Kismat Shayari - Fate, destiny, and life’s written moments in poetic lines

Kismat shayari beautifully captures the idea of fate, destiny, and the unseen forces shaping our lives. Whether it’s about love, struggle, or missed chances, these lines reflect how taqdeer plays its role in every story. Explore soulful verses that speak of hope, acceptance, and the twists of life written in our naseeb.

kismat shayari
कोशिश भी कर उमीद भी रख रास्ता भी चुन
फिर इस के ब'अद थोड़ा मुक़द्दर तलाश कर
Nida Fazli
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taqdeer shayari
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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naseeb shayari
वो तिरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गईं
दिल-ए-बे-ख़बर मिरी बात सुन उसे भूल जा उसे भूल जा
Amjad Islam Amjad
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इस ज़िन्दगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब
इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम
Ahmad Faraz
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आप कहते थे कि रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आप की इस बात ने रोने न दिया
Sudarshan Fakir
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सितारे कुछ बताते हैं नतीजा कुछ निकलता है
बड़ी हैरत में हैं मेरा मुक़द्दर देखने वाले
Madan Mohan Danish
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मैं ने मेहनत से हथेली पे लकीरें खींचीं
वो जिन्हें कातिब-ए-तक़दीर नहीं खींच सका
Umair Najmi
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हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा
मैं ही कश्ती हूँ मुझी में है समुंदर मेरा
Nida Fazli
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खो दिया तुम को तो हम पूछते फिरते हैं यही
जिस की तक़दीर बिगड़ जाए वो करता क्या है
Firaq Gorakhpuri
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जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया
जो खो गया मैं उस को भुलाता चला गया
Sahir Ludhianvi
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गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो
डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ
Kaifi Azmi
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दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे
वर्ना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे

ऐ देखने वालो मुझे हँस हँस के न देखो
तुम को भी मोहब्बत कहीं मुझ सा न बना दे

मैं ढूँढ़ रहा हूँ मिरी वो शम्अ' कहाँ है
जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे

आख़िर कोई सूरत भी तो हो ख़ाना-ए-दिल की
का'बा नहीं बनता है तो बुत-ख़ाना बना दे

'बहज़ाद' हर इक गाम पे इक सज्दा-ए-मस्ती
हर ज़र्रे को संग-ए-दर-ए-जानाना बना दे
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Behzad Lakhnavi
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हुस्न को भी कहाँ नसीब 'जिगर'
वो जो इक शय मिरी निगाह में है
Jigar Moradabadi
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तदबीर के दस्त-ए-रंगीं से तक़दीर दरख़्शाँ होती है
क़ुदरत भी मदद फ़रमाती है जब कोशिश-ए-इंसाँ होती है
Hafeez Banarasi
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मैं अब तेरे सिवा किस को पुकारूँ
मुक़द्दर सो गया ग़म जागता है
Asad Bhopali
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ये किस ने कहा है मिरी तक़दीर बना दे
आ अपने ही हाथों से मिटाने के लिए आ
Hasrat Jaipuri
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किसी ने अपने मुक़द्दर का रोना रोते हुए
किसी के कार्ड के बोसे सँभल-सँभल के लिए
Shadab Javed
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जुदा किसी से किसी का ग़रज़ हबीब न हो
ये दाग़ वो है कि दुश्मन को भी नसीब न हो
Nazeer Akbarabadi
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शायद अगली इक कोशिश तक़दीर बदल दे
ज़हर तो जब जी चाहे खाया जा सकता है
Siraj Faisal Khan
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कहीं गुलाल के हिस्से में कोई गाल नहीं
कहीं पे गाल की तक़दीर में गुलाल नहीं
Harman Dinesh
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न हुआ नसीब क़रार-ए-जाँ हवस-ए-क़रार भी अब नहीं
तिरा इंतिज़ार बहुत किया तिरा इंतिज़ार भी अब नहीं

तुझे क्या ख़बर मह-ओ-साल ने हमें कैसे ज़ख़्म दिए यहाँ
तिरी यादगार थी इक ख़लिश तिरी यादगार भी अब नहीं
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Jaun Elia
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ख़ुद बुलाओ कि वो यूँँ घर से नहीं निकलेगा
यहाँ इनआ'म मुक़द्दर से नहीं निकलेगा

