Shaam Shayari - Evening vibes, sukoon aur yaadon se bhari poetic lines

Shaam shayari captures the calm, reflective beauty of the evening—when the sun sets and emotions rise. It often blends sukoon, yaadein, and a touch of tanhai, making it perfect for expressing love, longing, or silent thoughts at dusk.

shaam shayari
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
Faiz Ahmad Faiz
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shaam ka waqt shayari
वो चाँद कह के गया था कि आज निकलेगा
तो इंतिज़ार में बैठा हुआ हूँ शाम से मैं
Farhat Ehsaas
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evening shayari
तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे
मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे
Qaisar-ul-Jafri
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sandhya shayari
तू नया है तो दिखा सुब्ह नई शाम नई
वर्ना इन आँखों ने देखे हैं नए साल कई
Faiz Ludhianvi
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shaam-e-firaq shayari
वो करेंगे वस्ल का वा'दा वफ़ा
रंग गहरे हैं हमारी शाम के
Muztar Khairabadi
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मगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैं
तेरे फ़िराक़ में यूँँ सुबह-ओ-शाम करते हैं
Faiz Ahmad Faiz
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सुब्ह तक हिज्र में क्या जानिए क्या होता है
शाम ही से मिरे क़ाबू में नहीं दिल मेरा
Jigar Moradabadi
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शाम भी हो गई धुँदला गई आँखें भी मिरी
भूलने वाले मैं कब तक तिरा रस्ता देखूँ
Parveen Shakir
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वो न आएगा हमें मालूम था इस शाम भी
इंतिज़ार उस का मगर कुछ सोच कर करते रहे
Parveen Shakir
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उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
Bashir Badr
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ग़म-ए-हयात ने आवारा कर दिया वर्ना
थी आरज़ू कि तिरे दर पे सुब्ह ओ शाम करें
Majrooh Sultanpuri
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शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास
दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं
Firaq Gorakhpuri
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शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है
Gulzar
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कोई इशारा दिलासा न कोई वा'दा मगर
जब आई शाम तिरा इंतिज़ार करने लगे
Waseem Barelvi
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यूँ तो हर शाम उमीदों में गुज़र जाती है
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया
Shakeel Badayuni
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जिस को बड़ा ग़ुरूर था अपने वजूद पर
वो आफ़ताब शाम की चौखट पे मर गया
Shahid Sagri
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मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब का जगा हुआ
ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ
Bashir Badr
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ख़्वाहिश सुखाने रक्खी थी कोठे पे दोपहर
अब शाम हो चली मियाँ देखो किधर गई
Adil Mansuri
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जाने क्या क्या ज़ुल्म परिंदे देख के आते हैं
शाम ढले पेड़ों पर मर्सिया-ख़्वानी होती है
Afzal Khan
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फिर आज 'अदम' शाम से ग़मगीं है तबीअत
फिर आज सर-ए-शाम मैं कुछ सोच रहा हूँ
Abdul Hamid Adam
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आ गई याद शाम ढलते ही
बुझ गया दिल चराग़ जलते ही
Muneer Niyazi
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शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई
दिल था कि फिर बहल गया जाँ थी कि फिर सँभल गई
Faiz Ahmad Faiz
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शाम-ए-ग़म करवट बदलता ही नहीं
वक़्त भी ख़ुद्दार है तेरे बग़ैर
Shakeel Badayuni
