
जिन के लबों पर इश्क़ हो पर दिल हवस में चूर हो
Ravi 'VEER'
हवस की आग में जलकर जो लड़की डूब जाती है
ख़ुदा देता सितम तो जल्दी शादी ही नहीं होती
Nirbhay Nishchhal
उम्मीद ए विसाल ए जांँ मिसमार हुई नहीं
ये दामन-ए-शब अभी दुश्वार हुई नहीं

उस ने भी शब-ए-गुज़श्ता क़ैद रखी हवस
हम सेे भी बदन की सरहद पार हुई नहीं
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Sabir Hussain
आज अपने पराए हुए हैं
लोभ हलचल मचाए हुए हैं
Navneet krishna
हाँ जिस्म की हवस का आग़ाज़ करते हैं वो
अपनी ही बे-हयाई पे नाज़ करते हैं वो
Danish Balliavi
कभी जो मैं तुझे चूमू तो मुझ को रोक देना तू
नहीं तो फिर इसे भी तू हवस का नाम दे देगी
"Nadeem khan' Kaavish"
इस तरह से न आज़मा मुझ को
मेहरबाँ है तो दे दुआ मुझ को

एक मुद्दत के बा'द मिल पाया
एक अच्छा सा रास्ता मुझ को

तेरी नफ़रत के साँप ने इक दिन
आँख खुलते ही डस लिया मुझ को

सब की नज़रों में थी हवस क़ायम
कौन अंदर से देखता मुझ को

आज इक दम से बन गया शैतान
कल जो लगता था देवता मुझ को

साथ उस के सफ़र मैं करती हूँ
जो भी मिलता है बा-वफ़ा मुझ को

एक आज़ाद अंदलीब हूँ मैं
ज़िंदा देखे तो कर रिहा मुझ को
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shampa andaliib
आबरू ना लुटे किसी की अब
है हवस की दवा पता करना
Abhishek Dhakad
वज़ू कर के छुआ तुझ को, यूँंँ पाकीज़ा मुहब्बत थी
तुम्हारे बा'द तो मैं ने हवस को ही मिटाया था
"Nadeem khan' Kaavish"
हवस का नाम भी हम ने, सुना जब था नहीं साहिल
क़सम रब की, किया था इश्क़ तब हम ने गज़ाला से
A R Sahil "Aleeg"
तेरी कमाँ के बस से भी आगे निकल गया
मैं इश्क़ में हवस से भी आगे निकल गया

अपनी तलाश में जो निकाला गया था पल
वो पल तो सौ बरस से भी आगे निकल गया

लुक्का छिपी के वक़्त तुम्हारे ख़याल में
‌गिनने लगा तो दस से भी आगे निकल गया

है जिन की दस्तरस में ज़मीं और आस्माँ
मैं उन की दस्तरस से भी आगे निकल गया
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habib kinkhabwala
कभी देखा नहीं उन को जी भर कर और
वो कहते हैं पुजारी हूँ हवस का मैं
A R Sahil "Aleeg"
इश्क़ क्या है पूछना है मुझ को इक दिन उस ख़ुदा से
ख़्वाब कोई या हक़ीक़त पाक जज़्बा या हवस है
A R Sahil "Aleeg"
इश्क़ तो दूरियों में भी मिटता नहीं
रूठती है हवस दूर जाने के बा'द
A R Sahil "Aleeg"
बचपने की मुहब्बत-मुहब्बत सी थी
बा'द इस के हवस-कारी हो जाती है
Sachin Sharma
किस ने काफ़िर बना दिया मुझ को
नफ़्स धन इश्क़ हिर्स हुस्न अना
A R Sahil "Aleeg"
समझते हैं हवस को इश्क़ जो उन के लिए है जश्न और बरसी
न बरसी है न कोई जन्मदिन ही इश्क़ में, ये जानते है हम
A R Sahil "Aleeg"
किया बदनाम चौदह फ़रवरी ने इश्क़ को साहिल
ये दिन तो है हवस अय्याशी के सेलीब्रेशन का
A R Sahil "Aleeg"
हवस में लोग इतना खो चुके हैं दोस्त
उन्हें लड़की नहीं बस जिस्म दिखता है
ABhishek Parashar
मुसलमाँ को मिटाने की हवस काफ़िर के दिल में है
मगर ये भूल बैठे हैं क़यामत तक रहेंगे हम
Saahir Ubaid Aleemi
हवस में लोग अक्सर अंधे होते हैं
मोहब्बत में कोई अंधा नहीं होता