ऐसे मौसम में बिना काम के आया हुआ शख़्स
इतनी जल्दी तेरे दफ़्तर से नहीं निकलेगा
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Khurram Afaq
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जीत हूँ जश्न-ए-मुक़द्दर हूँ मैं
ठीक से देख सिकंदर हूँ मैं
Ritesh Rajwada
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ऐसी हैं क़ुर्बतें के मुझी में बसा है वो
ऐसे हैं फ़ासले के नहीं राब्ता नसीब
Afzal Ali Afzal
तमाम मस'अले उठाए फिर रहे हैं हम
इसीलिए भी चलते चलते थक गए हैं हम

थे कितने कम-नसीब हम कि राबता न था
हैं कितने ख़ुशनसीब तुझ को छू रहे हैं हम
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Siddharth Saaz
मिले किसी से गिरे जिस भी जाल पर मेरे दोस्त
मैं उस को छोड़ चुका उस के हाल पर मेरे दोस्त

ज़मीं पे सबका मुक़द्दर तो मेरे जैसा नहीं
किसी के साथ तो होगा वो कॉल पर मेरे दोस्त
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Ali Zaryoun
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परिंद पेड़ से परवाज़ करते जाते हैं
कि बस्तियों का मुक़द्दर बदलता जाता है
Asad Badayuni
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किसी को साल-ए-नौ की क्या मुबारकबाद दी जाए
कैलन्डर के बदलने से मुक़द्दर कब बदलता है
Aitbar Sajid
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तुम सितारों के भरोसे पे न बैठे रहना
अपनी तदबीर से तक़दीर बनाते जाओ
Sada Ambalvi
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मिलने की तरह मुझ सेे वो पल भर नहीं मिलता
दिल उस से मिला जिस सेे मुक़द्दर नहीं मिलता
Naseer Turabi
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कभी पत्थर मुक़द्दर लिख नहीं सकता मगर समझो
जिसे पत्थर में ढूँढो हो तुम्हारे पास ही तो है
Tanha
फिर एक रोज़ मुक़द्दर से हार मानी गई
ज़बीन चूम के बोला गया "ख़ुदा हाफ़िज़"
Afkar Alvi
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ग़म-ए-हयात में यूँँ ढह गया नसीब का घर
कि जैसे बाढ़ में डूबा हुआ गरीब का घर

वबायें आती गईं और लोग मरते गए
हमारे गाँव में था ही नहीं तबीब का घर
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Ashraf Ali
घर से निकले हुए बेटों का मुक़द्दर मालूम
माँ के क़दमों में भी जन्नत नहीं मिलने वाली
Iftikhar Arif
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पलटा दे तक़दीर हमारी
आ कर माथा चूम हमारा
Siddharth Saaz
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अलमास धरे रह जाते हैं बिकता है तो पत्थर बिकता है
अजनास नहीं इस दुनिया में इंसाँ का मुक़द्दर बिकता है

'खालिद सज्जाद' सुनार हूँ मैं इस ग़म को ख़ूब समझता हूँ
जब बेटा छुप कर रोता है तब माँ का ज़ेवर बिकता है
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Khalid Sajjad
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कोई भी रोक न पाता, गुज़र गया होता
मेरा नसीब-ए-मोहब्बत सँवर गया होता

न आईं होती जो बेग़म मेरी अयादत को
मैं अस्पताल की नर्सों पर मर गया होता
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Paplu Lucknawi
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ये कब कहते हैं कि आ कर हम को गले लगा ले वो
मिल जाए तो रस्मन ही बस हाथ मिला ले काफ़ी है

इतने कहाँ नसीब कि इस सेे प्यास बुझाएँ खेल करें
दरिया हम जैसों को अपने पास बिठा ले काफ़ी है
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Vashu Pandey
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किसी किसी को नसीब हैं ये उदासियाँ भी
किसी को ये भी बता न पाए उदास लड़के
Vikas Sahaj
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इतने कहाँ नसीब कि इस सेे प्यास बुझाएँ खेल करें
दरिया हम जैसों को अपने पास बिठा ले काफ़ी है
Vashu Pandey
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ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा
इस रात की तक़दीर सँवर जाए तो अच्छा