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नई सुब्ह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है
ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे
Shakeel Badayuni
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था इंतिज़ार मनाएँगे मिल के दीवाली
न तुम ही लौट के आए न वक़्त-ए-शाम हुआ
Aanis Moin
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'मीर' से बैअत की है तो 'इंशा' मीर की बैअत भी है ज़रूर
शाम को रो रो सुब्ह करो अब सुब्ह को रो रो शाम करो
Ibn E Insha
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अजब अंदाज़ के शाम-ओ-सहर हैं
कोई तस्वीर हो जैसे अधूरी
Asad Bhopali
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हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलते
अब ठहर जाएँ कहीं शाम के ढलते ढलते
Iqbal Azeem
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आज की रात न जाने कितनी लंबी होगी
आज का सूरज शाम से पहले डूब गया है
Aanis Moin
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मुँह पर नक़ाब-ए-ज़र्द हर इक ज़ुल्फ़ पर गुलाल
होली की शाम ही तो सहर है बसंत की
Lala Madhav Ram Jauhar
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हम भी गाँव में शाम को बैठा करते थे
हम को भी हालात ने बाहर भेजा है
Zahid Bashir
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परिंदे होते तो डाली पर लौट भी जाते
हमें न याद दिलाओ कि शाम हो गई है
Rajesh Reddy
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दिल आज शाम से ही उसे ढूँडने लगा
कल जिस के बा'द कमरे में तन्हाई आई थी
Ammar Iqbal
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हम सेे भी इक लड़की मिलने आती थी
हम भी शाम को कैफ़े जाया करते थे
Tanoj Dadhich
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सुब्ह तक वज्ह-ए-जाँ-कनी थी जो बात
मैं उसे शाम ही को भूल गया
Jaun Elia
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बुलाया शाम को लेकिन वहाँ मैं सुब्ह जा बैठा
सुना था देर से आना उसे अच्छा नहीं लगता
Krishnakant Kabk
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कभी सहर तो कभी शाम ले गया मुझ से
तुम्हारा दर्द कई काम ले गया मुझ से
Farhat Abbas Shah
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नींद आएगी भला कैसे उसे शाम के बा'द
रोटियाँ भी न मुयस्सर हों जिसे काम के बा'द
Azhar Iqbal
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चढ़ते हुवे ए शम्स दिखा ताव भी मगर
ये जान ले कि शाम ढले डूब जाएगा
Afzal Ali Afzal
तू है सूरज तुझे मालूम कहाँ रात का दुख
तू किसी रोज़ मेरे घर में उतर शाम के बा'द
Farhat Abbas Shah
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तुम परिंदों से ज़ियादा तो नहीं हो आज़ाद
शाम होने को है अब घर की तरफ़ लौट चलो
Irfan Siddiqi
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अब तो चुप-चाप शाम आती है
पहले चिड़ियों के शोर होते थे
Mohammad Alvi
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ये परिंदे भी खेतों के मज़दूर हैं
लौट के अपने घर शाम तक जाएँगे
Bashir Badr
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जाने क्या क्या ज़ुल्म परिंदे देख के आते हैं
शाम ढले पेड़ों पर मर्सिया-ख़्वानी होती है
Afzal Khan
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देख कर इंसान की बेचारगी
शाम से पहले परिंदे सो गए
Iffat Zarrin
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शाम से छत पर घुम रहा हूँ
एक दिए के आगे-पीछे
Shariq Kaifi
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आख़िरी बार मैं कब उस से मिला याद नहीं
बस यही याद है इक शाम बहुत भारी थी
Hammad Niyazi
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सुब्ह होती है शाम होती है
उम्र यूँँही तमाम होती है
Munshi Amirullah Tasleem
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शाम थी हिज्र की हाल मत पूछना
आँख थकने लगे तो जिगर रो पड़े
Piyush Mishra 'Aab'
ये शाम ख़ुशबू पहन के तेरी ढली है मुझ
में जो रेज़ा रेज़ा
मैं क़तरा क़तरा पिघल रही हूँ ख़मोश शब के समुंदरों में
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Kiran K
बद-हवा सेी है बे-ख़याली है
क्या ये हालत भी कोई हालत है