मोहब्बत तो ख़ुदा की वो इबादत है
जिसे कुछ हुस्न से लेना नहीं होता
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ABhishek Parashar
मिटानी है हवस अपनी सभी को बस
मोहब्बत करने वाले अब नहीं मिलते
ABhishek Parashar
हवस ने ज़िंदा रक्खा है रक़ीबों को
जो होता प्यार कब के मर गए होते
Prashant Rao chourase
बहुत कुछ चीज़ पाने की हवस में
जो कुछ भी था गवाएँ जा रहे हैं
Shadab Shabbiri
सबकी आँखों में हवस है
उस की आँखों में हया है
Rahul
हुस्न है बनाया साथ में हवस बनाई है
इस तरह यहाँ ख़ुदा ने दस्तरस बनाई है

एक ओर आँखों में ये अश्क भी बनाया है
और एक ओर दुनिया रंग-ओ-रस बनाई है
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Manas Ank
इन
में फ़क़त हवस है मुहब्बत न देंगे ये
इज़्ज़त तो लूट लेंगे ये इज़्ज़त न देंगे ये
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Daqiiq Jabaalii
केवल हवस और बस हवस हो तू न हो
तू वासना में इतना बेक़ाबू न हो

मुझ को तुझे ऐसी जगह है चूमना
जिस सेे तेरा फिर ख़ुद पे भी क़ाबू न हो
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Jagveer Singh
अब कौन जानता है सुख़न-साज़ की सनक
कब ज़र्ब की हवस में तमाशा बिखेर दे
Nikhil Tiwari 'Nazeel'
इंसान के हवस की कोई इंतिहा नहीं
जन्नत भी चाहता है वो हूरों के वास्ते
Mohd Ashahad
तेरे माथे को चूमूँ मैं मुहब्बत भर के देखूँ
हवस से ख़ाली होकर रूह के ग़म हर के देखूँ
Manish
दौर था कोई ज़मीर-ओ-वर्द का इंसानियत का
वर्द अब सब लोभ के हैं मश्ग़ला क्या झूठ क्या सच

मसअला क़ैद-ए-हवस का और मसाइल जिस्म के हों
फिर भला क्या हासिल-ए-इश्क़-ओ-वफ़ा क्या झूठ क्या सच
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Karal 'Maahi'
अना हिर्स-ओ-हवस नफ़रत कभी सजने नहीं देंगे
सजाया है अगर जीवन मोहब्बत ने सजाया है
Manish Pithaya
ऊपर से दिखती है जितनी प्यारी दुनिया
अंदर उतनी हिर्स-ओ-हवस की मारी दुनिया

दुनिया से ऊपर उठकर दुनिया देखूँ तो
हैरत होती है कितनी बेचारी दुनिया
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Jagveer Singh
गर हराना है तो मक़्तल में हराया जाए
सब के आगे तो मुझे सर पे बिठाया जाए

फेंक देना ये बदन को तू हवस के आगे
पर बदन पहले मिरा लाश बनाया जाए
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Harsh Kumar Bhatnagar
जब हम को हवस का इल्म न था
तब इश्क़ हुआ था तुम से हमें
A R Sahil "Aleeg"
बुझ गया मंज़र-ए-हसीं यकदम
यूँँ भरी थी हवस निगाहों में
Sumit Panchal
हर बार मुझे हर साँस मिरी इक बात यही समझाती है
कुछ काम करो कुछ नाम करो ये उम्र निकलती जाती है