जिस तरह से थोड़ी सी तेरे साथ कटी है
बाक़ी भी उसी तरह गुज़र जाए तो अच्छा
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Sahir Ludhianvi
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मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था
वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था
Anjum Rehbar
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मुझ को बदन नसीब था पर रूह के बग़ैर
उस ने दिया भी फूल तो ख़ुशबू निकाल कर
Ankit Maurya
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मेरी तक़दीर में जलना है तो जल जाऊँगा
तेरा वा'दा तो नहीं हूँ जो बदल जाऊँगा
Sahir Ludhianvi
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ज़िंदगी में आई वो जैसे मेरी तक़दीर हो
और उसी तक़दीर से फिर चोट खाना याद है
Rohit tewatia 'Ishq'
मैं उन्हीं आबादियों में जी रहा होता कहीं
तुम अगर हँसते नहीं उस दिन मेरी तक़दीर पर
Zia Mazkoor
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किसी के तुम हो किसी का ख़ुदा है दुनिया में
मेरे नसीब में तुम भी नहीं ख़ुदा भी नहीं
Akhtar Saeed Khan
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नया लिबास भी पहनो तो इस तरह पहनो
जिन्हें नसीब नहीं है उन्हें नया न लगे
Javed Saba
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ऐ मुस्कुराते शख़्स हमारी तरफ़ न आ
वापिस यहाँ से कोई भी हँस कर नहीं गया

मुझ को तुम्हारे बा'द किसी और की तरफ़
ले जा रहा था मेरा मुक़द्दर नहीं गया
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Inaam Azmi
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मैं ने आ'साब को पत्थर का बना रक्खा है
एक दिल है कि जो बनता नहीं पत्थर जैसा

हम फ़क़ीरों को कभी रास न आया वरना
हम ने पाया था मुक़द्दर तो सिकंदर जैसा
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Saqi Amrohvi
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ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र-दर-सफ़र
आख़िरी साँस तक बे-क़रार आदमी
Nida Fazli
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होने थे जितने खेल मुक़द्दर के हो गए
हम टूटी नाव ले के समुंदर के हो गए

ख़ुश्बू हमारे हाथ को छू कर गुज़र गई
हम फूल सब को बाँट के पत्थर के हो गए
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Irfan Jafri
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तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए
Faiz Ahmad Faiz
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बस यूँँ ही दिल को तवक़्क़ो' सी है तुझ से वर्ना
जानता हूँ कि मुक़द्दर है मेरा तन्हाई
Nasir Kazmi
बस इतनी सी मेरी तक़दीर बदली
कभी ज़िंदाँ कभी ज़ंजीर बदली

न इन आँखों ने अपने ख़्वाब बदले
न ख़्वाबों ने कोई ता'बीर बदली
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Javed Ahmad
मायूस ज़िंदगी से तुझे दर-किनार कर
बैठी हुई हूँ अपने मुक़द्दर से हार कर

मैं कम-नसीब उस के दिलासे में आ गई
उस ने कहा था मुझ से मेरा इंतिज़ार कर
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Himanshi babra KATIB
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मुझ को डोली में बिठा डर के हवाले कर दे
मेरी माँ मुझ को मुक़द्दर के हवाले कर दे
Rehana Qamar
फिर वही रात वही चाँद वही तुम वही मैं
क्या किसी छत के मुक़द्दर में लिखे जाएँगे
Vibha Jain 'Khwaab'
फ़रिश्ते फ़ुर्सत में बैठ कर लिखते हैं किसी का ख़राब होना
हर अंगूर की किस्मत में नहीं होता है शराब होना
Murli Dhakad
आसान है किसी के लिए आँखें भारी करना
लेकिन मुश्किल है उम्र भर वफ़ादारी करना

दुनिया हर रोज़ निकलती है सुब्ह काम के लिए
अपने नसीब में है शायद बेरोज़गारी करना
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karan singh rajput
मैं रक़्स क्यो न करूँ यार अपनी किस्मत पर
के भीख मिलती हैं जिस सेे वो दर तुम्हारा हैं
Moin Hasan
दुआ करूँ कौन सी, ख़ुदा हो सके मिरे पास, कह दो ना
गुनाह वो कौन सा न कर दूँ, नसीब जन्नत मुझे होगी
Zain Aalamgir
महरूम है मुक़द्दर में प्यार शख़्स के पर
बस दरमियाँ सुजूद-ए-अल्लाह फ़ासले में
Zain Aalamgir
नसीब अपना खुला नहीं है
जो चाहिए था मिला नहीं है