ज़िंदगी से है जंग शाम-ओ-सहर
मौत से शिकवा है शिकायत है
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Chandan Sharma
लो चाँद हो गया नमू माह-ए-ख़राम का
ऐ मोमिनों लिबास-ए-सियाह ज़ेब-ए-तन करो

फ़र्श-ए-अज़ा बिछा के अज़ाख़ाने में शजर
अब सुब्ह-ओ-शाम ज़िक्र-ए-ग़रीब-उल-वतन करो
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Shajar Abbas
अब शहर की थकावट बेचैन कर रही है
अब शाम हो गई है चल माँ से बात कर लें
Akash Rajpoot
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याद में तेरी खो कर हम ग़ज़ल बनाते हैं
आफ़ताब ढ़लता है जब ये शाम होती है
Chandan Sharma
एक कश्ती क्यूँ अभी लौटी नहीं
क्यूँ किनारे शाम से ख़ामोश हैं
Umesh Maurya
सुब्ह-ओ-शाम अब हम को बस उदास रहना है
ग़मज़दों की मंज़िल का रास्ता उदासी है
Rohit tewatia 'Ishq'
शाम ढलने से फ़क़त शाम नहीं ढलती है
उम्र ढल जाती है जल्दी पलट आना मेरे दोस्त
Ashfaq Nasir
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सुब्ह-ए-मग़रूर को वो शाम भी कर देता है
शोहरतें छीन के गुमनाम भी कर देता है

वक़्त से आँख मिलाने की हिमाकत न करो
वक़्त इंसान को नीलाम भी कर देता है
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Nadeem Farrukh
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शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं
मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं
Rajesh Reddy
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मसाइल तो बहुत से हैं मगर बस एक ही हल है
सहरस शाम तक सर मेरा है बेगम की चप्पल है

मेरे मालिक भला इस सेे बुरी भी क्या सज़ा होगी
मेरा शादीशुदा होना ही दोज़ख़ की रिहर्सल है
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Paplu Lucknawi
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बाक़ी सारे काम भुलाकर इश्क़ किया
सुब्ह से ले कर शाम बराबर इश्क़ किया

ग़लती ये थोड़े थी इश्क़ किया हम ने
ग़लती ये थी ग़ैर बिरादर इश्क़ किया
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Vashu Pandey
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शबो रोज़ की चाकरी ज़िन्दगी की
मुयस्सर हुईं रोटियाँ दो घड़ी की

नहीं काम आएँ जो इक दिन मशीनें
ज़रूरत बने आदमी आदमी की

कि कल शाम फ़ुरसत में आई उदासी
बता दी मुझे क़ीमतें हर ख़ुशी की

किया क्या अमन जी ने बाइस बरस में
कभी जी लिया तो कभी ख़ुद-कुशी की

ग़मों को ठिकाने लगाते लगाते
घड़ी आ गई आदमी के ग़मी की

ये सारी तपस्या का कारण यही है
मिसालें बनें तो बनें सादगी की
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Aman G Mishra
जब सर-ए-शाम पजीराई-ए-फ़न होती है
शाहज़ादी को कनीज़ों से जलन होती है

ले तो आया हूँ तुझे घेर के अपनी जानिब
आगे इंसान की अपनी भी लगन होती है
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Azhar Faragh
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मिरी ग़ज़ल की तरह उस की भी हुकूमत है
तमाम मुल्क में वो सब से ख़ूब-सूरत है

बहुत दिनों से मिरे साथ थी मगर कल शाम
मुझे पता चला वो कितनी ख़ूब-सूरत है
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Bashir Badr
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अभी तो शाम की दस्तक हुई है
अभी से लग गया बिस्तर हमारा

यही तन्हाई है जन्नत हमारी
इसी जन्नत में है अब घर हमारा
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Vikas Sharma Raaz
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कभी तो नस्ल-ओ-वतन-परस्ती की तीरगी को शिकस्त होगी
कभी तो शाम-ए-अलम मिटेगी कभी तो सुब्ह-ए-ख़ुशी मिलेगी
Abul mujahid zaid
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ख़ुश रहते हैं हँस सकते हैं भोले भाले होते हैं
वो जो शे'र नहीं कहते हैं क़िस्मत वाले होते हैं

पीना अच्छी बात नहीं है आते हैं समझाने दोस्त
और ढलते ही शाम उन्हें फिर हमीं सँभाले होते हैं
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Vineet Aashna
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ज़ख़्म है दर्द है दवा भी है
जैसे जंगल है रास्ता भी है