मैं कहता हूँ कि समझो तो कोई बात नहीं ऐसी लेकिन
इस दुनिया में शोहरत की हवस मुझे अंदर से खा जाती है
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nakul kumar
मुनाफ़क़त वफ़ा लज़्ज़त सितम हवस औरत
हमें तो वैसे भी अच्छी लगी नहीं दुनिया
Shadab bastavi
हवस में जीत के मैं सौ दफ़ा हारा हुआ हूँ
नगर की धूप वर्षा धूल का मारा हुआ हूँ

मुझे इस जान का मालिक न समझो लाश हूँ मैं
पसंदीदा हमारे फूल का मारा हुआ हूँ
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Vishakt ki Kalam se
अना हिर्स-ओ-हवस नफ़रत दुखी रखते हैं मुझ को गर
नहीं समझा हूँ मैं फिर अपने ही ग़म-ख़्वार की बातें
Manish Pithaya
हवस-परस्त तो नहीं तअल्लुक़ात तुम से ये
कि उम्र इक गुज़ार दूँ ये इक ज़रा से बोसे पे
Vishesh asthana
वक़्त से पहले ही न सड़ जाए
सब्र के फल में रस ज़ियादा है

आज के दौर के दिवानों में
इश्क़ कम है हवस ज़ियादा है
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Viru Panwar
झूठ नफ़रत फ़रेब गाली हवस
है भी क्या और आदमी के पास
Viru Panwar
जो गुज़ारी न जा सकी हम से
हम ने वो ज़िन्दगी गुज़ारी है
Jaun Elia
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बना कर हम ने दुनिया को जहन्नुम
ख़ुदा का काम आसाँ कर दिया है
Rajesh Reddy
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ये दुनिया है यहाँ कोई जगह ख़ाली नहीं रहती
किसी के आने-जाने से कभी कुछ कम नहीं होता
Bashir Badr
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दुनिया की फ़िक्र छोड़, न यूँँ अब उदास बैठ
ये वक़्त रब की देन है, अम्मी के पास बैठ
Salman Zafar
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सँभलता हूँ तो ये लगता है जैसे
तुम्हारे साथ धोखा कर रहा हूँ
Shariq Kaifi
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कर ही क्या सकती है दुनिया और तुझ को देख कर
देखती जाएगी और हैरान होती जाएगी
Ameer Imam
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तुम भी साबित हुए कमज़ोर मुनव्वर राना
ज़िन्दगी माँगी भी तुम ने तो दवा से माँगी
Munawwar Rana
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दुनिया भी जैसे ताश के पत्तों का खेल है
जोकर के साथ रहती है रानी ही क्यूँ न हो
Munawwar Rana
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ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिस में
हर घड़ी दर्द के पैवंद लगे जाते हैं
Faiz Ahmad Faiz
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तू ने देखी है वो पेशानी वो रुख़्सार वो होंठ
ज़िंदगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हम ने

तुझ पे उठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें
तुझ को मालूम है क्यूँ उम्र गँवा दी हम ने
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Faiz Ahmad Faiz
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा माँगेंगे
इक बाग़ नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया माँगेंगे
Faiz Ahmad Faiz
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इतना तो ज़िन्दगी में किसी के ख़लल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूँँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े
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Kaifi Azmi
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इस ज़िन्दगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब
इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम
Ahmad Faraz
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सिलवटें हैं मेरे चेहरे पे तो हैरत क्यूँँ है
ज़िन्दगी ने मुझे कुछ तुम सेे ज़ियादा पहना
Ahmad Faraz
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तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत है ज़िंदगी
ख़ुद को गँवा के कौन तेरी जुस्तुजू करे
Ahmad Faraz
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जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया
अब तुम तो ज़िन्दगी की दुआएँ मुझे न दो
Ahmad Faraz
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औरों का बताया हुआ रस्ता नहीं चुनते
जो इश्क़ चुना करते हैं, दुनिया नहीं चुनते
Bhaskar Shukla
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हम अम्न चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़
गर जंग लाज़मी है तो फिर जंग ही सही
Sahir Ludhianvi
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जान भी अब दिल पे वारी जाएगी
ये बला सर से उतारी जाएगी