उसी पे अटका है फिर से जा कर
कुशादा दिल है भरा नहीं है
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Sumit Panchal
फ़क़ीरी से किस्मत न बदले अगर
कुदालों से अपना तू कासा बदल
Aarush Sarkaar
ग़मों को मिरे जो गिना जा रहा हैं
कि मशग़ूल हो के सुना जा रहा हैं

मिरी हैं ये किस्मत या फिर सजा हैं
कि क़ातिल मुझी से चुना जा रहा हैं
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Amol
मैं ने ख़ुद को बहलाने की इक तरकीब लगाई है
जो भी मुझ को न मिल पाया, उस को तक़दीर बताई है
BR SUDHAKAR
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फूलों की किस्मत में ही था
खिल कर फिर मुरझाना यारों
Pawan
ऐसी लुत्फ़-ए-सज़ा न फिर हो नसीब
क़ैद-ए-आग़ोश से रिहा मत कर
Dharmesh Solanki
मुक़द्दर ने उसी से दूर कर डाला
कि जो सब सेे ज़ियादा हम को प्यारा था
karan singh rajput
मैं पहली शफ़ में रहना चाहता था
मगर किस्मत ने पीछे ही बिठाया
Kush Pandey ' Saarang '
मुआमला था महज़ मुक़द्दर का
मेरा महबूब निकला पत्थर का
Ashraf Ali
यही सोचता हूँ मैं हर पल मिरी जाँ
कि मुझ सेे जुदा क्यूँँ है तक़दीर तेरी

वो बिंदी, वो काजल, वो कानों में झुमके
रुलाती है अक्सर वो तसवीर तेरी
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Shashank Shekhar Pathak
कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें कुछ नहीं नसीब
तुम ख़ुश नसीब हो कि तुम्हें कुछ नसीब है
Ramnath Shodharthi
माना हँसना मुश्किल है पर हँसते हैं
भोले बाबा मेरे मन में बसते हैं

पीछे छूट गए जो उन की किस्मत थी
हम भी भूल के सब कुछ आगे बढ़ते हैं
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Kush Pandey ' Saarang '
मुक़ददर भी है कोई चीज मेरे दोस्त दुनिया में
कि जिस सेे प्यार हो उस सेे ही शादी थोड़ी होती है
karan singh rajput
शे'र के जैसा शाइरों का भी
हो मुक़द्दर कहाँ ज़रूरी है
Saarthi Baidyanath
मुक़द्दर परेशां निग़ाहें मिलाकर
सभी रो रहे हैं मुझे आज़माकर

यही आरज़ू बस यही है तमन्ना
दिलों में रहूँ मैं ग़ज़ल गुनगुनाकर
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Saarthi Baidyanath
ऐ ख़ुदा लब पे इक दुआ ले कर
मैं तिरे दर पे आन बैठा हूँ

सब मुक़द्दर से माँगते हैं उसे
मैं मुक़द्दर ही मान बैठा हूँ
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Neeraj Naveed
वहम होता है कि छूने से सँवर जाएँगी
सोचता हूँ जो मुक़द्दर मिरा ज़ुल्फ़ें तेरी
Neeraj Neer
ये हक़ीक़त और ये उम्मीद, यकसाँ क्यूँ नहीं है
मुफ़लिसी जब हो मुक़द्दर, चल रही साँसे सज़ा हो
Zain Aalamgir
हसीन ख़्वाब भी कुछ को नसीब होते हैं
किसी किसी को उदासी उदास करती है
Vikas Rajput
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पावों के नीचे छाले हैं, आँखों के अंदर पानी है
किस्मत ने मारी है ठोकर, बदकिस्मत एक कहानी है
Shreya Shivmurti
उस दीवार पे मेरी भी तक़दीर लगी है
जिस दीवार पे तेरी वो तस्वीर लगी है
Aashish kargeti 'Kash'
दुनिया मेरे नसीब में कुछ कम लिखी गई
वरना ये तेरा हिज्र कभी काटता ना मैं
Khalid Azad
ख़ुदा! कैसा मुक़द्दर फेंककर मुँह पर मिरे मारा
बर्फ़ पर हाथ रखता हूँ तो जलता है बदन सारा
anupam shah
अदा-ए-शुक्र करो तुम नसीब वाले हो
'शजर' ख़ुदा ने तुम्हें सल्तनत अता की है
Shajar Abbas
लिख मुक़द्दर को मिरे तू अब समुंदर की तरह
प्यास से मैं तोड़ूं दम, दे ऐसी' बर्बादी मुझे
Tarun Pandey
जब जब भी उस को याद 'शजर' मेरी आएगी
मातम करेगी ग़म में वो आँसू बहाएगी

मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था
बाद-ए-फ़िराक सब को ये मिसरा सुनाएगी
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Shajar Abbas
मैं उस के हाथों में हूँ क़ैद ऐ दोस्त
जो लड़की मेरे किस्मत में नहीं है
Chandan Sharma
अगर ख़ुशियाँ मुकद्दर में रही तो ग़म भी आएँगे
अगर आएँगे हिस्से ज़ख़्म तो मरहम भी आएँगे
Ravi 'VEER'
नसीब अपना है रूठे हुए सनम की तरह
अगर ख़ुशी कभी मिलती भी है तो ग़म की तरह
Rekhta Pataulvi
मता-ए-जान दुआ माँगती है रो-रो कर
मेरे इलाही 'शजर' को मेरा नसीब बना
Shajar Abbas
मुकद्दर से नहीं ज़्यादा जुटा सकता तमन्नाएँ
तू लकड़ी पेड़ में जितनी है उतनी काट सकता है
Arihant jain
तमाम उम्र ही फ़ुर्क़त का ग़म मनाएगी
वो बद-नसीब जो ठुकरा के जा रही है मुझे
Shajar Abbas
ये तो बस मेरा मुक़द्दर नईं सही
वरना कोई ऐब नईं “दीवानी“ में
karan singh rajput
लौटा न वो कभी न कभी दर्द कम हुआ
अश्कों के चींखने की सदा बे-असर रही

मैं ने तमाम उम्र में बस की थी इक दुआ
मेरा नसीब वो भी दुआ बे-असर रही
Read Full
Dipendra Singh 'Raaz'
अब तो दोनों के मुक़द्दर ही आज़माने हैं
है बॉल आख़िरी और सात रन बनाने हैं
Upendra Bajpai
जहाँ पर तीरगी है रौशनी करना
ख़ुदा सबके मुक़द्दर में ख़ुशी करना

मिरे बच्चों मिरी बस एक ख़्वाहिश है
बड़े होकर के तुम भी शा'इरी करना
Read Full
Neeraj Nainkwal
इश्क़-ए-अहमद जिसे मुयस्सर नईं
ख़ुल्द भी उस का फिर मुक़द्दर नईं

आप की सोहबतों के सदक़े में
क्या है वो चीज़ जो मुअत्तर नईं
Read Full
Altaf Iqbal
जो तुम ने तारों के टूटने पर हो माँगी मन्नत तो मैं तुम्हारा
अगर सयारों की गर्दिशों ने बदल दी किस्मत तो मैं तुम्हारा

तुम्हारे हाथों में इस कहानी की इब्तिदा है और इंतहा भी
अगर इशारों में तक ये कह दो कि है मोहब्बत तो मैं तुम्हारा
Read Full
Hasan Raqim
वहशत है मुझ को लम्स के रिज़्क-ए-हराम से
मुझ को मेरे नसीब की रोज़ी नहीं मिली
Harun Umar
अब तो ग़म को ढ़ोना होगा
जो पाया है खोना होगा

रोना लिक्खा है किस्मत में
सो हम ने बस रोना होगा
Read Full
Kaviraj " Madhukar"
शरफ़ मिला न कभी चाँद देखने का हमें
वो ख़ुश-नसीब हैं, जो तुझ को देखते होंगे
KARAN
कि ख़ुश नसीबों को होता है गुल का बोसा नसीब
तुम्हारे बोसे की क्यूँ बदनसीब चाह करें
Shajar Abbas
आप को लम्स भी मुयस्सर है
मुझ को दीदार तक नसीब नहीं
Nishad
टूटे हुए तारे मेरी खिड़की से गुज़रना
इक बात को करना है मुक़द्दर के हवाले
Amaan Javed
तीन चीजें मेरी किस्मत में नहीं हैं
अर्ज़, शोहरत और किसी की भी मुहब्बत
A R Sahil "Aleeg"