यूँँ तो वादे हज़ार करता है
और वो शख़्स भूलता भी है

हम को हर सू नज़र भी रखनी है
और तेरे पास बैठना भी है

यूँँ भी आता नहीं मुझे रोना
और मातम की इब्तिदा भी है

चूमने हैं पसंद के बादल
शाम होते ही लौटना भी है
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Karan Sahar
दोपहर तक बिक गया बाज़ार में इक-एक झूठ
शाम तक बैठे रहे हम अपनी सच्चाई लिए
Vijendra Singh Parwaaz
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शाम से पहले तिरी शाम न होने दूँगा
ज़िन्दगी मैं तुझे नाकाम न होने दूँगा
Sabir Zafar
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हर सुब्ह निकलना किसी दीवार-ए-तरब से
हर शाम किसी मंज़िल-ए-ग़मनाक पे होना
Sarvat Husain
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हर शाम इक मलाल की आदत सी हो गई
मिलने का इंतिज़ार भी मिलना सा हो गया
Naseer Turabi
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भीगी हुई इक शाम की दहलीज़ पे बैठे
हम दिल के सुलगने का सबब सोच रहे हैं
Shakeb Jalali
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बस एक शाम का हर शाम इंतिज़ार रहा
मगर वो शाम किसी शाम भी नहीं आई
Ajmal Siraj
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ये देख शाम हो गई बता कहाँ मैं जाऊँगा
जो पेड़ थे वो कट चुके वो मेरा घर नहीं रहा
Sahir Baltistani
शाम से कुछ बुझा सा रहता हूँ
दिल हुआ है चराग़ मुफ़्लिस का
Meer Taqi Meer
हमारी सुब्ह किसी शाम से नहीं मिलती
ये वो थकन है जो आराम से नहीं मिलती
Kashif Husain Ghair
मिले मुझे भी अगर कोई शाम फ़ुर्सत की
मैं क्या हूँ कौन हूँ सोचूँगा अपने बारे में
Iqbal Sajid
मुद्दत में बहार आई है सो लोग भी ख़ुश हैं
मैं ख़ुश हूँ अगर शहर में दो लोग भी ख़ुश हैं

अपना तो ये आलम है कि ढलती ही नहीं शाम
अल्लाह करें ख़ुश रहें जो लोग भी ख़ुश हैं
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Akhtar Usman
अगर मैं सूरज के साथ ढलने से बच गया तो
कहाँ गुज़ारूँगा शाम सोचा हुआ है मैं ने
Saleem Kausar
सितारा सुब्ह का मैं और चराग़ शाम का तू
न तेरे काम का मैं हूँ न मेरे काम का तू
Kabir Athar
शाम आए और घर के लिए दिल मचल उठे
शाम आए और दिल के लिए कोई घर न हो
Akhtar Usman
दोस्तों से मुलाक़ात की शाम है
ये सज़ा काट कर अपने घर जाऊँगा
Mazhar Imam
किधर जा रहा है जुगनू शाम उठाए
इधर बैठा हूँ मैं जाम उठाए
Murli Dhakad
दुश्वारियाँ ऐसी हर काम में आई
कुछ यादें हमें हर जाम में आई

हर शाम मिला कुछ बातों से तेरी
ये कैसी सुब्ह जो हर शाम में आई
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Vinay Khandelwal
शाम होते जब तुम आई याद तो मैं रो पड़ा
तुम को खो कर जब हुआ बर्बाद तो मैं रो पड़ा
Dharmesh Solanki
तेरे ख़्वाबों ने मुझे चैन से सोने न दिया
दूर नींदों से कहीं रात गुजारी मैं ने

लौट कर आए जो घर शाम थके हारे तब
झूट की इक हँसी चेहरे से उतारी मैं ने
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Aditya
आज हम को ख़त्म कर देगी तेरी नाराज़गी
यार इतनी बे-सबब अच्छी नहीं नाराज़गी