एक पल तुझ बिन गुज़रना है कठिन
ज़िन्दगी कैसे गुज़ारी जाएगी
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Anjum Rehbar
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काम की बात मैं ने की ही नहीं
ये मेरा तौर-ए-ज़िंदगी ही नहीं
Jaun Elia
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ज़िंदगी एक फ़न है लम्हों को
अपने अंदाज़ से गँवाने का
Jaun Elia
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'जौन' दुनिया की चाकरी कर के
तू ने दिल की वो नौकरी क्या की
Jaun Elia
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लगा जब कि दुनिया की पहली ज़रूरत मोहब्बत है तब उस ने माना
यक़ीं हो गया जब मोहब्बत ज़रूरत है तब उस ने माना

वगरना तो ये लोग उसे ख़ुद-कुशी के लिए कह चुके थे
उसे आइने ने बताया कि वो ख़ूब-सूरत है तब उस ने माना
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Vikram Gaur Vairagi
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दुनिया कुछ देरी से सजदा करती है
जोगी पहले दिन से जोगी होता हैं
Vishal Bagh
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अपनी दुनिया भी चल पड़े शायद
इक रुका फ़ैसला किया जाए
Madan Mohan Danish
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ये ज़िंदगी जो पुकारे तो शक सा होता है
कहीं अभी तो मुझे ख़ुद-कुशी नहीं करनी
Swapnil Tiwari
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ज़िन्दगी, यूँँ भी गुज़ारी जा रही है
जैसे, कोई जंग हारी जा रही है

जिस जगह पहले से ज़ख़्मों के निशां थे
फिर वहीं पे चोट मारी जा रही है
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Azm Shakri
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ये मेरी ज़िद ही ग़लत थी कि तुझ सेा बन जाऊँ
मैं अब न अपनी तरह हूँ न तेरे जैसा हूँ

हमारे बीच ज़माने की बद-गुमानी है
मैं ज़िंदगी से ज़रा कम ही बात करता हूँ
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Subhan Asad
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यूँँ ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ तिरे बग़ैर
जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
Jigar Moradabadi
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होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
Nida Fazli
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उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
Bashir Badr
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यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
Nida Fazli
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राम होने में या रावण में है अंतर इतना
एक दुनिया को ख़ुशी दूसरा ग़म देता है

हम ने रावण को बरस दर बरस जलाया है
कौन है वो जो इसे फिर से जनम देता है
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Kumar Vishwas
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सच्चाई को अपनाना आसान नहीं
दुनिया भर से झगड़ा करना पड़ता है
Nawaz Deobandi
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वक़्त अच्छा भी आएगा 'नासिर'
ग़म न कर ज़िंदगी पड़ी है अभी
Nasir Kazmi
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मैं एक ख़ाना-ब-दोश हूँ जिस का घर है दुनिया
सो अपने काँधे पे ले के ये घर भटक रहा हूँ
Pallav Mishra
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सर पर हवा-ए-ज़ुल्म चले सौ जतन के साथ
अपनी कुलाह कज है उसी बाँकपन के साथ
Majrooh Sultanpuri
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रोने को तो ज़िंदगी पड़ी है
कुछ तेरे सितम पे मुस्कुरा लें
Firaq Gorakhpuri
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ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा
वगर्ना ज़िंदगी भर को रुला दिया होता
Gulzar
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दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ
बाज़ार से गुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ
Akbar Allahabadi
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गर ज़िंदगी में मिल गए फिर इत्तिफ़ाक़ से
पूछेंगे अपना हाल तिरी बेबसी से हम
Sahir Ludhianvi
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दुनिया ने तजरबात-ओ-हवादिस की शक्ल में
जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं
Sahir Ludhianvi
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ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है बढ़ता है तो मिट जाता है
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा
Sahir Ludhianvi
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