दिन के लम्हे काट लेता हूँ मैं तेरी याद से
दिल जलाती है मगर ये शाम की नाराज़गी
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Aditya
उदासी है न यादें हैं न तेरे काल का चक्कर
हमारी शाम है जाना तुम्हारे शाम से बेहतर
Gaurav Singh
तुम को जी भर के देखना तुम सेे बातें करना
मेरी हर शाम तेरी तस्वीर पे जाया होती है
Shivam anand
ये ही मेरी ख़ूबी थी कल शाम तक
भूल जाते थे किसी का नाम तक
Govind kumar
दुआ हर इक मेरे हक की तुम्हारे नाम हो जाए
ख़ुदा कुछ और हो ना हो मेरा ये काम हो जाए

तुम अपने रंग से मुझ
में भी थोड़े रंग भर दो ना
हमारी ज़िन्दगी भी फिर अवध की शाम हो जाए
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Aditya
मुझ से मिलना हो जिसे दिन के उजालों में मिले
ख़ुद से रहती है मुलाक़ात मिरी शाम के बा'द
Haider Khan
शाम को है लौट आता साथ तेरे
वो सुकूँ जो पूरा दिन दिल ढूँढ़ता है
Amol
कुछ काम-धाम है ही नहीं और क्या करें
दिन-रात सुब्हो-शाम चलो मशविरा करें
Saarthi Baidyanath
उदासी और ख़ामोशी भरी इक शाम आएगी
मेरी तस्वीर रख लेना तुम्हारे काम आएगी
Amber dilkash
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अदू होते रहे अहबाब कैसी ये करिश्माई,
इसी तदबीर में मैं रोज़ सुब्ह-ओ-शाम रहता था।
Ravi 'VEER'
बातों बातों में तेरी जब बात आने लगती है
फिर बिना मौसम के ही बरसात आने लगती है

ख़ूब-सूरत होती थी हर शाम तेरे साथ में
दोपहर के बा'द अब तो रात आने लगती है
Read Full
Krishnakant Kabk
सुब्ह से शाम तक है बेक़रारी सी
तिरी यादें नहीं देती ख़ुशी के पल
Meem Alif Shaz
शाम होते ही घर जाना पड़ता है
एक दिन सब को मर जाना पड़ता है

ख़्वाब में वो मुझ पर ग़ुस्सा करती है
सो हमें सच में डर जाना पड़ता है
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Rudransh Trigunayat
मौसम तो और भी हैं तेरी यादों के मगर
दुख के उरूज पर यूँँ ही मोती रहेगी शाम
Vikas Rajput
चलते-चलते हो गई है शाम जब
ऐ मेरी मंज़िल ठहर जा, चल न अब
Javed Aslam
किसी दिन लौट आएगा यक़ीं है
सो मैं हूँ मुंतज़िर हर शाम तेरा
Shahzan Khan Shahzan'
सुनो सहेलियों सब शाम को घर आ जाना
शजर को आज मैं किरतास पर बनाऊँगी
Shajar Abbas
रुख़्सार पर तबस्सुम लाली भी खिल उठीं हैं
जब पास तुम हमारे हर शाम आ रहें हो
Sagar
नज़ारे खो गए थे बाक़ी सब जब तुम मिले मुझ को
सितारे, चाँद, जुगनू, शाम तुझ में गुम मिले मुझ को
Abhay Aadiv
लबों पर अपने तब्बसुम नहीं सजाऊँगी
ग़म-ए-फ़िराक़ तेरा उम्र भर मनाऊँगी

'शजर' ये वा'दा है जब तक है मेरे जिस्म में जाँ
मैं तेरी गज़लें सुब्ह-ओ-शाम गुनगुनाऊँगी
Read Full
Shajar Abbas
छोड़ कर जाएँ कहाँ अब ये अधूरी दास्तां
शाम भी होने को है घर लौट जाना चाहिए
Abhishek Bhadauria 'Abhi'